भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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वटादिवर्गः ६७५ गुण और प्रयोग—(१) यकृत् वृद्धि में एक तोला छाल दूध में पीसकर पिलाते हैं। (२) पत्ते एवं छाल को कूटकर आमवात में संधिशोथ पर बाँधते हैं। मूल एवं पत्तों से पकाया तेल व्रण तथा चोट पर लगाते हैं। मात्रा—त्वक् ५ से १० माशा। अथोदुम्बरः (गूलर)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह उदुम्बरो जन्तुफलो यज्ञाङ्गो हेमदुग्धकः ॥८॥ उदुम्बरो हिमो रूक्षो गुरुः पित्तकफास्रजित्। मधुरस्तुवरो वर्ण्यो व्रणशोधनरोपणः ॥९॥ गूलर के संस्कृत नाम—उदुम्बर, जन्तुफल, यज्ञाङ्ग और हेमदुग्धक ये सब हैं। गूलर—मधुर तथा कषायरस युक्त, शीतल, रूक्ष, गुरु, वर्ण को उत्तम करने वाला, व्रण का शोधन तथा रोपण (घाव भरना) करने वाला एवम्—पित्त, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाला है। [८-९] ५. गूलर हिं०—गूलर, गुल्लर। बं०—यज्ञ डुमुर। म०—उम्बर, उम्बराचे झाड़। गु०—उम्बरी, कमरडो। क०—अतिमर। अ०—ज़मीज़। ते०—अति चेट्टु। ता०—अत्तिरम्। फा०—अञ्जीरे आदम, समर पिस्ता। ले०—Ficus glomerata Roxb. (फाइकस् ग्लोमेरॅटा)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। गूलर इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। पहाड़ी भूमि और पहाड़ों पर भी इसके वृक्ष पाये जाते हैं। इसके वृक्ष—६० फीट तक ऊँचे फैले हुये होते हैं। पत्ते—५-७ इञ्च लम्बे, अंडाकार, गहरे हरे और चिकने चमकीले होते हैं। फल—१-२ इञ्च व्यास में सटे हुए गुच्छों में लगते हैं। कच्चे फल हरे और पकने पर लाल हो जाते हैं। फलों के भीतर प्रायः छोटे-छोटे कीड़े होते हैं। इसके सभी अंगों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—छाल में १४% टैनिन होता है। गुण और प्रयोग—इसकी छाल स्तंभन; पक्वफल शीत, स्तम्भन एवं रक्तसंग्राहक; क्षीर शीतल, स्तंभन, रक्तसंग्राहक, पौष्टिक एवं शोथहर है। (१) सभी प्रकार के रक्तपित्त के लिये इसके फल तथा छाल का उपयोग किया जाता है। विशेष रूप में, रक्तप्रदर, अत्यार्तव, आसन्न गर्भपात, रक्तमेह आदि में इसको देते हैं। (२) मधुमेह में फल या मूल का रस दिया जाता है। (३) इसका क्षीर रक्तातिसार में लाभदायक है। बच्चों के अतिसार, वमन तथा दौर्बल्य में इसको १० बूँद दूध के साथ देते हैं। (४) मूल को आँव में देते हैं। मात्रा—छाल ½-१ तोला; फल २ से ४; क्षीर १० से २० बूँद दुग्ध एवं शर्करा के साथ। अथ काकोदुम्बरिका (कठूमर)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह काकोदुम्बरिका फल्गुर्मलयूर्जघनेफला। मलयुः¹ स्तम्भकृत्तिक्ता शीतला तुवरा जयेत्। कफपित्तव्रणश्वित्रकुष्ठपाण्ड्वर्शकामलाः ॥१०॥ १. मलपू इति पाठा०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA