भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 143 में से

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सरल (धूप) अर्थात् चीड़के नाम तथा गुण-सरल, पीतवृक्ष और सुरभिदारुक ये सब संस्कृत नाम चीड़के हैं। चीड़-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, लघु, स्निग्ध तथा उष्ण वीर्य होता है एवम् कर्ण, कण्ठ तथा नेत्र सम्बन्धी रोग, रक्षोघ्न, कफ, वायु, स्वेद (पसीना), दाह, खाँसी, मूर्च्छा तथा व्रण को दूर करने वाला होता है ॥ २६-२७॥ १२ धूप सरल । हि०-धूप सरल, चिर, चीड़, चील। बं०-सरलगाछ, तार्पीन तैलेर गाछ। म०-सरल । गु०- सरल देवदार, तेलियो देवदार । ता०-शिरसाल । नेपा०-धूप सल्सी। अ०-शजसुल बक, सनोबर हिन्दी । फा०-दरख्ते वसक । अं०-Long-leaved Pine (लाँग लीहड पाइन); Chir Pine (चीर पाइन)। ले०-Pinus longifolia Roxb. (पाइनस् लाँगिफोलिया रॉक्स.) । Fam. Pinaceae (पिनेंसी)। इसके वृक्ष हिमालय में अफगानिस्तान से लेकर काश्मीर, पञ्जाब, उत्तर प्रदेश, भूटान तथा आसाम एवं बर्मा में २०००-६००० फीट की ऊंचाई तक प्रायः समृद्धवृद्ध होकर उगे हुए पाये जाते हैं। इसकी ४, ५ जातियां भारतवर्ष में पाई जाती हैं जिनमें से पा. एक्सेल्सा वाल. (P. ex- celsa Wall. ) तथा पा. खासया रायली (P. khasya Royle ) मुख्य हैं। चीड़ के प्रकाशप्रिय विशाल वृक्ष बहुत सीधे (सरल) तथा १००-१५० फीट ऊंचे होते हैं। स्तम्भ-सीधा, गोल एवं घेरा ५-७ फीट या १२ फीट तक होता है। छाल-खुरदरी, ऊंची नीची, गद्देदार एवं १-२ इञ्च मोटी होती है। काष्ठ-स्निग्ध तथा तीक्ष्णगन्धी होता है। पत्ते-छोटी छोटी टहनियों के अन्त में ९ १२ इञ्च लम्बे, पतले, कुछ कुछ त्रिकोणयुक्त, हल्के हरे रंग के एवं तीन तीन के समूह में पाये जाते हैं। माघ से चैत्र तक फूलों के गुच्छे लगते हैं। एक वर्ष के उपरान्त में इसके फल या डोडे पकते हैं। नरमञ्जरी प्रायः ½ इञ्च लम्बी और सामूहिक शंखाकार फल (Cone) एकाकी अथवा ३-५ तक एक साथ रहते हैं जिनमें प्रत्येक ४-८ इञ्च लम्बा और ३-५ इञ्च मोटा लट्वाकार होता है। बीजवाहक पत्रों का अग्र मुड़ा हुआ, मोटा, प्रायः एक तीक्ष्ण काले नोक और पृष्ठ पर ४-५ कोणों से युक्त होता है। चैत्र वैशाख में फल फट जाते हैं जिनमें से बीज निकलते हैं तथा फल वृक्ष पर ही लगे रहते हैं। बीज ⅓ इञ्च से कुछ कम लम्बा, चिपटा, पंखयुक्त (पंख बीज से बड़ा और पतला) और ऊपर से मालाकार होता है। पा० एक्सेल्सा (चौल या कैल) नामक इसकी उपजाति ६-१० हजार फीट के बीच उत्तरप्रदेश एवं पञ्जाब में पाई जाती है। इसके पत्ते नीलहरित और ५-६ तक प्रतिगुच्छे में होते हैं। सामूहिक फल लम्बगोल होते हैं और बीजवाहक पत्रों के अग्र बहुत मोटे नहीं होते। रासायनिक संगठन-इसके बहिःकाष्ठ (Sapwood) से सहज अथवा क्षत करने से एक प्रकार का तेलिया निर्यास निकल कर जम जाता है जिसे गन्धाबिरोजा कहते हैं। पहले यह सफेद कुछ पतला और गाढ़ा होता है। इसके बाद उत्तरोत्तर अधिक गाढ़ा एवं पीला फिर गहरा पीला हो जाता है। यह चिपचिपा, मुलायम तथा उग्रगन्धयुक्त होता है। पा० एक्सेल्सा में निर्यास कम निकलता है पर अधिक अच्छा होता है। गन्धाबिरोजा को बिना जल के ऊर्ध्वनलिका यन्त्र में गरम करके एक गाढ़ा तथा लाल रंग का तैल निकालते हैं जिसे खम्नुतेल या (पं०) सतबिरोजा कहते हैं। इसमें गन्धाबिरोजा की गन्ध रहती है।


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बिरोजे का आभ्यन्तरिक प्रयोग करने के लिये निम्नलिखित विधि से शुद्ध किये हुये बिरोजे का व्यवहार करना चाहिये । समभाग दूध और जल भरे हुये पात्र पर कपड़ा बांध, उस पर गन्धा- बिरोजा डाल कर नीचे आंच देते हैं, जिससे बिरोजा कपड़े से टपक कर नीचे के पात्र में जम जाता जाता है। इसको निकाल कर सुखा कर रख लें। गन्धाबिरोजा को वाष्प के साथ ऊर्ध्व नलिका यन्त्र द्वारा गरम करने से एक रंगहीन तैल प्राप्त होता है जिसे तारपीन का तेल (Turpentine oil) कहते हैं। ५६ पौंड गन्धाबिरोजा से ८ पौंड तैल निकलता है । तैल निकालने के बाद जो अवशेष रह जाता है उसे डाक्टरी में रेजिन या कोलोफोनि (Resin, Colophony ) कहा जाता है। इसे छान कर उबलते हुये जल के साथ कड़ाई में डाल कर घोटते हैं। जिससे एक काला सा मधु के समान गाढ़ा पदार्थ तैयार होता है जिसे गन्धाबिरोजा का डामर कहते हैं। यह यूरोपीय बरगंडी पिच के समान होता है। यहां पर सरल (चीड़) वृक्ष के गुण और प्रयोग दिये जा रहे हैं। आगे 'सरलनिर्यास' के अन्तर्गत गन्धाबिरोजा तथा तारपीन के तैल आदि के गुण और प्रयोग दिये गये हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, दुर्गन्पहर, उत्तेजक, दीपन, वातानुलोमक, स्वेदल, मूत्रल, प्रतिदूषक एवं कफहर है। इसका आन्तरिक उपयोग अन्य औषधों के साथ क्वाथ के रूप में दाह, कास, मूर्च्छा, आध्मान, अङ्गघात आदि वातिक व्याधियां, अश्मरी, कफज्वर, कृमि, श्लेष्मातिसार एवं वातज हिक्का में किया जाता है। इसका लेप व्रण, शोथ, कंठमाला, जन्तुओं के दंश, त्वचा के अनेक विकार एवं वातव्याधियों में किया जाता है । व्रण में इसकी छाल का धूआं दिया जाता है। इसकी लकड़ी को कपड़ा लपेट कर तथा घृत में डुबोकर जलाते हैं तथा जो तेल टपकता है उसे कान में डालने से कर्णशूल दूर होता है। व्रणरोपण तेलों में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-३ माशा ।

अथ तगरं पिण्डतगरं च तयोर्नामानि गुणांश्चाह

कालानुसार्यं तगरं कुटिलं नहुषं नतम् । अपरं पिण्डतगरं दण्डहस्ती च बर्हिणम् ॥ २८ ॥ तगरद्वयमुष्णं स्यात्स्वादु स्निग्धं लघु स्मृतम् । विपाकेऽम्लंशूलाक्षिरोगदोषत्रयापहम् ॥२९॥ अब तगर तथा तगर भेद एवम् दोनों के नाम और गुण-तगर दो प्रकार का होता है उसमें प्रथम प्रकार के तगर के-कालानुसार्य, तगर, कुटिल, नहुष और नत ये सब संस्कृत नाम हैं। दूसरे प्रकार के तगर के-पिण्डतगर, दण्डहस्ती और बर्हिण ये सब संस्कृत नाम हैं। दोनों प्रकार के तगर-उष्णवीर्य, स्वादिष्ट, स्निग्ध तथा लघु होते हैं। यह विष, अपस्मार (मिरगीरोग), शूल, नेत्ररोग तथा त्रिदोष को दूर करने वाले होते हैं ॥ २८-२९ ॥ १३ तगर । हि०-तगर, सुगन्ध बाला, मुस्क़ बाला। बं०-तगर पादुका, शुमियो, असारून । म०-तगर गण्ठोडा, तगरमूल । गु०-तगर गण्ठोडा । फा०-असारून । उर्दू-रिशेवाल । पं०-दालमुश्क, मुस्केवली । अं-Indian Valerian Rhizome (इन्डियन वेलेरियन राइजोम) ।