भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 736, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंवटादिवर्गः ६८५ अथ श्वेतखदिरः (पपरिया कत्था) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह खदिरः श्वेतसारोऽन्य कदरः सोमवल्कलः । कदरो विशदो वर्ण्यो मुखरोगकफास्रजित् ।।३३।। सफेद खैर के संस्कृत नाम- श्वेतखदिर, श्वेतसार, कदर और सोमवल्कल ये सब हैं। सफेद खैर- विशद गुणयुक्त, वर्ण को उत्तम बनाने वाला एवम्- मुखरोग, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाला है। [३३] १६. सफेद खैर हिं०- सफेद खैर, पपरिया खैर। बं०- श्वेत खदिर। म०- पांढरा खैर। गु०- गोरंड, खैर धोला सार वालो। क०- विलिय तर्जि, विलियर्ति। ते०- तेल चंड। ता०- कोविल। ले०- Acacia suma Kurg. (अॅकेसिया सुमा)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह बंगाल, बिहार एवं पश्चिम प्रायद्वीप आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका वृक्ष- खदिर वृक्ष के समान ही होता है। इसमें केवल छाल सफेद तथा शाखाएं टेढ़ी-मेढ़ी होती हैं। आभ्यन्तर कोश बाह्य कोश से अधिक बड़ा नहीं होता। सफेद खैर का एक अन्य भेद A. ferruginea (अँ. फेरूजिनिया), गुजरात, बरार तथा दक्षिण में मिलता है। गुण और प्रयोग- यह खदिर के समान ही होने से उसी की तरह इसके भी गुण कर्म हैं। अथ इरिमेदः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह इरिमेदो विट्खदिरः कालस्कन्धोऽरिमेदकः। इरिमेदः कषायोष्णो मुखदन्तगदाःस्रजित् । हन्ति कण्डूविषश्लेष्मकृमिकुष्ठविषव्रणान् ।।३४।। दुर्गन्ध खैर के संस्कृत नाम- इरिमेद, विट्खदिर, कालस्कन्ध और अरिमेदक ये सब हैं। दुर्गन्ध खैर- कषायरसयुक्त, उष्ण एवम्- मुख तथा दाँत सम्बन्धी रोग, रक्तविकार, खुजली, विष, कफ, कृमि, कुष्ठ, विष-व्रण को दूर करने वाला है। [३४] १७. दुर्गन्ध खैर हिं०- दुर्गन्ध खैर, गन्धबबुल, गुआ-बबूल। बं०- गुया बाबला। म०- गुआबाभूल, घाणेरा खैर। गु०- गन्धिलो खर, हरिमेद। अं०- The Cassie Flower (दी केसी फ्लावर)। ले०- Acacia farnesiana Willd. (अॅकेसिया फार्नेसियाना। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है तथा लगाया भी जाता है। इसका वृक्ष- छोटा या झाड़ बड़ा १५ फीट तक काँटेदार होता है। छाल- हलके भूरे रंग की खुरदरी होती है। कांटे मुलायम चौथाई से आध इञ्च लम्बे सीधे होते हैं। पत्ते- उपपक्ष ४-८ जोड़े, १/२-१ इञ्च या १ १/२ इञ्च लम्बे और प्रत्येक उपपक्ष में पत्रक १०-२० जोड़े एवं पर्णवृन्त छोटा तथा एक ग्रंथि से युक्त होता है। पुष्प गुच्छ- १-१ १/२ इञ्च लम्बे आते हैं। पुष्प- गहरे नारंग वर्ण के सुगन्धित होते हैं। फली- २-३ इञ्च लम्बी, टेढ़ी, अस्फोटी और लम्बगोल होती है। इसकी जड़ तथा जड़ की छाल में तीव्र दुर्गन्ध होने के कारण इसे विट्खदिर कहा जाता है। यह नवंबर से मार्च तक पुष्पित होता है तथा इसके पुष्पों का सुगन्ध भी निकाला जाता है। इससे गोंद भी प्राप्त होता है। बिलायती बबूल, रेंवा (Acacia leucophloea Willd.) को भी कुछ हरिमेद मानते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA