भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ भावप्रकाशनिघण्टुः इससे एकाएक आसन परिवर्तनजन्य रक्तभाराल्पता (Postural hypotension) तथा बहुत अधिक रक्तभाराल्पता नहीं होती । अधिक मात्रा में लेने से अतिसार या अनिष्ट स्वप्न (Nightmares) होते हैं लेकिन कोई तीव्र दुष्परिणाम नहीं होते इसके अवांछनीय गुण जैसे रक्तचाप की कमी एवं मन्दहृदयता आदि चिकित्सा काल में बराबर बने रहते हैं । इसके उपयोग के समय नाक में रक्ताधिक्य (Nasal congestion), शरीर भार वृद्धि, बृहदांत्र की गति वृद्धि तथा कुछ लोगों में मैथुन शक्ति (Libido) का ह्रास होता है । इसके उपयोग से निद्रा की अपेक्षा तन्द्रा आती है तथा घबड़ाहट, चिड़चिड़ापन, तनाव, हृदय की धड़कन एवं थकावट आदि दूर होकर रोगी को बहुत आराम मिलता है । रक्तभार की अधिकता में प्रथम इसी औषधि को प्रारम्भ करना चाहिये । इसके चूर्ण की मात्रा १ रत्ती से लेकर १ माशे तक दी जा सकती है । यदि ६ सप्ताह में लाभ न हो तो अन्य औषधियाँ उसके साथ मिलाई जा सकती हैं । अंग्रेजी दवा की दुकानों में इसकी गोलियाँ तथा इसके सत्व की गोलियाँ बिकती हैं जिनका उपयोग सुगमता की दृष्टि से किया जा सकता है । रीसर्पिन् नामक इसके सत्व का उपयोग तमकश्वास, सव्रणस्थूलान्त्रशोथ (Ulcerative colitis), पैत्तिकशूल, वृक्कशूल एवं मानसिक अवसाद (Mental depression) आदि अवस्थाओं में नहीं करना चाहिये । व्यामिश्रण-इसमें रा केनेसेन्स (R. cnescens Lian. तथा रा० डेन्सिफ्लोरा (R. densiflora Benth.) के मूल की मिलावट होती है । मात्रा-चूर्ण १ से २ माशा । ५२. नाकुली ? (ईश्वरमूल) सं०-नाकुली, ईश्वरी, अर्कमूल । हिं०-ईशरमूल, रूद्रजटा । म०-सापसण । बं०-ईशरमूल । गु०- नोलबेल ता०-इचचुरामूली । ते०-ईश्वरवेरु । उडि०-गोपोकरोनि । अ०, फा०-जरवन्दे हिन्दी । उर्दू०-शपेसन्द । अं०-Indian birthwort (इण्डियन बर्थवर्ट) । Aristolochin indica Linn. (एरिस्टोलोकिआ इण्डिका) । Fam. Aristo-lochiaceae (एरिस्टोलोकिएसी) । इसकी लता भारतवर्ष के सभी भागों में विशेष कर दक्षिण कोंकण में होती है । इस लता के कांड लम्बे, .२- .४ इञ्च मोटे, गोल, चिकने तथा लम्बाई में धारियों से युक्त एवं कर्पूरवत् गंधयुक्त होते हैं । पत्र-हरे, डण्ठल की तरफ चौड़े तथा अग्र पर नुकीले विभिन्न आकार के एवं ५ शिराओं से युक्त । पुष्प-सदण्डिक हरित । बीज-अण्डाकार, चपटे एवं पंखयुक्त । मूल-गाँठदार, शाखाओं से युक्त, मोटा भाग .४-.६ इञ्च, हलके बादामी रंग के तथा मूलत्वक् मोटी, कहीं-कहीं अलग भई हुई । काष्ठ-श्वेत । भग्न-तन्तुमय । स्वाद-कुछ कडुआ । इसके पञ्चांग का व्यवहार होता है । रासायनिक संगठन-इसमें ॲरिस्टोलोचीन (Aristolochine) नामक तीन विभिन्न क्षार (Bases) पाये जाते हैं । इनके अतिरिक्त इसमें ३ भूयात्य अम्ल (Nitrogenous acids) जिन्हें ॲरिस्टिनिक् (Aristinic), ॲरिस्टिडिनिक् (Aristidinic) और ॲरिस्टोलिक् (Aristolic) अम्ल कहते हैं तथा एक उड़नशील तैल जिसमें शायद बोर्निओल (Borneol) रहता है एवं राल, टॅनिन् एवं स्टार्च आदि पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-यह बल्य, उत्तेजक, गर्भाशयसंकोचक, ज्वरहर, शूलहर तथा विषहर है । अल्प मात्रा में यह आमाशय के लिये उत्तेजक है लेकिन अधिक मात्रा में स्थानिक प्रक्षोभ उत्पन्न होकर हल्लास, मरोड़, शूल तथा कभी- कभी वमन एवं कुंथन भी होता है । ॲरिस्टोलोचीन् (Aristolochine) की क्रिया ॲलोइन (Aloin) के समान होती है लेकिन उससे यह विषैला है । यह उच्च श्रेणी के जानवरों में पाचन संस्थान तथा वृक्क में प्रक्षोभ उत्पन्न करता है तथा संन्यास एवं श्वसनाघात से मृत्यु होती है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA