भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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मांसवर्गः ८७१ मद्गुर मछली का मांस—वातनाशक, बलकारक, वीर्यवर्धक, कफकारक एवम् लघु होता है। [१२०] अथ सपादमत्स्यः (टेंगरा)। तस्य मांसगुणप्रनाह सपादमत्स्यो मेधाकृन्मेदःक्षयकरश्च सः। वातपित्तकरश्चापि रुचिकृत्परमो मतः।।१२१।। सपाद मछली का मांस—मेधा शक्ति को बढ़ाने वाला, मेदोवृद्धि को दूर करनेवाला, वात तथा पित्तकारक एवं रुचि को अत्यन्त उत्पन्न करनेवाला होता है। [१२१] अथ प्रोष्ठी। तस्या मांसगुणानाह प्रोष्ठी तिक्ता कटुः स्वादुः शुक्रदा कफवातजित्। स्निग्धाऽस्यकण्ठरोगघ्नी रोचनी च लघुः स्मृता।।१२२।। प्रोष्ठी मछली का मांस—तिक्त तथा कटुरस युक्त, स्वादिष्ट, शुक्रजनक, कफ तथा वातनाशक, स्निग्ध, मुख और कण्ठ सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला, रोचक एवम् लघु होता है। [१२२] अथ क्षुद्रमत्स्याः। तेषां मांसगुणानाह क्षुद्रमत्स्याः स्वादुरसा दोषत्रयविनाशनाः। लघुपाका रुचिकरा बलदास्ते हिता मताः।।१२३।। छोटी मछलियों का मांस—स्वादिष्ट, त्रिदोष नाशक, विपाक में लघु, रुचिकारक तथ बलदायक होता है। [१२३] अथातिक्षुद्रमत्स्याः। तेषां मांसगुणानाह अतिसूक्ष्माः पुंस्त्वहरा रुच्याः कासानिलापहाः।।१२४।। अत्यन्त छोटी मछलियों का मांस—पुंस्त्व (रमण करने की शक्ति) को दूर करनेवाला, रुचिकारक एवम् खाँसी तथा वायु को दूर करने वाला होता है। [१२४] अथ मत्स्यगर्भः (मत्स्याण्डः)। तस्य गुणानाह मत्स्यगर्भो भृशं वृष्यः स्निग्धः पुष्टिकरो लघुः। कफमेदःप्रदो बल्यो ग्लानिकृन्मेहनाशनः।।१२५।। मछली के अण्डे—अत्यन्त वीर्यवर्धक, स्निग्ध, पुष्टिकारक, लघु, कफ तथा मेदा को बढ़ानेवाले, बलकारक, ग्लानि उत्पन्न करनेवाले एवम् प्रमेह को नष्ट करने वाले होते हैं। [१२५] अथ शुष्कमत्स्याः (सूखी मछली)। तेषां मांसगुणानाह शुष्कमत्स्या नवा बल्या दुर्जरा विड्विबन्धिनः।।१२६।। सूखी मछलियाँ—ये यदि नई हों तो बलकारक, देर में हजम होनेवाली, एवम् मल का विबन्ध करने वाली होती हैं। [१२६] अथ दग्धमत्स्यः (भूँजी मछली)। तस्य मांसगुणानाह दग्धमत्स्यो गुणैः श्रेष्ठः पुष्टिकृद् बलवर्द्धनः।।१२७।। भूँजी मछली—गुणों में श्रेष्ठ, पुष्टिकारक तथा बल को बढ़ाने वाली होती है। [१२७]