भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ४५७ अथ पाटला (पाढला) घण्टापाटलिंश्च । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह पाटलि पाटलाऽमोघा मधुदूतो फलेरुहा । कृष्णवृन्ता कुबेराक्षी१ कालस्थाल्यलिवल्लभा ॥१९॥ ताम्रपुष्पी च कथिताऽपरा स्यात्पाटला सिता । मुष्कको मोक्षको घण्टापाटलिः काष्ठपाटला ॥२०॥ पाढल तथा घण्टापाढल के नाम और गुण-पाटलि, पाटला, अमोघा, मधुदूती, फलेरुहा, कृष्णवृन्ता, कुबेराक्षी, कालस्थाली, अलिवल्लभा और ताम्रपुष्पी ये सब संस्कृत नाम 'पाढल' के हैं। और जो दूसरा 'घण्टापाढल' है उसके संस्कृत नाम-पाटला सिता, मुष्कक, मोक्षक, घण्टापाटलि तथा काष्ठपाटला ये सब हैं। [१९-२०] पाटला तुवरा तिक्ताऽनुष्णा दोषत्रयापहा । अरुचिश्वासशोथास्रच्छर्दिहिक्कातृषाहरी ॥२१॥ पाढल-कषाय तथा तिक्तरस युक्त एवं अनुष्णवीर्य है। यह त्रिदोष, अरुचि, श्वास, शोथ, रक्तप्रकोप, वमन, हिचकी और तृषा को दूर करने वाली है। [२१] अथ तत्पुष्पफलयोर्गुणानाह पुष्पं कषायं मधुरं हिमं हृद्यं कफास्रनुत् । पित्तातिसारहृत्कण्ठ्यं फलं हिक्काऽस्रपित्तहृत् ॥२२॥ इसके फूल तथा फल के गुण-फूल-कषाय तथा मधुर रस युक्त, शीतवीर्य, हृदय को हितकर तथा कफ, रक्तविकार और पित्तातिसार का नाशक एवं कण्ठ के लिये हितकर है। फल-हिचकी तथा रक्तपित्त का नाशक हैं। [२२] नोट-भावप्रकाशकार पाटला के दो भेद लिखते हैं एक 'पाटला' तथा दूसरी 'सिता पाटला'। किन्तु दोनों के गुणों में कोई भेद नहीं लिखा है। आधुनिक ग्रन्थकारों ने भी इसके दो प्रकार के वृक्षों का वर्णन किया है जिसमें से नं० ५ (पाटला) के पुष्प बाहर से लाल किन्तु अन्दर से पीली रेखाओं से युक्त होते हैं। यह दक्षिण में कम होने के कारण इसके स्थान पर वहाँ नं० ६ (सिता पाटला) का प्रयोग किया जाता है जिसके पुष्प पीले तथा गुलाबी रंग के होते हैं। श्री ठा० बलवन्तसिंह जी का मत है-काष्ठपाटला, मोक्षक यह भिन्न वर्ग तथा प्रजाति का वृक्ष है जिसका लैटिन नाम Schrebera swietenioides Roxb. (श्रेबेरा स्वीटेनिओइडिस् राक्स०); Fam. Oleaceae (ओलिएसी) है तथा इसी के क्षार को क्षार श्रेष्ठ कहा गया है। भावप्रकाशकार ने भी इसका (मोक्षक) स्वतंत्र वर्णन आगे वटादिवर्ग में किया है। इस दृष्टि से मोक्षक यह पाटला का पर्याय असमीचीन लगता है। ५. पाढल हिं०-पाढ़ल, पाडर, पारल। बं०-पारुल गाछ। म०, गु०-पाड़ल। क०-हुडै। उ०-बोरो, पाटुली। पं०-पाढ़ल, पाडल। कोल०-कंडियोर। सन्ता०-पपरी, पडेर। ने०-परैर। लि०-सिगियन। गोंड०-उन्तकार, पड़र। मील०-पन, डन। म०-पाडल, पडियालु। ले०-Stereospermum suaveolens DC. (स्टेरियोस्पर्मम् स्वावियोलेन्स डीसी)। Fam. Bignoniaceae (बिग्नोनिएसी)। यह प्रायः समस्त भारत, हिमालय की तराई से ट्रावनकोर और टेन स्रीम तक तथा सिलोन में किन्तु श्वेत भेद की अपेक्षा कुछ शुष्क भागों में पाया जाता है। इसका वृक्ष-३० से ६० फुट तक ऊँचा एवं सुन्दर होता है। इसके ऊँचे स्तम्भ पर शाखाएँ दिखाई पड़ती हैं। इसके नवीन भाग चिपचिपे, रोमश और ग्रन्तिमय होते हैं। छाल-चौथाई इञ्च मोटी, लगभग चिकनी, धूसर और काटने पर हलके पीले रंग की होती है और उसमें कड़े तथा मुलायम पर्त बारी-बारी से निकलते हैं। पत्ते-विपरीत, १-२ फीट लम्बे और अयुग्म पक्षाकार होते हैं। पत्रक-संख्या में ५-९ प्रायः ७, १. काचस्थाली इति पाठ०।