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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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३६६ भावप्रकाशनिघण्टुः (७) कपूर का स्थानिक एवं बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। इससे स्थानिक रक्तवाहिनियों की उत्तेजना से उष्णता एवं रक्तिमा उत्पन्न होती है। प्रारम्भ में इससे सांवेदनिक वातनाड़ियाँ उत्तेजित होती हैं लेकिन बाद में अवसादित होने के कारण शीतलता का अनुभव होता है तथा पीड़ा दूर होती है। इसका प्रतिदूषक गुण बहुत अल्प है। यह त्वग्रागकारक एवं प्रतिक्षोभक होने के कारण ४ गुने तेल में मिला कर जीर्ण आमवात, मोच, मरोड़, चोट, मांसपेशियों में ऐंठन होने से उत्पन्न पीड़ा, कटिशूल, पार्श्वशूल एवं जीर्ण कास, बच्चों की खाँसी, फुफ्फुसपाक एवं फुफ्फुसावरणशोथ आदि में इसकी मालिश की जाती है। जननेन्द्रिय कण्डू एवं विचर्चिका में यसद् भस्म एवं कपूर तैल में मिलाकर लगाते हैं। दाँत में गढ़ा होने के कारण दर्द होता हो तो कपूर का मद्यसार में घोल बनाकर उसका फाहा गढ़े में रखते हैं। मुखदुर्गन्धि में स्वल्प खदिरवटिका (भै० र०) अथवा कपूर, कबाबचीनी एवं टंकणक्षार की गोली मुख में रखने से लाभ होता है। दन्तमंजनों में कपूर का उपयोग किया जाता है। जीर्ण व्रणों में तथा कण्डू में इसका अवचूर्णन किया जाता है। विषैला प्रभाव—अत्यधिक मात्रा में कपूर के सेवन से आमाशयोर्ध्व भाग में पीड़ा, हल्लास, कभी-कभी वमन, चक्कर, दृष्टिमान्द्य, प्रलाप, उन्माद, अपस्मार के समान आक्षेप, श्यावता, अंगघात, शीतलप्रस्वेद, मूत्रकृच्छ्र, संन्यास एवं मृत्यु होती है। विष चिकित्सा—वामक द्रव्यों का प्रयोग एवं शीत तथा उष्ण निरूहण बस्ति का क्रम से बारंबार प्रयोग तथा प्रतिक्षोभक, विरेचक एवं उत्तेजक औषधियों का प्रयोग करना चाहिये। कुपीलु सत्त्व का सूचिकाभरण आवश्यकतानुसार किया जाता है। मद्यसार एवं तैलीय पदार्थों का प्रयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि कपूर उनमें घुल जाता है। जीर्ण विषैला प्रभाव—कुछ युवा स्त्रियों में सौन्दर्य वृद्धि के लिये कपूर खाने की आदत पड़ जाती है जिसको छुड़ाना कठिन होता है। इसके कारण साधारण मानसिक उत्तेजना, तन्द्रा, अत्यधिक दौर्बल्य एवं पाण्डुता आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। नोट—कपूर का चूर्ण बनाने के लिये खरल में घोटते समय रेक्टिफाइड स्पिरिट से कपूर आर्द्र कर लेने से आसानी से चूर्ण बन जाता है तथा खरल में चिपकता नहीं। मात्रा—१-२ रत्ती; आसव—५-२० बूँद; कर्पूराम्बु—१-२ औंस। अथ कस्तूरी । तस्या नामभेदगुणानाह औंस मृगनाभिर्मृगमदः कथितस्तु सहस्रभित् । कस्तूरिका च कस्तूरी वेधमुख्या च सा स्मृता ।।५।। कामरूपोद्भवा कृष्णा नेपाली नीलवर्णयुक् । काश्मीरी कपिलच्छाया कस्तूरी त्रिविधा स्मृता ।।६।। कामरूपोद्भवा श्रेष्ठा नेपाली मध्यमा भवेत् । काश्मीरदेशसम्भूता कस्तूरी ह्यधमा मता ।।७।। कस्तूरिका कटुस्तिक्ता क्षारोष्णा शुक्रला गुरुः । कफवातविषच्छर्दिशीतदौर्गन्ध्यशोषहृत् ।।८।। कस्तूरी के नाम, भेद तथा गुण—मृगनाभि, मृगमद, सहस्रभिद्, कस्तूरिका, कस्तूरी और वेधमुख्या ये सब कस्तूरी के संस्कृत नाम हैं। वर्णभेद से कस्तूरी तीन प्रकार की होती है जैसे—(१) कामरूप (कामरूपदेश) में उत्पन्न होने वाली कस्तूरी कृष्णवर्ण की (काली) होती है। (२) नेपाल देश में उत्पन्न होनेवाली नीले रङ्ग की होती है। (३) कश्मीर देश में उत्पन्न होने वाली कपिल वर्ण की होती है। इनमें से कामरूप देश की कस्तूरी उत्तम, नेपाल देश की मध्यम एवम् कश्मीर देश की अधम गुण वाली होती है। कस्तूरी—कटु तथा तिक्त रस युक्त, क्षार गुण विशिष्ट, उष्णवीर्य, वीर्यजनक और गुरु होती है। यह कफ, वायु, विष, वमन, शीत, दुर्गन्ध और शोष को दूर करने वाली होती है। [५-८] ३. कस्तूरी हिं०—कस्तूरी, मृगनाभि, मृगनाफा। बं०—मृगनाभि। ते०—कास्तूरी। म०—गु०—क०—ता०—कस्तूरी। फा०— मुष्क। अं०—Musk (मस्क)। ले०—Moschus (मोस्कस्)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA