भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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४१४ भावप्रकाशनिघण्टुः (८) इसके पत्ते तथा फूलों का उपयोग बिच्छू एवं सर्पदंश में किया जाता है। (९) हाथ-पैरों की जलन में नागकेशर को शतधौत घृत में मिलाकर लगाने से जलन दूर होती। मात्रा-४ र० से १ माशा। लाल नागकेशर (२) सं०-सुरपुन्नाग, नमेरु, सुरपर्णिका। हिं०-लाल नागकेशर। म०-सुरंगी (वृक्ष), गोडी उंडी (फल), तांबडे नागकेशर। गु०-रांतु नागकेशर। अं०-Alexandrian Laurel (ॲलेक्झॉण्ड्रियन् लॉरिल्)। ले०-Ochrocar pus tongifolius Benth. & Hook. f. (ओक्रोकार्पस् लॉँगिफोलिअस् बेन्थ, हुक्)। Fam. Guttiferae (गटिफेरी)। यह पश्चिम प्रायद्वीप के जंगलों में कनारा से कोकण तक पाया जाता है। उत्तरी सरकार में यह लगाया हुआ मिलता है। इसका वृक्ष-साधारण ऊँचा तथा सदा हरित होता है। पत्ते-६-८ इञ्च लम्बे, १।।।२।। इञ्च चौड़े, आयताकार, मोटे, चर्मवत् एवं सुन्दर शिराजाल से युक्त होते हैं। पुष्प-अनेक, ४ अन्तर्दल वाले, लाल रेखांकित, श्वेत रंग के, गुच्छों में आते हैं। फल-१ इञ्च लम्बे, अण्डाकार, नुकीले तथा एक बीज से युक्त होते हैं। फलों के गूदों को लोग खाते हैं। सूखी हुई पुष्पकलिकाओं को लाल नागकेशर कहा जाता है। यह गोल, नुकीले, नारंगरक्त रंग के तथा करीब ¹/₂ इञ्च लम्बे पुष्पवृन्त से युक्त होते हैं। गुण और प्रयोग-इसका उपयोग असली नागकेशर (मेसुआ फेरिआ) के स्थान पर किया जाता है। गुणों में उसके समान होते हुए भी यह कुछ न्यून गुण वाला है। इसके पुष्पों का अर्क निकालकर ज्वर में रोगी के स्नान के लिये प्रयोग करते हैं। इससे रोगी को आह्लाद मालूम होता है। यह उत्तेजक, सुगंधित, ग्राही, कडुवा एवं दीपन है। अत्यधिक प्यास, आमाशयिक प्रक्षोभ, अर्श, कुपचन तथा अतिसार में इसका प्रयोग करते हैं। मात्रा-१-३ माशा। नोट-कुछ लोग इसी वर्ग के पुन्नाग वृक्ष की कलिकाओं का भी उपयोग नागकेशर के नाम से करते हैं। इसे ले०-Calophyllum inophyllum Linn. (कॅलोफाइलम् आइनोफाइलम् लिन.); हिं०-सुलतानचंपा; म०-उंडी, उंडल कहते हैं। इसका बहुत सुन्दर वृक्ष दक्षिण भारत के समुद्री किनारे पर तथा अन्य स्थानों पर लगाया हुआ मिलता है। पत्ते-वड़ के पत्र जैसे लम्बगोल ४ से ६ इञ्च लम्बे तथा ३ से ४ इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्प-सफेद रंग के चार दल वाले और सुगंधित होते हैं। फल-गोल, १ से १ ¹/₂ इञ्च लम्बे, चिकने तथा पीले रंग के आते हैं। इसके बीजों से तैल निकालते हैं, जिसे सर्पन का तैल कहते हैं। पुन्नाग-यह मधुर, शीत सुगन्धि और पित्तनाशक है। इसका तैल पुराने संधिवात में मालिश करते हैं। खुजली तथा सर की फुन्सियों में तैल लगाते हैं। सोजाक में इस तैल को खिलाते हैं। अथ त्रिजातकं चातुर्जातकं च। तयोर्लक्षणं गुणाँश्चाह त्वगेलापत्रकैस्तुल्यैस्त्रिसुगन्धि त्रिजातकम्। नागकेशरसंयुक्तं चातुर्जातकमुच्यते ।।७२।। तद् द्वयं रोचनं रूक्षं तीक्ष्णोष्णं मुखगन्धहृत्। लघुपित्ताग्निकृद्वर्ण्यं कफवातविषापहम् ।।७३।। 'त्रिजातक' तथा 'चातुर्जातक' बोधक द्रव्य तथा उनके एकत्र गुण-दालचीनी, इलायची और तेजपात इन्हीं तीनों द्रव्यों का समभाग में योग होने से उसे 'त्रिसुगन्धि' या 'त्रिजातक' कहते हैं और यदि उन्हीं द्रव्यों में समभाग से CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA