भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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४०२ भावप्रकाशनिघण्टुः कर्नाटक तथा उत्तर मलवार प्रान्तों में पाये जाते हैं। इससे जो पत्री निकलती है उसे रामपत्री या बंबई की जायपत्री कहते हैं। ये जंगली जायफल अधिक लम्बे, कम चौड़े, किंचित् मुलायम एवं करीब-करीब गंधहीन होते हैं। ये जायफल की अपेक्षा हीन गुण वाले होते हैं। कभी-कभी खराब जायफल तथा मिट्टी आदि मिलाकर साँचे के द्वारा बने हुए नकली जायफल भी बाजार में बिकते हैं। मात्रा-चूर्ण २-८ रत्ती; तैल १-५ बूँद। अथ जातीपत्री। तस्य नामानि गुणाँश्चाह जातीफलस्य त्वक् प्रोक्ता जातीपत्री भिषग्वरैः ।।५६।। जातीपत्री लघुः स्वादुः कटूष्णा रुचिवर्णकृत् । कफकासवमिश्र्वासतृष्णाकृमिविषापहा ।।५७।। जावित्री के नाम तथा गुण-वैद्यों में जो श्रेष्ठ हैं वे लोग 'जायफल' के छिल्के को ही 'जावित्री' कहते हैं। जातीपत्री या जातिपत्री और जातिकोष आदि संस्कृत नाम 'जावित्री' के हैं। जावित्री-लघु, स्वादिष्ट, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, रुचिजनक तथा वर्णकारक होती है एवम् यह कफ, खाँसी, वमन, श्वास, तृष्णा, कृमि और विषविकार इन सबों को दूर करने वाली भी होती है। [५६-५७] २१. जावित्री हिं०-जावित्री, जायपत्री। बं०-जायित्री, जैत्री। म०-जायपत्री। गु०-जावंत्री। क०-जायपत्री। ते०- जातिपत्री। फा०-बज्बाज। अ०-बस्बास(सः)। अं०-Mace (मेस)। ले०-Myristica fragrans Houtt (मायुरिस्टिका फ्रैग्रेन्स आउट)। Fam. Myristicaceae (मायरिस्टिकेंसी)। जिस वृक्ष से जायफल उत्पन्न होता है उसी से जावित्री भी उत्पन्न होती है। इस वृक्ष के वास्तविक फल के भीतर के बीज (जायफल) से लिपटा हुआ लालरङ्ग का जालीदार जो वेष्टन दिखाई देता है वही जावित्री है। अन्य वानस्पतिक वर्णन जायफल के साथ पहले किया जा चुका है। रासायनिक संगठन-इसमें जायफल की तरह ही एक उड़नशील तैल ८-१७% पाया जाता है। इसके अतिरिक्त स्थिर तैल, राल, वसा, शर्करा, डेक्स्ट्रीन एवं गोंद आदि पदार्थ इसमें होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण जायफल के समान होते हैं। यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, कफहर, रुचिकर, वर्ण्य एवं वृष्य हैं। इसका उपयोग कास, कफयुक्त श्वास, क्षयरोग, मन्दज्वर, वमन, आँतों के जीर्ण विकार, विसूचिका एवं कृमि आदि में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती। अथ लवङ्गम्। तस्य नामानि गुणाँश्चाह लवङ्गं देवकुसुमं श्रीसंज्ञं श्रीप्रसूनकम्। लवङ्गं कटुकं तिक्तं लघु नेत्रहितं हिमम्।।५८।। दीपनं पाचनं रुच्यं कफपित्तास्रनाशकृत्। तृष्णां छर्दिं तथाऽऽध्मानं शूलमाशु विनाशयेत्। कासं श्वासञ्च हिक्काञ्च क्षयं क्षपयति ध्रुवम्।।५९।। लौंग के नाम तथा गुण-लवङ्ग, देवकुसुम, श्रीसंज्ञ (लक्ष्मीवाचक सम्पूर्ण शब्द लवङ्गवाचक हैं) और श्रीप्रसूनक ये सब 'लौंग' के संस्कृत नाम हैं। लौंग-कटु तथा तिक्त रस युक्त, लघु, नेत्र के लिये हितकर, शीतवीर्य, अग्नि को CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA