भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५२१ बहुत ही अल्प मात्रा में रहते हैं। इसके वृक्ष-छोटे तथा इसकी छाल लाल-भूरे रंग की करीब-करीब चिकनी होती है। इसके मूल-गहरे भूरे रङ्ग के या काले तथा कुटज से कम कडुवे होते हैं। इसके पत्र-कुटज से छोटे होते हैं। इसके पुष्प-श्वेत चमेली की तरह तथा सुगन्धित होते हैं। फलियाँ-दो-दो एक साथ अग्र पर परस्पर जुड़ी हुई (फटने के समय दोनों अलग), ३-१२ इञ्च लम्बी और पृष्ठ पर सफेद दागों से युक्त होती हैं। बीज-१/२ से ३/४ इञ्च लम्बे, आधार के निचले सिरे पर श्वेत रेशमी तूल गुच्छ से युक्त एवं अन्त में नुकीले होते हैं। संस्कृत में इसको असित कुटज या स्त्रीकुटज कहते हैं तथा इसके बीजों को हिन्दी में मीठा इन्द्रजव कहा जाता है। गुण और प्रयोग-अल्प मात्रा में इससे आमाशय तथा यकृत की क्रिया सुधरती है लेकिन अधिक मात्रा से वमन तथा विरेचन होता है। (१) इसके पत्तों का स्वरस १/२ चम्मच की मात्रा में कर्नाटक, तेलगुप्रांत और मद्रास की तरफ कामला के लिये बहुत व्यवहार में आता है। (२) सड़े हुये दाँत के गढ़े के अन्दर इसके पत्तों को पीसकर रखने से दन्तशूल दूर होता है लेकिन यह मसूड़े तथा गाल में नहीं लगाना चाहिये, अन्यथा इससे दाह उत्पन्न होता है। (३) इसके पत्तों तथा छाल का क्वाथ अन्य कडुवी औषधियों के साथ दीपक, पाचक, बल्य तथा ज्वरहर है। इसका उपयोग ज्वर के पश्चात् अथवा अन्य तीव्र रोगों की संनिवृत्तावस्था में एवं पाचनसंस्थान के विकारों (Bowel complaints) में किया जाता है। (४) मीठा इन्द्रजव बलवर्धक है तथा धातुपौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। अथ कण्टककरञ्जघृतकरञ्जौ । (करञ्ज-करञ्जभेद) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह करञ्जो नक्तमालश्च करजश्चिरबिल्वकः । घृतपूर्णकरञ्जोऽन्यः प्रकीर्यः पूतिकोऽपि च ।।११९।। स चोक्तः पूतिकरञ्जः सोमवल्कश्च स स्मृतः। करञ्जः कटुकस्तीक्ष्णो वीर्योष्णो योनिदोषहृत् । कुष्ठोदावर्त्तगुल्मार्शोव्रणकृमिकफापहः ।।१२०।। करञ्ज के भेद, नाम तथा गुण-करञ्ज के दो भेद होते हैं-१. कण्टककरञ्ज, २. घृतकरञ्ज । 'कण्टककरञ्ज' के संस्कृत नाम-करञ्ज, नक्तमाल, करज और चिरबिल्वक ये सब हैं। 'घृतकरञ्ज' के संस्कृत नाम-प्रकीर्य, पूतिक, पूतिकरञ्ज और सोमवल्क ये सब हैं। करञ्ज-कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, योनिदोष को दूर करने वाला तथा कुष्ठ, उदावर्त्त, गुल्म, बवासीर, व्रण, कृमि तथा कफ का नाशक होता है। [११९-१२०] अथ करञ्जपत्रफलगुणानाह तत्पत्रं कफवातार्शःकृमिशोथहरं परम्। भेदनं कटुकं पाके वीर्योष्णं पित्तलं लघु ।।१२१।। तत्फलं कफवातघ्नं मेहार्शःकृमिकुष्ठजित् । घृतपूर्णकरञ्जोऽपि करञ्जसदृशो गुणैः ।।१२२।। करञ्ज के पत्ते तथा फलों के गुण-करञ्ज के पत्ते कफ, वायु, बवासीर, कृमि तथा शोथ को अत्यन्त नष्ट करने वाले होते हैं। ये मल को भेदन करने वाले, पाक में कटु रस युक्त, उष्णवीर्य, पित्तजनक तथा लघु होते हैं। इसके फल-कफ, वात, प्रमेह, बवासीर, कृमि और कुष्ठ नाशक होते हैं। घृतकरञ्ज के गुण भी करञ्ज के समान ही हैं ।[१२१- १२२] नोट-भावप्रकाशकार करञ्ज के ३ भेद-(१) करञ्ज (नक्तमाल, चिरबिल्व), (२) घृतकरञ्ज (प्रकीर्य, पूतिकरञ्ज, सोमवल्क) एवं (३) करञ्जी (उदकीर्य, षड्ग्रन्था, हस्तिवारुणी) लिखते हैं जिनमें से प्रथम दो के गुण समान लिखे हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA