भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधात्वादिवर्गः ७८७ उपयोग—इनमें ब्राह्मण जाति का विष—रसायन के कार्य में, क्षत्रिय जाति का विष—शरीर को पुष्ट करने के लिये, वैश्य जाति का विष—कुष्ठ दूर करने के लिये तथा शूद्र जाति का विष—वध करने के कार्य में उपयोगी होता है। [२०१-२०२] अथ विषस्य दुर्गुणानाह विषं प्राणहरं प्रोक्तं व्यवायि च विकाशि च। आग्नेयं वातकफहृद्योगवाहि मदावहम् ।।२०३।। विष के दुर्गुण—विष—प्राणनाशक, व्यवायी, विकाशी, आग्नेय, वात तथा कफ नाशक, योगवाही तथा मदावह होता है। [२०३] ❖ व्यवायि = सकलकायगुणव्यापनपूर्वकं पाकगमनशीलम्। विकाशि = ओजः शोषपूर्वकं सन्धिबन्धशिथिलीकरणशीलम्। आग्नेयम् = अधिकाग्न्यंशम्। योगवाहि = सङ्गिगुणग्राहकम्। मदावहं = तमोगुणाधिक्येन बुद्धिविध्वंसकम् ।।२०३।। यहाँ पर मूल में "व्यवायि" का "प्रथम सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर तत्पश्चात् पचने वाला" यह अर्थ समझना चाहिये और "विकाशि" पद का 'शरीर में स्थित ओज को सुखाता हुआ सारे सन्धिबन्धनों को शिथिल करने वाला"; "आग्नेयम्" पद का "अधिक अग्नि के अंश से युक्त"; "योगवाहि" पद का "अपने साथी के गुणों को उत्तेजित करने वाला" तथा "मदावहम्" पद का "तमो गुण की अधिकता से बुद्धि का विध्वंस करने वाला" यह अर्थ समझना चाहिये। [२०३] अथ शोधितविषस्य गुणानाह तदेव युक्तियुक्तं तु प्राणदायि रसायनम्। योगवाहि त्रिदोषघ्नं बृंहणं वीर्यवर्द्धनम् ।।२०४।। शुद्ध किया हुआ विष—यदि पूर्वोक्त विषों को युक्ति युक्त करके अर्थात् शास्त्रानुकूल शुद्ध करके खाया जाय तो वे ही प्राण शक्ति को बढ़ाने वाले, रसायन (जरा-अपमृत्यु को दूर करने वाले), योगवाही, त्रिदोषनाशक, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक) एवं वीर्यवर्धक हो जाते हैं। [२०४] अथ विषशोधनस्यावश्यकतामाह ये दुर्गुणा विषेऽशुद्धे ते स्युर्हीना विशोधनात्। तस्माद्विषं प्रयोगेषु शोधयित्वा प्रयोजयेत् ।।२०५।। विषों के शोधने की आवश्यकता—जो दुर्गुण अशुद्ध (बिना शोधे हुए) विष में कहे हुये हैं, वे सब शोधन करने से अत्यन्त कम हो जाते हैं। अतः औषधियों में विष का शोधन करके ही प्रयोग करना उचित है। [।२०५] अथोपविषाः । तेषां निरूपणमाह अर्कक्षीरं स्नुहीक्षीरं लाङ्गली करवीरकः । गुञ्जाऽहिफेनो धत्तूरः सप्तोपविषजातयः ।।२०६।। उपविषों का निरूपण—(१) मदार का दूध, (२) थूहर का दूध, (३) कलिहारी, (४) कनेर, (५) घुंमची, (६) अफीम एवं (७) धतूरा ये सात उपविष की जातियाँ हैं। [२०६] उपविषाः = गौणविषाः । एषां गुणास्तत्र तत्र द्रष्टव्याः ।।२०६।। यहाँ पर मूल में "उपविषः" का "गौणविष" यह अर्थ समझना चाहिये और इन सब के गुण जहाँ-जहाँ पर पहले उल्लिखित हों वहाँ-वहाँ पर कृपया देख लें, जैसे—