भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ कर्पूरादिवर्गः
अथ कर्पूरम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
पुंसि क्लीबे च कर्पूरः सितःभ्रो हिमवालुकः । घनसारश्चन्द्रसंज्ञो हिमनामाऽपि स स्मृतः ॥१॥ कर्पूरः शीतलो वृष्यश्चक्षुष्यो लेखनो लघुः । सुरभिर्मधुरस्तिक्तः कफपित्तविषापहः ॥२॥ दाहतृष्णाऽस्यवैरस्यमेदोदौर्गन्ध्यनाशनः । कर्पूरो द्विविधः प्रोक्तः पक्वापक्वप्रभेदतः । पक्वात्कर्पूरतः प्राहुरपक्वं गुणवत्तरम् ॥३॥ अब कर्पूरादिवर्ग आरम्भ होता है, उसमें प्रथम कर्पूर के नाम तथा गुण—कर्पूर (यह पुंल्लिङ्ग तथा नपुंसकलङ्गि में होता है), सिताभ्र, हिमवालुक, घनसार, चन्द्रसंज्ञ (चन्द्रमा के जितने नाम हैं वे सभी इसके पर्यायवाची शब्द हैं) और हिमनामा (जितने हिम के नाम हैं वे सभी इसके पर्यायवाची शब्द हैं) ये सब कपूर के संस्कृत नाम हैं। कपूर—शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक), नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, लघु, सुगन्धयुक्त, मधुर तथा तिक्त रस युक्त एवम्- कफ, पित्त, विष, दाह, प्यास, मुख की विरसता, मेदरोग तथा दुर्गन्ध को नष्ट करने वाला होता है। पक्व तथा अपक्व इन भेदों से कपूर दो प्रकार का होता है। पक्व की अपेक्षा अपक्व कपूर अधिक गुणकारी होता है ऐसा वैद्य लोग कहते हैं। १-३
१. कपूर
हिं०—कपूर, भीमसेनी कपूर, बरास कपूर। बं०—कर्पूर। मा०—कापूर। म०—कापूर। गु०—कपुर। ते०, ता०—कर्पूरम्। फा०—कापूर। अ०—काफूर। यू०—रियाही काफूर। अं०—Camphor (कैम्फर); Borneo Camphor (बोर्निओ कैम्फर)। ले०—Camphora (कैम्फोरा)। कपूर— यह एक उड़नशील जमा हुआ श्वेत तैलीय पदार्थ है। यह चार प्रकार का होता है। (१) भीमसेनी या बरास कपूर, (२) चीनी या जापानी कपूर, (३) पत्री या नागी कपूर, ब्ल्यूमिया कैम्फर (Blumea Camphor), (४) रासायनिक विधि द्वारा निर्मित कृत्रिम (Synthetic–सिंथेटिक्) कपूर। (१) भीमसेनी कपूर— इसके बहुत बड़े वृक्ष बोर्निओ तथा सुमात्रा में होते हैं। इसे ले०—Dryobalanops camphora Colebr.; Fam. Dipterocarpaceae (ड्रायोबॅलेनॉप्स कॅम्फोरा कोलेडिप्टेरोकार्पेसी) कहते हैं जो भारतीय साल से मिलता-जुलता है। इसके वृक्ष भारतवर्ष में नहीं पाये जाते। इधर कुछ वृक्षों को लगाने का प्रयत्न किया गया है। औषध में बहुत प्राचीन काल से कपूर नाम से इसका व्यवहार किया जाता है। प्राचीनों ने कर्पूर का अपक्व भेद जो कहा है वह संभवतः यही है क्योंकि यह, वृक्ष में जहाँ पोल हो अथवा चीरे पड़े हों वहाँ जमा हुआ ही प्राप्त होता है। इसको चीनी कपूर की तरह पकाकर बनाना नहीं पड़ता। इस वृक्ष से एक तरल द्रव्य भी प्राप्त होता है जिसे कर्पूर तैल (Camphor oil of Borneo) कहा जाता है। यह कपूर चीनी कपूर की अपेक्षा भारी होने के कारण जल में डूब जाता है। यह हवा की उष्णता से उड़ता नहीं। इसे बोतलों में रखने पर इसके कण बोतल पर जमा नहीं होते। यह चीनी कपूर की अपेक्षा अधिक उष्णता से जलता है। इसमें कपूर के अतिरिक्त कुछ अम्बर आदि की मिश्रित गन्ध आती है। इसके छोटे, बड़े, गोल स्फटिक होते हैं जो CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA