भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 1167 में से

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३४० भावप्रकाशनिघण्टुः जाने के बाद बाहर की तरफ एक धूसर श्वेत रवेदार पदार्थ का वलय रह जाता है। इसमें यदि फॉरमॅल्डिहाइड् (Formaldehyde) के घोल का १ बूँद और गन्धक के तेजाब (Sulphuric acid) के पांच बूँद का मिश्रण मिलाया जाय तो गाढ़ा फिरमिजी (Crimson) रंग उत्पन्न होता है। प्रमाप (Standard)—अफीम में ९.५% से कम, मॉर्फीन (Morphine) नहीं होनी चाहिये। अच्छी अफीम धूप में रखने से जल्दी पिघलने लगती है, अग्नि पर डालने से जलने लगती है पर कोयला नहीं बनती, जलते समय उसकी ज्वाला स्वच्छ निकलती है, मल या धूआँ विशेष नहीं होता और बुझाने से अत्यन्त तीव्र और मादक गन्ध निकलती है। स्वच्छ अफीम को १०-५ मिनट सूंघने से नींद आती है। शोधन—बाजारू अफीम को जल में घोलकर, छानकर मंद आँच पर गाढ़ा कर लें। फिर इसको आर्द्रक स्वरस की २१ भावना देकर औषध के काम में लाना चाहिये। भारतीय अफीम के अतिरिक्त तुर्की, यूरोपीय एवं पर्शियन अफीम होती है जिनके क्षाराभों की मात्रा में कुछ अन्तर होता है तथा उनके स्वरूप में भी कुछ अन्तर होता है। अफीम की उत्तमता उसमें की मॉर्फीन की मात्रा पर निर्भर रहती हैं। भारतीय अफीम इस दृष्टि से काफी अच्छी होती है। रासायनिक संगठन—भारतीय औषधि अफीम में अनेक क्षाराभ पाये जाते हैं जिनकी मात्रा में भी समय-समय पर फरक रहता है। इसमें मॉर्फीन (Morphine) ७-१२%, नार्कोटीन (Narcotine) १.५-१२.५%, कोडीन (Codeine) ०.३%-४.०% तथा थिबेन (Thebaine), पॅपेहेराइन (Papaverine) एवं लॉर्डनाइन (Laudanine) आदि प्रमुख हैं। इन क्षाराभों के अतिरिक्त इसमें ॲसेटिक् (Acetic), लॅक्टिक् (Lactic), सल्फ्यूरिक् (Sulphuric) एवं मैकोनिक् (Meconic), इतने प्रकार के अम्ल (Acids), गोंद एवं पेक्टीन (Pectin) की तरह पदार्थ, ॲल्ब्यूमिन्, मोम, स्नेह, कॅउट्चौक् (Caoutchouc), राल, उड़नशील तैल, गन्धयुक्त द्रव्य, मेकोनिन् (Meconin) तथा अमोनियम्, कॅल्शियम एवं मॅग्नेशियम् के लवण आदि पदार्थ पाये जाते हैं। व्यापारी अफीम में (शुष्क अवस्था में) मॉर्फीन की मात्रा कम ज्यादा (५-२१%) रहती है। कुछ अन्य देशों से प्राप्त अफीम में की मॉर्फीन की मात्रा—तुर्की ५-१४%, पर्शियन ६-१४%, चाइनीज १.५-११%, बोहेमिया ११-१२%, तुर्किस्तान ५-१८%, आस्ट्रेलिया ४- ११%। पहले यह समझा जाता था कि भारतीय अफीम में मार्फीन की मात्रा कम होने के कारण वह औषध के उपयोग की नहीं होती। लेकिन सन् १९१४ के बाद औषधोपयोगी अफीम के उत्पादन के लिये विशेष प्रयत्न किया गया जिससे इसमें की मॉर्फीन की मात्रा बढ़ती गई और अब यह अच्छी-से-अच्छी तुर्की अफीम से औषधीय गुण में समता रखती है। भारतीय अफीम में एक और विशेषता यह है कि अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ की अफीम में कोडीन (Codeine) नामक क्षाराभ अधिक होता है। नार्कोटीन (Narcotine) नामक क्षाराभ पटना की अफीम में मार्फीन की अपेक्षा दुगना, मालवा की अफीम में मॉर्फीन से कुछ अधिक लेकिन स्मिर्ना (Smyrna-तुर्की का एक स्थान) की अफीम में मार्फीन की अपेक्षा बहुत कम होता है। अफीम एवं मॉर्फीन के गुण एवं कार्य—यह उष्ण, तिक्त, रूक्ष, वेदनाहर, निद्राजनक, शामक, मादक, कफघ्न, कासघ्न, स्वेदजनन, शोथघ्न, ग्राही, रक्तस्तम्भन, प्रसेकावरोधक एवं अल्प मात्रा में उत्तेजक, आह्लादकारक तथा वाजीकर है। इसकी प्रधान क्रिया केन्द्रीय वातनाड़ी संस्थान पर होती है। अल्प मात्रा में इससे कुछ उत्तेजना होती है। मन को आनन्द मालूम होता है। विचारशक्ति बढ़ती है। उत्साह बढ़ता है। कामवासना बढ़ती है। किसी काम में मन एकाग्र होता है। वेदना, खाँसी, थकावट, क्षुधा तथा अन्य प्रकार की अप्रिय संवेदनाओं का ज्ञान कम होता है। मन शान्त होकर निद्रा आती है। अधिक मात्रा में अवसाद होकर स्पर्शज्ञान तथा सुख एवं दुःख के समझने की शक्ति कम होती है तथा कुछ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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