भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ४१ कहा है कि—'भगवान् जठर (उदर) स्थित अग्नि ईश्वर अर्थात् सामर्थ्यवान् तथा उदरस्थित अन्न के पचानेवाले हैं, उनके सम्पूर्ण रसों को ग्रहण करते हुए भी उनके रूप का भलीभाँति से वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि वे अत्यन्त सूक्ष्म हैं, शरीर के मध्य में नाभिस्थल में जो सोम (चन्द्र) मण्डल नामक एक विशेष स्थान है, उसीके मध्य में सूर्यमण्डल नामक एक दूसरा भी मण्डल है और उसी सूर्यमण्डल में प्रत्येक मनुष्यों के शरीर में रहनेवाले अग्नि प्रदीप की भाँति रहते हैं। जिस भाँति सूर्य भगवान् आकाश में ही स्थित होकर तेज से युक्त अपने किरणों से सब पल्वल (छोटा जलाशय) और तालाबों को सुखाते रहते हैं, उसी भाँति अग्नि भी नाभि में स्थित होकर अनेक मनुष्यों के अनेक प्रकार के व्यञ्जनों से संस्कृत (युक्त) खाये हुये अन्न को अपनी किरणों के द्वारा अर्थात् अपने तेज से शीघ्र ही पचाते रहते हैं, मोटे (भारी) शरीरवाले हाथी आदि के शरीर में अग्नि यव (जौ) के बराबर, छोटे शरीरवाले (मनुष्यादि) जीवों के शरीर में तिल के बराबर कृमि, कीट (कीड़े) और पतङ्ग (उड़नेवाले मच्छड़) आदि जीवों के शरीर में बाल के बराबर रहते हैं ॥१८-२३॥ इत्यलमप्रकृतिचिन्तनेन, पुनः प्रकृतमनुसरति- रञ्जकं नाम यत्पित्तं तद्रसं शोणितं नयेत् । यत्तु साधकसंज्ञं तत्कुर्याद् बुद्धिं धृतिं स्मृतम् ।।१२४।। प्रकृति विषय का पुनः अनुसरण रञ्जक नाम का पित्त रस को रक्त के रूप में परिणत करता है साधक नाम का पित्त बुद्धि, धृति, स्मृति को उत्पन्न करता है ।।१२४।। ❖ 'धृति'=मेधाम् ।।१२४।। 'धृति' का अर्थ है 'मेधा' अर्थात् धारण शक्तिवाली बुद्धि ।।१२४।। यदालोचकसंज्ञं तद्रूपग्रहणकारणम् । भ्राजकं कान्तिकारिस्याल्लेपाभ्यङ्गादिपाचकम् ।। १२५ ।। आलोचक नाम का जो पित्त है वह रूप ग्रहण का कारण है अर्थात् उसी के सामर्थ्य से रूप का ग्रहण होता है, तथा भ्राजक नाम का जो पित्त है, वह शरीर में कान्ति पैदा करता है तथा किये गये लेप और अभ्यङ्गादिकों को पचाता है ।।१२५।। अथ श्लेष्मस्वरूपमाह- श्लेष्माश्वेतो गुरुः स्निग्धः पिच्छिलः शीतलस्तथा । तमोगुणाधिकः स्वादुर्विदग्धो लवणो भवेत् ।।१२६।। श्लेष्मा (कफ) का स्वरूप—कफ श्वेत, गुरु (भारी), स्निग्ध (स्नेह से युक्त), पिच्छिल (फिसलने वाला) शीतल, प्रधानरूप से तमोगुणी, स्वादु (स्वादयुक्त) तथा विदग्ध (परिपक्क) होने से लवण रसयुक्त (नमकीन) हो जाता है ।।१२६।। एकः श्लेष्मा वातपित्तवन्नामस्थानकर्मभेदैः पञ्चविधोऽतः श्लेष्मां नामान्याह१- कफस्यैतानि नामानि क्लेदनश्चावलम्बनः । रसनःस्नेहनश्चापि श्लेषणः स्थानभेदतः ।। १२७।। पाँच प्रकार के कफों के नाम—क्लेदन, अवलम्बन, रसन, स्नेहन और श्लेषण ये पाँच नाम कफ के स्थानभेद से हैं ।।१२७।। अथ क्लेदनादीनां स्थानान्याह- आमाशयेऽथ हृदये कण्ठे शिरसि सन्धिषु । स्थानेष्वेष्ठु मनुष्याणां श्लेष्मा तिष्ठत्यनुक्रमात् ।।१२८।। क्लेदनादि कफों के स्थान—क्लेदन कफ आमाशय में, अवलम्बन कफ हृदय में, रस न कफ कण्ठ में, स्नेहन कफ मस्तक में और श्लेषण कफ सन्धिसमूह में यथाक्रम से स्थित रहता है ।।१२८।। १. 'तन्नामान्याहे'ति पाठान्तरम् ।