भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ३९३ (७) कुष्ठ में इससे साधारण स्वास्थ्य अच्छा होता है तथा इसके प्रयोग से दुर्बलता तथा नाड़ीशूल आदि ठीक होता है। सभी प्रकार के चर्मरोगों में गूगल लाभदायक माना जाता है। इससे कंडू कम होती है तथा त्वचा का वर्ण सुन्दर हो जाता है। (८) व्रणशोथक, व्रणरोपक एवं प्रतिदूषक होने के कारण इसका बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। १० ड्राम जल में १ ड्राम इसका टिंक्चर (९०% मद्यसार में २०%) मिलाकर मसूड़ों की सूजन, पायरिया, दाँतों में गढ़े हो जाना, गले के व्रण, जीर्ण ग्रसनिकाशोथ एवं गलतुण्डिकाशोथ में गंडूष कराया जाता है। पुराने व्रणों के प्रक्षालन के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। फोड़ों की प्रारंभिक अवस्था में इसके गरम लेप से फोड़े बैठ जाते हैं। घी में इसका मलहम बनाकर पुराने व्रणों में प्रयोग किया जाता है। कंठमाला में गूगल को उष्ण जल में घिसकर दिन में तीन चार बार मोटा लेप करने से गाँठें बैठ जाती है। अर्श में इसका लेप एवं धूआँ दिया जाता है। आमाशयोर्ध्वप्रदेश में इसे लगाने से हिचकी तुरंत रुकती है। प्राच्यव्रण (Delhi boil) नामक दिल्ली की तरफ होने वाले व्रण में गूगल, गंधक, सोहागा तथा कत्था इसका मलहम लगाया जाता है। मुखरोगों में गूगल को मुख में रखकर चूसने से लाभ होता हैं। **मात्रा—**२-८ रत्ती।
अथ सरल निर्यासगुग्गुलुः । तस्या नामानि गुणाँश्चाह
श्रीवासः सरलस्रावः श्रीवेष्टो वृक्षधूपकः । श्रीवासो मधुरस्तिक्तः स्निग्धोष्णस्तुवरः सरः ।।४६।। पित्तलो वातमूर्द्धाक्षिश्वररोगकफापहः । रक्षोघ्नः स्वेददौर्गन्ध्यूकाकण्डूव्रणप्रणुत् ।।४७।। **सरलनिर्यास अर्थात् चीड़ के गोंद (गन्धाबिरोजा) के नाम तथा गुण—**श्रीवास, सरलस्राव, श्रीवेष्ट और वृक्षधूपक ये सब गन्धाबिरोजा के संस्कृत नाम हैं। **गन्धाबिरोजा—**मधुर तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, उष्णवीर्य, दस्तावर, पित्तजनक एवं वायु, मस्तक, नेत्र तथा स्वरसम्बन्धी रोग, कफ, रक्षोग्रहबाधा, स्वेद, दुर्गन्ध, जूयें, खुजली और घाव को दूर करता है। [४६-४७]
१६. सरल निर्यास
**हिं०—**गन्धाबिरोजा, विहरोजा, विरोजा, सरल का गोंद, चीड़ का गोंद। **म०—**सरलडीक। **गु०—**बेरजो। क०— श्रीवेष्टक। **ता०—**पिनैमारू। **लिपचा०—**गिएपट। **भो०—**टीडोंग। **नेपा०—**धूप। **पहाड़ी—**विरजेलासा, लीसा। फा०— बारजद, बरजद। **अ०—**किन्न। **अं०—**Oleo-resin of Pine (ओलियो रेजिन् ऑफ पाइन्)। ले०—Oleo-resin of Pinus longifolia and other species (ओलियो रेजिना ऑफ पाइनस लांगिफोलिया अण्ड अदर स्पिसीज)। Fam. Pinaceae (पिनेंसी)। धूपसरल वृक्ष (चीड़) के निर्यास को गन्धाबिरोजा कहा जाता है। इसके वृक्ष तथा स्वरूपादि का वर्णन पहले सरल वृक्ष (पृष्ठ १९८) के अन्तर्गत किया जा चुका है। **रासायनिक संगठन—**इसमें करीब २०% तारपीन का तेल (Turpentine oil) होता है जो ऊर्ध्वपातन यंत्र द्वारा निकाला जाता है। लगभग ८०% भाग अवशेष रहता है। इसके डाक्टरी में रेझिन (रजन) या कोलोफोनि (Resin colophony) कहते हैं। रेझिन (रजन) पारभासक हलके अम्बर के वर्ण का, चमकीला एवं आसानी से टूटने वाला घन पदार्थ होता है। यह तोड़ने पर अन्दर से चमकीला दिखाई देता है। इसमें तारपीन सदृश स्वाद एवं गन्ध होती है। यह जल में अविलेय किन्तु मद्यसार तथा ईथर आदि में आसानी से घुल जाता है। **तारपीन का तेल—**यह सरल वृक्ष के निर्यास (गन्धाबिरोजा) से वाष्प के साथ ऊर्ध्व नलिका यन्त्र से निकाला हुआ तैल है। औषध की अपेक्षा अन्य उद्योगों में इसकी बहुत खपत होती है। सुगन्धि द्रव्य, कृत्रिम कर्पूर, तैलीय रंग एवं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA