भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ नवमो धान्यवर्गः तत्र धान्यानां भेदाः । तानाह शालिधान्यं व्रीहिधान्यं शूकधान्यं तृतीयकम् । शिम्बीधान्यं क्षुद्रधान्यमित्युक्तं धान्यपञ्चकम् ।। १ ।। धान्यों के भेद-(१) शालिधान्य, (२) व्रीहिधान्य, (३) शूकधान्य, (४) शिम्बीधान्य, (५) क्षुद्रधान्य ये ५ भेद हैं। अथ शाल्यादीनां भेदानाह शालयो रक्तशाल्याद्या व्रीहयः षष्टिकादयः । यवादिकं शूकधान्यं मुद्गान्यं मुद्गाद्यं शिम्बिधान्यकम् ।। कङ्ग्वादिकं क्षुद्रधान्यं तृणधान्यञ्च तत्स्मृतम् ।। २ ।। शालिधान्य आदि के भेद-शालिधान्य के-रक्तशालि (लाल चावल) आदि, व्रीहिधान्य के-षष्टिक (साठी) आदि, शूकधान्य के-जौ आदि, शिम्बीधान्य के-मूँग आदि, क्षुद्रधान्य के कंगुनी आदि भेद है और क्षुद्रधान्य का नामान्तर तृणधान्य भी है । [२] अथ शालिधान्यम् तस्य लक्षणमाह कण्डनेन विना शुक्ला हैमन्ताः शालयः स्मृताः ।। ३ ।। शालिधान्य के लक्षण-बिना कूटे ही जो सफेद होते हों तथा हेमन्त ऋतु में उत्पन्न हों वे शालिधान्य (जड़हन) कहलाते हैं । [३] अथ शालयः (चावल) । तेषां जातिभेदेन नामान्याह रक्तशालिः सकलमः पाण्डुकः शकुनाहृतः । सुगन्धकः कर्दमको महाशालिश्च दूषकः ।। ४ ।। पुष्पाण्डकः पुण्डरीकस्तथा महिषमस्तकः । दीर्घशूकः काञ्चनको हायनो लोध्रपुष्पकः ।। ५ ।। इत्याद्याः शालयः सन्ति बहवो बहुदेशजाः । ग्रन्थविस्तरभीतेस्ते समस्ता नात्र भाषिताः ।। ६ ।। शाली (चावलो) के जातिभेद से नाम-रक्तशालि, कलम, पाण्डुक, शकुनाहृत, सुगन्धक, कर्दमक, महाशालि, दूषक, पुष्पाण्डक, पुण्डरीक, महिषमस्तक, दीर्घशूक, काञ्चनक, हायन और लोध्रपुष्पक इत्यादि शालि (चावल) बहुत से देशों में उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के होते हैं, जिनका यहाँ पर पूर्ण वर्णन ग्रन्थ के बढ़ जाने के भय से नहीं किया जा रहा है । [४-६] अथ शालीनां गुणानाह शालयो मधुराः स्निग्धा बल्या बद्धाल्पवर्चसः । कषाया लघवो रुच्याः स्वर्या वृष्याश्च बृंहणाः ।। अल्पानिलकफाः शीताः पित्तघ्ना मूत्रलास्तथा ।। ७ ।। शालियों (अगहनी चावलों) के गुण-शालि (अगहनी चावल) मधुर तथा कषाय रसयुक्त, स्निग्ध, बलकारक, थोड़ी मात्रा में बँधे हुये मल को निकालने वाले, लघु, रुचिकारक, कण्ठ स्वर को उत्तम बनाने वाले, वृष्य (वीर्यवर्धक), बृंहण (रसरक्तादिवर्धक), किंचित् वात तथा कफ कारक, शीतल, पित्तनाशक और मूत्रल (मूत्र की अधिक मात्रा में उत्पन्न करने वाले) होते हैं। [७]