भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ४५३ अथ बिल्वः (बेल) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बिल्वः शाण्डिल्यशैलूषौ मालूरश्रीफलावपि ।१ श्रीफलस्तुवरस्तिक्तो ग्राही रूक्षोऽग्निपित्तकृत् ।। वातश्लेष्महरो बल्यो लघुरुष्णश्च पाचनः ।।१३।। बेल के नाम तथा गुण-बिल्व, शाण्डिल्य, शैलूष, मालूर और श्रीफल ये सब संस्कृत नाम बेल के हैं । बेल- कषाय तथा तिक्त रस युक्त, ग्राही, रूक्ष, अग्निवर्धक, पित्तकारक, वात कफनाशक, बलकारक, लघु, उष्णवीर्य तथा पाचक है । [१३] ३. बेल हिं०-बेल, श्रीफल । बं०, म०-बेल । गु०-बीली । क०-बेलपत्रे । ते०-मारेडु, बिल्वपंडु । ता०- बिल्वम, बिल्वपझम । मा०-बील, बोलो । मल०-कुवलप-पैझम । सिन्ध०-बिल, कटोरी । उडि०-बेलो । अ०- सफरजले हिंदी । फा०-वेह हिंदी, बल, शुल्ल । अं०-Bengal Quince (बेंगॉल् क्विन्स); Bael fruit (बेल फ्रुट) । ले०-Aegle marmelos Corr. (इगल् मार्मेलोस कॉर) । Fam. Rutaceae (रूटेंसी) । यह आसाम, ब्रह्मा, बंगाल, बिहार, युक्तप्रान्त, अवध, झेलम, मध्य और दक्षिण हिन्दुस्तान तथा सिलोन में जंगली और प्रायः सभी स्थानों में बागी दोनों प्रकार से उत्पन्न होता है । इसका वृक्ष-मध्यमाकार का ५० फुट से भी ऊँचा होता है । शाखाओं पर सीधे, मोटे, तीक्ष्ण एक इञ्च तक लम्बे काँटे होते हैं । टहनियों पर पत्ते विषमवर्ती रहते हैं । प्रत्येक सींक पर तीन-तीन पत्रकों से युक्त पत्ते रहते हैं । पत्रक- कसोंदी के पत्तों के आकार वाले एवं अंडाकार-भालाकार होते हैं । बीचवाला पत्ता अन्य दो से कुछ बड़ा होता है । फाल्गुन- चैत्र में पुराने पत्ते गिर जाते हैं और चैत्र-वैशाख में क्रम से नवीन पत्ते निकल आते हैं । इसी समय में हरियाली लिये सफेद रङ्ग के, ४, ५ पंखड़ियों (अन्तर्दल) वाले एवं करीब १ इञ्च चौड़े फूल लगते हैं और उनमें मधु के समान मन्द गन्ध निकलती है । फल-(बीजिमांसल फल-Berry) गोलाकार ३-८ इञ्च व्यास के, हरिताभ रंग के, पकने पर पीताभ भूरे रंग के एवं चिकने होते हैं । बहिर्भित्ति (Epicarp) से बाह्य कठोर काष्ठमय छिलका बनता है जो करीब ३ मि० मि० मोटा, रक्ताभ रंग का एवं अन्दर से रेशेदार होता है । मध्यभित्ति एवं अन्तर्भित्ति से गूदा बनता है जो आवरण से चिपका हुआ तथा हलके रक्ताभ नारंगी रंग का होता है । बीज-बहुत, १०-१५ समूहों में, बिनौले के सदृश सफेद रोमों से युक्त एवं चिकने तथा रंगहीन गोंद से लिपटे रहते हैं । फलों में मन्द सुगंध आती है तथा इनका स्वाद गोंद की तरह होता है । बेल के दो तरह के फल होते हैं । लगाये हुये फल बड़े, सुस्वादु एवं कम बीज वाले होते हैं । जंगली फल छोटे, कुछ मादक एवं इसके बीज अधिक गोंद से लिपटे होते हैं तथा ये मछली मारने के काम में आते हैं । बेल अपने यहाँ बहुत पवित्र माना गया है । सूतिकागार के निर्माण में एवं सूतिका के पलंग की लकड़ी बेल की लेने का चरकादि में विधान है । सुश्रुत में मेधायुष्कामीय अध्याय (चि० अ० २८) में विशिष्ट पद्धति से ऋग्वेदोक्त श्रीसूक्त के द्वारा बिल्व की आहुति आदि का विधान किया है जिससे अलक्ष्मी का नाश एवं आयुवृद्धि होती है । बेल के मूल, त्वचा, पक्व-अपक्व फल, पत्र एवं पुष्प का औषध में व्यवहार किया जाता है । चूर्णादि के लिये कच्चे फल का, मुरब्बे के लिये अधपके फल का और पानक के लिये परिपक्व फल का गूदा लेना चाहिये । दशमूल आदि कषायों में मूल या वृक्ष की त्वचा ली जाती हैं । रासायनिक संगठन-बेल के फलों में गोंद एवं पेक्टिन (Pectin) के अतिरिक्त प्रहासक (Reducing) शर्करा ३.७%, संपूर्णशर्करा ४.६%, तैल जिसमें मार्मेलोसिन Marmelosin, C₁₃ H₁₂ O₃) नामक एक महत्त्व का रवेदार १. गन्धगर्भः शलाटुश्च कण्टकी च सदाफलः । (क्वाचित्कः) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA