भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

द्वितीयो भागः विषय-सूची ४५ जिह्वा की परीक्षा १०६४ | अत्यन्त बढ़े हुए दोषादि के कारण तथा लक्षण १०७६ मूत्र की परीक्षा १०६४ | मेदोवृद्धि के लक्षण १०७७ स्पर्शद्वारा नाडी की परीक्षा १०६४ | दोष, धातु तथा मलों के कम होने के कारण १०७८ रोग जानने के कारण १०६५ | क्षीण हुए दोषादि के लक्षण १०७८ हेतु का लक्षण १०६५ | ओज के क्षय होने का कारण १०७९ सम्प्राप्ति के लक्षण तथा भेद १०६६ | ओज के क्षय होने के लक्षण १०७९ विकल्पसम्प्राप्ति १०६७ | मल के क्षय होने के लक्षण १०७९ प्राधान्यसम्प्राप्ति १०६७ | मूत्रादि के क्षय होने के लक्षण १०७९ बलसम्प्राप्ति का व्याख्यान १०६७ | क्षीण हुये दोष, धातु तथा मलों को बढ़ाने कालसम्प्राप्ति का व्याख्यान १०६७ | की विधि १०८० वातादि दोषों में कौन दोष किस ऋतु में | वात से क्षीण हुआ मनुष्य १०८० प्रकुपित होता है १०६८ | मांस से क्षीण हुआ मनुष्य १०८० पूर्वरूप के लक्षण १०६८ | भेद से क्षीण हुआ मनुष्य १०८१ लक्षण के लक्षण १०६९ | बल का क्षय होने में कारण १०८१ उपशय के लक्षण १०६९ | बलक्षय के लक्षण १०८२ वायु के उपशय १०७० | बलवृद्धि के कारण १०८२ पित्त के उपशय १०७० | बलवान् तथा निर्बल के प्रधान लक्षण १०८२ कफ के उपशय १०७० | परिशिष्ट- १ रोगों के निदान का विवेचन १०७० | अस्थियों के विषय में-संक्षिप्त विवरण १०८३ वायु के प्रकुपित होने के कारण १०७१ | मांस धातु १०८६ पित्त के प्रकुपित होने के कारण १०७२ | नारी-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण १०८९ विदाही के लक्षण १०७२ | पुरुष-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण १०९२ कफ के प्रकुपित होने के कारण १०७३ | आर्त्तव-गर्भाधान तथा बन्ध्यत्व का संक्षिप्त रोग के कारण स्वरूप रोग की विचित्रता १०७४ | विवरण १०९४ बढ़े तथा क्षीण हुए दोष, धातु तथा मल की | परिशिष्ट- २ सुश्रुतोक्त चिकित्सा १०७४ | अकारादि-क्रमानुसार निघण्टुभाग-स्थित द्रव्यों के स्वस्थ मनुष्य के लक्षण १०७५ | व्यवहारोपयोगी अङ्ग तथा उनकी मात्राएँ ११०१