भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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माना है। अतएव यह जिसको नहीं होता अथवा रोगाक्रान्त होता है तो वह मैथुन करने में समर्थ नहीं हो सकता। सम्पूर्ण गुदा का मान ४ अङ्गुल है, उसमें शङ्ख के आवर्त्त की भाँति तीन बली हैं, उसमें पहिली बली प्रवाहिणी नाम की है और उसका मान डेढ़ अङ्गुल का माना गया है। उसके नीचे उत्सर्जनी नाम की दूसरी बली है और उसका मान भी डेढ़ अङ्गुल है, फिर उसके नीचे संवरणी नाम की तीसरी बली है, जिसका मान एक अङ्गुल है और आधे अङ्गुल प्रमाण पण्डितों ने गुदा का मुख माना है। यही गुदामुख पायु कहलाता है। विधाता ने देह के बीच में इसी को अन्न के मल निकलने का मार्ग बनाया है। पुरुषों के जो दो प्रोथ (कूले) होते हैं, वे ही दोनों स्त्रियों के नितम्ब कहलाते हैं और उन दोनों (प्रोथ या नितम्बों) के दो कुकुन्दर अर्थात् नितम्बों के ऊपर के दो गड्ढे होते हैं, ये सब उदर के उपाङ्ग हैं। आठवाँ अङ्ग दोनों सक्थि अर्थात् दोनों पैर हैं। अब मैं इनके उपाङ्गों को कहता हूँ-दो जानु, दो पिंडली, दो जंघा, दो घुण्टिका (घुटने), दो एड़ी दो पैर के तलुये, दो चरण और दस पैर की अङ्गुलियाँ एवं उनके दस नख ये सब उपाङ्ग हैं ॥८३-९३॥
अथेदं शरीरमपरेणापि येन येन समवायिकारणेनोत्पद्यते तानि सर्वाण्याह-
अथ दोषाः प्रवक्ष्यन्ते धातवस्तदनन्तरम् ॥९४॥ अहारादेर्गतिस्तस्य परिणामश्च वक्ष्यते। आर्तवं चाथ धातूनां मलास्तदुपधातवः ॥९५॥ आशयाश्च कलाश्चापि मर्मांण्यथ च सन्धयः। शिराश्च स्नायवश्चापि धमन्यः कण्डरास्तथा ॥९६॥ रन्ध्राणि भूरि स्रोतांसि जालैः कूर्च्चाश्च रज्जवः। सेवन्यश्चाथ सङ्घाताः सीमन्ताश्च तथा त्वचः ॥९७॥ लोमानि लोमकूपाश्च देह एतन्मयो मतः।
शरीरोत्पत्ति में अन्यान्य समवायिकारण-अब प्रथम दोषों का वर्णन करेंगे, तदनन्तर धातुओं का, उसके बाद आहार आदि की गति और उसका परिणाम तथा आर्तव और धातुओं के मल तथा उपधातु, आशय, कला, मर्म, सन्धि, शिरा, स्नायु, धमनी, कण्डरा, रन्ध्र, स्रोत, जाल, कूर्च, रज्जु, सेवनी, सङ्घात, सीमन्त, त्वचा, लोम और लोमकूप, इन सबों का वर्णन करेंगे, क्योंकि इन्हीं सबों से शरीर बना हुआ है ॥९४-९७॥
तत्र दोषस्वरूपमाह वाग्भटः-
वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः ॥९८॥ विकृताविकृता देहं घ्नन्ति ते१ वर्द्धयन्ति च। ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधो मध्योर्ध्वसंश्रयाः। वयोऽहोरात्रिभुक्तानामन्तमध्यादिगाः क्रमात् ॥९९॥
शरीरस्थ दोषों का स्वरूप-वायु, पित्त और कफ संक्षेप से यही तीन दोष कहे गये हैं और ये विकृत (दुष्ट) होने से देह का नाश तथा अविकृत (शुद्ध) होने से शरीर को बढ़ाते हैं। यद्यपि ये सब दोष शरीर में व्याप्त होकर रहने वाले हैं तथापि हृदय और नाभि के नीचे, मध्य तथा ऊपर भाग में विशेषरूप से रहते हैं। वायु, पित्त और कफ ये अवस्था, दिन, रात्रि और भोजन इन सबों के अन्त, मध्य और आदि में क्रम से विशेष रूप से बलवान् रहते हैं अर्थात् वृद्धावस्था में वायु, युवावस्था में पित्त, बाल्यावस्था में कफ, दिन तथा रात्रि के अन्त में वायु, मध्य में पित्त, आरम्भ में कफ, भोजन के अन्त में (पचजाने पर) वायु, मध्य (पचने के समय) पित्त आरम्भ (भोजन कर चुकने के बाद) कफ की वृद्धि होती है ॥९८-९९॥
दोषशब्दस्य निरुक्तिमाह-
धातवश्च मलाश्चापि दुष्यन्त्येभिर्यतस्ततः। वातपित्तकफा एते त्रयो दोषा इति स्मृताः ॥१००॥
दोष शब्द की निरुक्ति-वात, पित्त और कफ ये ही तीनों धातुओं तथा सम्पूर्ण मल पदार्थों को दूषित कर देते हैं, इसी से ये वातादिक तीनों दोष कहलाते हैं ॥१००॥
१. 'सम्' इति पाठान्तरम्।