भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५२५ नोट-यह भी करंज का एक भेद है। पहले वर्णन किये हुए वृक्ष करंज एवं लताकरंज के अतिरिक्त एक तीसरा भेद चिरबिल्व नाम से पाया जाता है जिसका यहाँ वर्णन किया गया है। भावप्रकाशकार चिरबिल्व नाम नक्तमल के पर्याय में लेते हैं। कुछ लोग उदकीर्य नाम नक्तमाल के लिये उचित मानते हैं जो यहाँ करंजी के पर्याय में आया है। ५५. चिरबिल्व (करंजभेद) सं०-चिरबिल्व, पूतिकरंज। हिं०-चिलबिल, चिरमिल, पापरी, करंजी, बनचिल्ला। म०-वावल। गु०- कणझो, चरेल। उड़ि०-दुरंजा, करंजी। ता०-अयम्। ते०-जविलि। क०-रसविज। ले०-Holoptelia integrifolia Planch. (हॉलोप्टेलिआ इण्टेग्रि-फोलिआ प्लॅच)। Fam. Ulmaceae (अल्मॅसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेश, अजमेर, बुंदेलखंड, बिहार, आसाम एवं पश्चिम प्रायद्वीप में प्रायः घाटियों तथा नदियों के किनारे पाया जाता है। इसके वृक्ष-छोटे या बड़े एवं करंज के समान ही दिखलाई देते हैं। शाखाएँ-लटकी हुई, गुच्छाकार तथा श्वेत रंग की होती हैं। काण्ड-मजबूत होता है। पत्ते-दो कतारों में निकले हुये, अंडाकार या लट्वाकार, प्रायः (परिपक्व) अखण्ड, २-४.५ इञ्च लम्बे, १.५-३.७५ इञ्च चौड़े, नोकदार, दुर्गन्ध युक्त एवं बिन्दुकित होते हैं। हरे पत्तों में पारदर्शक बिन्दु होते हैं। शुष्क पत्तों में अधर तल पर छोटे-छोटे उभरे हुये बिन्दु दिखाई देते हैं। पुष्प-बहुत छोटे, हरित, शाखाओं के अग्र पर गुच्छों में पतझड़ होने पर निकलते हैं। फल-सपक्ष, चिपटा, प्रायः १ इञ्च लम्बा, गोल या अंडाकार एवं नताग्र होता है। फल भेद से इसके ३, ४ भेदों का उल्लेख है। इसके पत्तों एवं काष्ठ में दुर्गन्ध होती है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में लुआवदार पदार्थ बहुत होता है। गुण और प्रयोग-यह शोथहर, शोणितोत्क्लेशक एवं करंज के समान गुण वाला है। इसकी छाल को उबाल कर उसका लुआव अथवा मूल को पीस कर संधिशोथ पर लगाते हैं तथा उबली हुई छाल को ऊपर से बाँध देते हैं। इसके पत्तों का कल्क तैल में उबाल कर वह तैल व्रण पर लगाते हैं। दाद पर बीज को जल में घिसकर लगाया जाता है। अथ गुञ्जा-श्वेता रक्ता च। तयोर्नामगुणानाह श्वेता गुञ्जोच्चटा प्रोक्ता कृष्णला चापि सा स्मृता। रक्ता सा काकचिञ्ची स्यात्काकणन्ती च रक्तिका ।। १२५ ।। काकादनी काकपीलुः सा स्मृता काकवल्लरी। गुञ्जाद्वयन्तु केश्यं स्याद्वातपित्तज्वरापहम् ।। १२६ ।। मुखशोषभ्रमश्वासतृष्णामदविनाशनम् । नेत्रामयहरं वृष्यं बल्यं कण्डूं व्रणं हरेत् ।। १२७ ।। कृमीन्द्रलुप्तकुष्ठानि रक्ता च धवलाऽपि ।। १२८ ।। सफेद तथा लाल गुञ्जा के नाम तथा गुण-श्वेतगुंजा, उच्चटा (श्वेतोच्चटा) और कृष्णला ये सब संस्कृत नाम सफेद घुँघुची के हैं। लाली घुँघुची के संस्कृत नाम-रक्तगुञ्जा, काकचिञ्ची, काकणन्ती, रक्तिका, काकादनी, काकपीलु और काकवल्लरी ये सब हैं। दोनों प्रकार की घुँघुची केश के लिये हितकर, वात, पित्त, ज्वर, मुख का सूखना, भ्रमरोग, श्वास, तृषा, मद तथा नेत्ररोग को नष्ट करने वाली होती है। यह वृष्य, बलकारक तथा खुजली, व्रण, कृमि, इन्द्रलुप्तरोग तथा कुष्ठ इन सबों को भी दूर करनेवाली होती है। [१२५-१२८] ५६. गुञ्जा (श्वेत, रक्त) हिं०-गुंजा, घुंघची, घुँघुची, चिरमी, चिरमिटी, घुमची, करजनी, रत्ती, चौंटली। बं०-कुँच। म०-गुञ्ज। गु०-चणोठी। क०-गुलगुंति, गुरुगुंजी। मल०-कुत्रि। ता०-कुन्थमणि, कुँरि। पं०-चर्मटी। ते०-गुरुगिंज। फा०-चस्मे खरूस, सुर्ख। अं०-Jequirity (जेक्विरिटी)। ले०-Abrus precatorius Linn. (एब्रस् प्रिकेटोरिअस् लिन.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA