भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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श्लैष्मिक कला के लिये स्थानिक रूप से सौम्य स्वापजनक होने के कारण वेदनास्थापन के लिए प्रयुक्त होता है । क्विनीन जो कि कोशाओं के जीवरस (प्रोटोप्लाजम्-Protoplasm) के लिये विषैला होता है उसकी अपेक्षा ८० गुना कम शक्ति का इसका घोल (८०,००० में १) लोशर्मेनिया ट्रॉपिका (Leishmania tropica) नामक प्राच्यव्रण उत्पन्न करने वाले कीटाणु के संबर्ध की वृद्धि रोकने में समर्थ होता है। यह प्राच्यव्रण (Oriental sore-ओरियण्टल् सोर) की चिकित्सा के लिये सफल औषधि है । बर्बेरिन् ॲसिड सल्फेट .५-१% घोल की १-२ सी० सी० मात्रा व्रण के किनारों पर अत्यन्त महीन सूचिका द्वारा, ४, ५ जगह दी जाती है। सूचिकाभरण हफ्ते में एक बार किया जाता है साधारणत ३ हफ्तों में व्रण अच्छा हो जाता है लेकिन द्वितीयक उपसर्ग की तीव्रता के अनुसार २-१२ हफ्ते भी अच्छा होने में लग सकते हैं । यदि एक से अधिक व्रण हों तो एक दिन में २ व्रणों से अधिक एवं हफ्ते में ४ व्रणों से अधिक (विशेष कर जब व्रण बड़े हों) में सूचिकाभरण नहीं करना चाहिये । चिकित्साकाल में व्रण का बन्धन उचित रूप में करना चाहिये । इस औषधि का तयार घोल ओरिसॉल (Orisol) नाम से बिकता है । (३) दारुहलदी पित्त एवं मूत्रमार्ग की विकृति में लाभदायक है। पित्त एवं मूत्राश्मरी, तृष्णा, दाह एवं हलास आदि के लिये इसका उपयोग किया जाता है । बस्तिशोथ एवं प्रमेह आदि में आँवले के रस एवं मधु के साथ इसको देते हैं । गर्भाशय शैथिल्य के कारण उत्पन्न रक्तप्रदर में तथा श्वेतप्रदर में मधु के साथ इसके क्वाथ का सेवन करने से लाभ होता है । कामला में मधु के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। मूलत्वक् का क्वाथ तृणाणुनाशक (Bactericidal- बॅक्टेरिसाइड्ल्) है तथा जीर्ण व्रणों में व्रण प्रक्षालन के लिये लाभदायक है । (४) दारुहलदी के फल सौम्य विरेचक, शीतल एवं रोचक होते हैं । प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण-उत्तर भारत में इसमें विशेष मिलावट नहीं होती लेकिन बंबई की तरफ इसमें कई प्रकार की वनस्पतियों के काष्ठ को हल्दी में उबालकर बेचते हैं। झाडकी हल्दी (Coscinium fenestratum Gaertn.) Colebr. (कॉसिनिअम् फेनेस्ट्रेट्म्) के कांड को भी इसके स्थान पर देते हैं। मात्रा-चूर्ण २-३ माशा, टिंक्चर १/२-२ ड्रा०, बर्बेरिन के लवण १-५ ग्रेन । अथ दार्वीक्वाथजातं रसाञ्जनम् । तस्य निर्माणविधि नामानि गुणांश्चाह दार्वीक्वाथसमं क्षीरं पादं पाक्त्वा यदा घनम् । तदा रसाञ्जनाख्यं तन्नेत्रयोः परमं हितम् ।।२०३।। रसाञ्जनं तार्क्ष्यशैलं रसगर्भञ्च तार्क्ष्यजम् । रसाञ्जनं कटु श्लेष्मविषनेत्रविकारनुत् ।।२०४।। उष्णं रसायनं तिक्तं छेदनं व्रणदोषहृत् ।।२०५।। दारुहलदी के क्वाथ से तैयार होने वाले रसोत के बनाने की विधि, नाम तथा गुण-दारुहलदी का काढ़ा बनाकर उसी के बराबर उसमें दूध डालकर औटावें । बाद को जब चौथाई भाग शेष रह जाय तब उतार लें और उसमें से जो गाढ़ा भाग हो उसे अलग कर लें। उसी को रसोत कहते हैं। वह नेत्रों के लिये परम हितकर होता है । रसाञ्जन, तार्क्ष्यशैल, रसगर्भ और तार्क्ष्यज ये रसोत के नाम हैं। रसोत-कटु तथा तिक्त रस युक्त, कफ, विष तथा नेत्र सम्बन्धी विकारों को दूर करने वाला, उष्ण वीर्य, रसायन, छेदक (पिण्डी भाव को प्राप्त हुये कफादिकों को काट-काट कर अलग करने वाला), एवम् व्रणसम्बन्धी दोषों को नष्ट करने वाला होता है । [२०३-२०५] ७१. रसौत हिं०-रसोत, रसौत, रसवत्त । बं०-रसांजन । म०-रसवत, रसांजन । गु०-रसवंती । क०-रसांजन । ते०- रसांजनमु । मा०-रसोत । पं०-रसौत । फा०-फिलजहरः । अ०-हुलुजेंहिंदी । अं०-Extract of Indian Berberis (एक्स्ट्रॅक्ट ऑफ इण्डियन् बर्बेरिस्) । ले०-Extractum Berberis (एक्स्ट्रॅक्टम् बर्बेरिस्) ।