भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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२९६ भावप्रकाशनिघण्टुः यह हिमालय के साधारण उष्ण प्रदेशों में रावी से पूरब की ओर, खासिया पहाड़, सिलहट तक, ३-६ हजार फीट के बीच पाया जाता है और सिंगापुर में भी इसके वृक्ष देखने में आते हैं। चीन तथा जापान में इसकी बहुत उपज की जाती है। इसके मध्यम ऊँचाई के सदाहरित वृक्ष होते हैं। छाल-बादामी, धूसर अथवा कृष्णाभ, भारी, सुगन्धित, करीब १/२ इञ्च मोटी और खुरदरी होती है। काष्ठ १/२ इञ्च से १ इञ्च मोटा, बिना रेशे का और रक्ताभ बादामी होता है। पत्रनाल, मञ्जरी तथा नवीन शाखाओं पर बादामी रोमावरण होता है। पत्ते-४ से ८ इञ्च लम्बे तथा १ १/२-२ इञ्च चौड़े, ऊपर से भालाकार अथवा कुछ-कुछ आयताकार भी और उनके अधः पृष्ठ प्रायः मुरचई रंग के होते हैं। फूल-लाल। फल- १/२ इञ्च लम्बे, अण्डाकार, कुछ चिपटे, पृष्ठ पर दानेदार और पकने पर रक्ताभ या पीताभ बादामी होते हैं। फलों में मोम की तरह एक तेल होता है। ये फल स्वाद में कुछ खट्टे होते हैं। इन्हें सिलहट में 'सोफी' कहते हैं जिन्हें लोग खाते हैं। यद्यपि इस वृक्ष का नाम कायफल है तब भी औषधार्थ इसकी छाल का ही प्रयोग 'कायफल' नाम से किया जाता है। इस छाल को सूँघने से छींक आती है तथा इसे जल में डालने पर जल लाल हो जाता है। आधुनिक विद्वान् इसके फल का भी औषधार्थ प्रयोग बतलाते हैं। भ्रमवश कितने वैद्य जंगली जायफल, ले०-मायरिस्टिका मलबारिका (Myristica malabarica Lam.) के वृक्ष को कायफल का वृक्ष बतलाते हैं। जंगली जायफल के फल के ऊपर जावित्री के समान जो छिलका होता है उसको रामपत्री कहते हैं। कायफल के फल का छिलका न जावित्री के समान होता है और न रामपत्री कहलाता है। कुछ लोगों ने इस वृक्ष को कुम्भी वृक्ष, ले०-कॅरेया आर्बोरिया (Careya arborea Roxb.) माना है जो गलत है। रासायनिक संगठन-इसमें कुछ टैनिन, शर्करा सम द्रव्य तथा कुछ लवण रहते हैं। इसके चूर्ण से एक मायरिसेटिन (Myricetin) नामक रञ्जक पदार्थ प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, ग्राही, स्वेदजनक, कफघ्न, वातहर, शोथघ्न, शिरोविरेचक, उत्तेजक तथा गर्भाशयसंकोचक है। अधिक मात्रा में लेने से इससे वमन होता है तथा थकावट मालूम होती है। इसका प्रयोग घरेलू औषध के रूप में अनेक रोगों में किया जाता है। (१) सोंठ एवं दालचीनी के साथ इसका क्वाथ प्रतिश्याय, गले की सूजन, मुखपाक, स्वरभंग, तमकश्वास, जीर्ण श्वासनलिका शोथ, कास तथा अग्निमांद्य, अरुचि, आध्मान, कुपचन, आमातिसार, रक्तातिसार, मूत्रातिसार, गण्डमाला एवं गृध्रसी आदि में दिया जाता है। (२) अर्श में कत्था, हींग एवं कर्पूर के साथ या घृत के साथ इसका लेप लाभदायक है तथा इसका आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। (३) केशर, काले तिल तथा सनई के बीजों को इसके साथ पूर्ण मात्रा में गुड़ के साथ देते हैं जिससे कष्टार्तव में अच्छा लाभ होता है। इसके देने के कुछ देर बाद भोजन देना चाहिये नहीं तो जी मिचलाने लगता है। इसके चूर्ण का पिचु भी योनि में धारण कराया जाता है। (४) प्रतिश्याय, चक्कर, शिरःशूल एवं अपस्मार आदि में इसके नस्य से लाभ होता है। (५) इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन किया जाता है तथा इसका चूर्ण व्रणों पर डाला जाता है। इसको घिसकर सूजन, चोट एवं मोच आदि पर लगाने से लाभ होता है। (६) इसका तैल व्रणों के लिये लाभदायक है तथा संधिशूल में इसे लगाते हैं।

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