भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधातुवादिवर्गः ७६३ अथाशुद्धलोहदोषानाह षण्ढत्वकुष्ठामयमृत्युदं भवेद्धृद्रोगशूलौ कुरुतेऽश्मरीञ्च । मानारुजानाञ्च तथा प्रकोपं करोति हृल्लासमशुद्धलोहम् ।।४३।। जीवहारि मदकारि चायसं चेदशुद्धिमद संस्कृतं ध्रुवम् । पाटवं न तनुते शरीरके दारुणां हृदि रुजाञ्च यच्छति ।।४४।। अशुद्ध लोहा के दोष—नपुंसकता, कुष्ठरोग, मृत्यु, हृद्रोग, शूल, पथरी, अनेक प्रकार के रोगों का प्रकोप, हृल्लास (उबकाई) ये सब बिना शुद्ध किये हुये लोहे के भस्म के सेवन से होते हैं । और यदि लोहे का शोधन तथा संस्कार न किया गया हो तो उसका भस्म जीवन को नष्ट करने वाला, मदकारक, शरीर में फुर्तीपन का अभाव तथा हृदय में असह्य पीड़ा का करने वाला होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है । [४३-४४] अथ लोहसेविनां त्याज्यपदार्थानाह कूष्मांडं तिलतैलञ्च माषान्नं राजिकां तथा । मद्यम्लरसं चापि त्यजेल्लोहस्य सेवकः ।।४५।। लोहा सेवन करने वाले लोगों के लिये त्याग करने योग्य पदार्थ—सफेद कोंहड़ा, तिल का तैल, उरद के बने हुये पदार्थ, राई, मद्य, अम्लरस युक्त पदार्थ (खटाई आदि), इन सबको लोह सेवन करने वाला व्यक्ति छोड़ देवे । [४५] अथ सारलोहस्य लक्षणं गुणाँश्चाह क्ष्माभृच्छिखराकाराण्यङ्गान्यम्लेन लेपिते । लौहे स्युर्यत्र सूक्ष्माणि तत्सारमभिधीयते ।। लौहं साराह्वयं हन्याद् ग्रहणीमतिसारकम् ।।४६।। अर्द्धं सर्वाङ्गजं वातं शूलं च परिणामजम् । छर्दिं च पीनसं पित्तं श्वासं कासं व्यपोहति ।।४७।। सारलोह के लक्षण—जिस लोहे के ऊपर अम्ल (खट्टे पदार्थ) रस का लेपन करने से पर्वत के शिखर की भाँति आकारवाले सूक्ष्म-सूक्ष्म अंग उत्पन्न हो जायँ उसे सारलोह समझना चाहिये । सारलौह—ग्रहणी, अतिसार, अर्द्धाङ्ग तथा सर्वाङ्गवात, परिणामशूल, वमन, पीनस, पित्त, श्वास तथा कास को दूर करने वाला होता है । [४६-४७] अथ कान्तलौहस्य लक्षणं गुणाँश्चाह यत्पात्रे न प्रसरति जले तैलबिन्दुः प्रतप्ते-हिङ्गुर्गन्धं त्यजति च निजं तिक्ततां निम्बवल्कः । तप्तं दुग्धं भवति शिखराकारकं नैति भूमिं-कृष्णाङ्गस्स्यात् सजलचणकः कान्तलोहंतदुक्तम् ।।४८।। गुल्मोदरार्शःशूलाममामवातं भगन्दरम् । कामलाशोथकुष्ठानि क्षयं कान्तमयो हरेत् ।।४९।। प्लीहानमम्लपित्तञ्च यकृच्चापि शिरोरुजम् ।।५०।। सर्वान् रोगान् विजयते कान्तलोहं न संशयः । बलं वीर्यं वपुःपुष्टिं कुरुतेऽग्निं विवर्द्धयेत् ।।५१।। कान्तलौह के लक्षण—जिस लोहे के पात्र में जल रखकर उसमें तेल का बूँद डालने से यदि वह न फैले तथा जिसके पात्र में गरम करने से हींग अपने गन्ध को छोड़ दे और नीम की छाल गरम करने से अपनी कड़वाहट को छोड़ दे, एवम् जिसमें दूध खौलाने से जोरों से उबाल आने पर भी वह भूमि पर न गिरे और जिसमें चने भिगोने से काले हो जायें उसे कान्तलौह समझना चाहिये । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA