भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 574, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५२३ (२) वातिक पीड़ा, आमवात तथा संधिवात में इसके पत्तों के क्वाथ से सेंकते हैं तथा इसके बीजों के तैल में मालिश करते हैं। (३) दुर्गन्धयुक्त व्रण की शुद्धि के लिए तथा नाड़ीव्रण के पूरण के लिये इसके मूल का स्वरस लगाते हैं। (४) सोजाक में इसकी जड़ का स्वरस, नारियल का दूध एवं चूने का जल मिलाकर देते हैं। (५) इसके बीजों का चूर्ण ज्वरहर तथा बल्य मानते हैं। कुकास एवं अन्य प्रकार की खाँसी में इसके बीज को घिसकर देने से लाभ होता है। (६) इसके पत्तों को अपचन, अतिसार, आध्मान तथा गुल्म में खिलाते हैं। इससे उदरशूल कम होता है एवं अन्न का पाचन भी ठीक होता है। शीतपित्त में पत्र-स्वरस, दही, नमक एवं काली मिर्च के साथ देते हैं। (७) मधुमेह में इसके पुष्पों का फाण्ट पिलाते हैं। खालित्य में पुष्प पीस कर सर पर बाँधते हैं। (८) व्रणशोथ पर इसके पत्तों को निर्गुण्डी के पत्तों के साथ पीस कर बाँधने से सूजन कम हो जाती है। (९) रक्तार्श में इसके मूल को गोमूत्र में पीस कर पिलाते हैं तथा पथ्य में तक्र देते हैं। मात्रा-बीज १/२ - २ १/२ रत्ती बच्चों को, १ माशा बड़ों को; मूलस्वरस ३ माशा; छाल १.३ माशा। ५४. करंज (कंट करंज) सं०-पूतिकरंज, लताकरंज, कण्टकिकरंज, विटपकरंज, कुबेराक्ष, प्रकीर्य। हिं०-करंज, करंजवा, करंजुआ, कंटकरंज (जा), कंजा, करंजु, कटकलेजा, सागरगोटा। बं०-काँटा करंजा, नाटा करंजा, नाटा। म०-सागर गोटा, गज्रा, गजरघोटा, गाजगा। गु०-कांचका, कांक। क०-गज्जिकेकायि। ते०-गच्चकाय। ता०-कझ शिक्के। मला०- कलंचिकुरु। फा०-खाये इब्लीस। अ०-अक्तमक्त, इज्जुलविलादत। अं०-Bonduc nut (बॉण्डक् नट्); Physic nut (फ़िज़िक् नट्); Fever nut (फीवर् नट्)। ले०-Caesalpinia bonducella Fleming (सिसल्पिनिआ बॉण्डयुसेल्ला फ्लेमिंग); C. crista Linn. (सि० क्रिस्टा लिन.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह भारतवर्ष, वर्मा एवं लंका के उष्ण प्रदेशों में विशेषकर समुद्री किनारों पर तथा पहाड़ियों पर २५०० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। यह बंगाल तथा दक्षिण में बहुत होता है। इसे खेत और बागों की मेंड पर लगाते हैं। इसके सघन एवं विस्तृत काँटेदार गुल्म या लता होती है। शाखाएँ-फैली हुई तथा आरोहणशील होती हैं। इन पर सीधे, तीक्ष्ण तथा पीले रंग के काँटे होते हैं। छोटी शाखाएँ घनर्रोमश होती हैं। उपपत्र (Stipules) ६-८ जोड़े, २-३ इञ्च लम्बे तथा पत्र के आधार पर रहते हैं। पत्ते-संयुक्त द्विपक्षकार तथा १-२ फीट लम्बे होते हैं। पत्रदण्ड के काँटे टेढ़े होते हैं। पत्रक-६-९ जोड़े, ३/४-१ १/२ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च चौड़े, मुलायम, पतले, लट्वाकार, आयताकार, रोमश कुण्ठिताग्र, ऊपर से चिकने किन्तु अधो पृष्ठ मृदुरोमश एवं अत्यन्त सूक्ष्म वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-हल्के पीले तथा लम्बी मंजरियों में होते हैं। फलियाँ-चौड़ी, आयताकार, २-३ इञ्च लम्बी, करीब २ इञ्च चौड़ी, १-२ बीजों से युक्त और ऊपर से काँटों से ढँकी रहती हैं। बीज-संख्या में १-२, गोल या अंडाकार, करीब १/२- ३/४ इञ्च बड़े, सीसे के रंग के चिकने तथा कठोर आवरण वाले होते हैं। बीजों के अन्दर पीताभ श्वेत रंग का गूदा रहता है जो स्वाद में अत्यन्त कड़वा होता है। बीजों को फूलने तक सेंक कर या केवल फोड़कर अन्दर का गूदा निकालकर काम में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त पत्र एवं मूलत्वक् का भी चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसके बीजों में मज्जा करीब ४२% एवं छिलका ५८% होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA