भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ४०९ रासायनिक संगठन-इसमें ०.८% उड़नशील तैल, ४% राल, १४.६% गोंद युक्त निस्सार (टैनिन सहित), ६४.३% लिगनिन (Lignin) तथा बॅरसोरिन (Bassorin), १६.३% जल एवं रंजक द्रव्य ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-चीनी दालचीनी बहुत ही आल्हादकारक एवं फलप्रद सुगन्धि द्रव्यों में से हैं। यह उष्ण, आमाशय के लिये उत्तेजक, वातानुलोमक एवं ग्राही है। यह सार्वदैहिक उत्तेजक की अपेक्षा स्थानिक उत्तेजक है। यद्यपि इसका स्वतंत्र प्रयोग कम किया जाता है तथापि इसके फांट या चूर्ण से हल्लास दूर होता है तथा आध्मान में लाभ होता है। अतिसार में अन्य ग्राही औषधों के साथ तथा अन्य अनेक मिश्रणों में सहायक द्रव्य के रूप में इसका व्यवहार किया जाता है। मात्रा-२ १/२-१० रत्ती। अथ दारुसिता (दालचीनी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह त्वक्स्वाद्धी तु तनुत्वक्स्यात्तथा दारुसिता मता ।।६६।। उक्ता दारुसिता स्वाद्धी तिक्ताचानिलपित्तहृत् । सुरभिः शुक्रलाबल्या¹ मुखशोषतृषापहा ।।६७।। दालचीनी के नाम तथा गुण-त्वक्, स्वाद्धी, किंवा त्वक्स्वाद्धी, तनुत्वक् तथा दारुसिता ये सब 'दालचीनी' के संस्कृत नाम हैं। दालचीनी-स्वादिष्ट, तिक्तरसयुक्त, वातपित्तनाशक, सुगन्धयुक्त, शुक्रजनक, बलकारक ('वर्ण्या¹ पाठान्तर में-शरीर के रङ्ग को सुन्दर करने वाली), मुखशोष तथा तृषा को दूर करने वाली होती है। [६६-६७] २६. दालचीनी हिं०-दालचीनी, दारचीनी। बं०-दारुचीनी। म०-दालचीनी। गु०-तज। ते०, मल०-लवंग पत्तै। ता०- कन्त्रलवंग पत्तै। अ०-दारसीनी, किर्फा। फा०-दारचीनी। अं०-Cinnamon Bark (सिर्नमोन् वार्क)। ले०- Cinnamomum Zeylancum Blume (सिन्नेमोमम् झेलॅनिकम्, ब्लूम)। Fam. Lauraceae (लॉरिसी)। इसके वृक्ष लंका तथा दक्षिणी भारत में पाये जाते हैं। लंका, दक्षिण भारत, मार्टिनिक्यू, कैन्ने, जमइका, ब्राझील तथा सेचिलीस में इसकी खेती की जाती है। इसका वृक्ष-साधारण ऊँचाई का एवं सदा हरित होता है। छाल-कुछ मोटी, चिकनी तथा हलके रंग की होती है छोटी शाखाएँ कुछ दबी हुई एवं नये भाग चिकने रहते हैं किन्तु कलिकाएँ महीन सिल्क की तरह रहती हैं। पत्ते- प्रायः विपरीत, कड़े तथा चर्मवत्, ३-८ इञ्च लम्बे, १।।-३ इञ्च चौड़े, लट्वाकार या लट्वाकार-भालाकार, नुकीले अग्रयुक्त, चिकने, ऊपर से चमकीले किन्तु नीचे से कुछ हलके एवं फलकमूल की तरफ तीक्ष्ण या गोलाई लिये हुए होते हैं। नाड़ियाँ-३-५ प्रधान नाड़ियाँ रहती हैं जिनके बीच महीन जालीदार नाड़ियाँ रहती हैं। पर्णवृन्त-१/२-१ इञ्च लम्बा तथा ऊपर से चपटा रहता है। पुष्प-बहुत एवं प्रायः पत्तों से लम्बे सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों में जो सिल्क की तरह मृदुरोमश होते हैं। पुष्पदंड (Peduncle) लम्बे, प्रायः एक साथ गुच्छों में, चिकने या मृदुरोमश एवं पुष्पवृन्त (Pedicle) लम्बे होते हैं। परिपुष्प ५-६ मि० मि० लम्बे; नलिका १ इञ्च लम्बी एवं दल मृदुरोमश, आयताकार या कुछ अभि-लट्वाकार एवं प्रायः कुण्ठिताग्र रहते हैं। फल-१.३-१.७ से० मि० लम्बे, आयताकार या लट्वाकार- आयताकार, शुष्क या किंचित् मांसल, गहरे बैंगनी रंग के एवं ८ मि० मि० व्यास के संवृद्ध घंटिकाकार परिपुष्प से घिरे हुये रहते हैं। इस वृक्ष के झाड़ियों को काटने के बाद उत्पन्न नवीन प्ररोहों की सूखी हुई अन्दर की छाल को औषध के लिये लिया जाता है। इसे सिलोनी दालचीनी कहा जाता है। यह सर्वोत्तम दालचीनी होती है। इसकी एक साथ बँधी हुई १. वर्ण्या इति पाठ०।