भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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३६० भावप्रकाशनिघण्टुः अधिक मात्रा में इनके प्रयोग से अग्निमान्द्य, वमन, विरेचन, मांसपेशी-दुर्बलता, मूत्र में ॲल्ब्यूमिन् एवं अत्यन्त थकावट आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। अधिक दिन तक बाह्य या आभ्यन्तर प्रयोग से बालों का झड़ना, विचर्चिका, गजचर्म, त्वक्शोफ, त्वक्शोथ, मुख में प्रक्षोभ, मसूढ़ों पर एक धूसर रेखा तथा अन्य चर्मविकार आदि होते हैं। वृक्क रोगियों में विषैले परिणाम की अधिक सम्भावना रहती है। अथ क्षारद्वयं क्षारत्रयं क्षाराष्टकं च तेषां लक्षणानि गुणाँश्चाह स्वर्जिका यावशूकश्च क्षारद्वयमुदाहृतम्। टङ्कणेन युतं तत्तु क्षारत्रयमुदीरितम्।।२५७।। मिलितं तूक्तगुणकृद्विशेषाद्गुल्महत्परम्। पलाशवज्रिशिखरिचिञ्चाऽर्कतिलनालजाः ।।२५८।। यवजः स्वर्जिका चेति क्षाराष्टकमुदाहृतम्। क्षारा एतेऽग्निना तुल्या गुल्मशूलहरा भृशम् ।।२५९।। क्षारद्वय, क्षारत्रय तथा क्षाराष्टक का वर्णन और गुण-क्षारद्वय-सज्जी तथा जवाखार को क्षारद्वय कहते हैं। क्षारत्रय-क्षारद्वय (सज्जी तथा जवाखार) में यदि सुहागा मिला दिया जाय तो उसे क्षारत्रय कहते हैं। इन तीनों प्रकार के क्षारों के जो गुण ऊपर पृथक्- पृथक् कह आये हैं वे ही सब एकत्र मिल जाने पर भी उपर्युक्त गुणवाले होते हैं किन्तु विशेषरूप से गुल्म दूर करने में उत्तम होते हैं। पलाशक्षार, सेहुंडक्षार, चिचिड़ाक्षार, इमलीक्षार, मदारक्षार, तिलनालका क्षार, जवाखार तथा सज्जी इन सब क्षारों के योग का क्षाराष्टक कहते हैं। ये सब क्षार अग्नि के तुल्य हैं तथा गुल्म एवं शूल के नाश करने में उत्तम होते हैं।[२५७-२५९] ९७. क्षारद्वय-क्षारत्रय-क्षाराष्टक क्षार बनाने की क्रिया-क्षार बनाने के लिये बड़े वृक्ष की छाल और गुल्म तथा क्षुप जाति की वनस्पति का पञ्चांग लेना चाहिये। इष्ट पदार्थ को जला कर उसकी सफेद भस्म (राख) संग्रहकर किसी मिट्टी के पात्र में रख उसमें चौगुना जल छोड़ भली प्रकार घोलकर एक सुरक्षित स्थान में रख दें। कुछ लोग राख को जल में डालकर कुछ देर उबालते हैं जिससे उसमें के क्षार आसानी से जल में घुल जाते हैं। दो-एक दिन के बाद ऊपर का जल निथार लें अथवा फिल्टर से छान लें। नीचे जमे हुए पदार्थ में फिर से चौगुना जल डालकर, उबालकर फिर ऊपर का जल निथार लें। फिर दोनों नितारे हुए जल को कड़ाही में छोड़ अग्नि पर चढ़ाकर जल औटावें। सूख जाने पर पात्र के पेंदे में जमा हुआ पदार्थ खुरचकर निकाल सुरक्षित रखें। उपर्युक्त विधि से जो क्षार तैयार होता है वह मृदुक्षार कहलाता है। इसमें प्रायः कुछ पदार्थों के साथ-साथ सोडियम् एवं पोटैशियम् तत्त्वों के कार्बोनेट लवण हुआ करते हैं। यदि क्षारयुक्त जल को औटाते समय पूरी तरह न औटाकर आधा औटाने के बाद उस द्रव में चूना और शखनाभि आदि पदार्थों की कुछ भस्म मूल राख की चौथाई मात्रा में डालकर और थोड़ा उबालकर तथा छानकर प्राप्त द्रव को पूरी तरह औटावें तो तीक्ष्णक्षार प्राप्त होता है। इसमें थोड़ी बहुत मात्रा में प्रायः सोडियम् और पोटैशियम् तत्त्वों के हाइड्रोक्साइड्स रहते हैं जो अत्यन्त दाहक होते हैं। दाहजनक होने के कारण ही उन्हें तीक्ष्णदाह (Caustic alkalies) कहा जाता है। अथ चुक्रम् (चूक) । तन्नामगुणानाह चुक्रं सहस्रवेधि स्याद्रसाम्लं शुक्तमित्यपि। चुक्रमत्यम्लमुष्णञ्च दीपनं पाचनं परम् ।।२६०।। शूलगुल्मविबन्धामावातश्लेष्महरं सरम्। वमितृष्णाऽऽस्यवैरस्यहृत्पीडावह्निमान्द्यहृत् ।।२६१।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्र भावविरचिते भावप्रकाशे प्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणं समाप्तम् ।।२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA