भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभावप्रकाशनिघण्टुः हरीतकी के भेद—१ विजया, २ रोहिणी, ३ पूतना, ४ अमृता, ५ अभया, ६ जीवन्ती, ७ चेतकी ये हरीतकी की सात जातियां ( भेद ) हैं ॥ ८ ॥ अथ सप्तजातेर्हरीतक्या उत्पत्तिस्थानान्याह [ 'विन्ध्याद्रौ विजया हिमाचलभवा स्याच्चेतकी पूतना सिन्धौ स्यादथ रोहिणी निगदिता जाता प्रतिष्ठानके । १. कोष्ठस्थः पाठः काचित्कः । चम्पायाममृताऽभया च जनिता देशे सुराष्ट्राह्वये जीवन्तीति हरीतकी निगदिता सप्त प्रभेदा बुधैः ॥ १ ॥] हरीतकी के उत्पत्तिस्थान—विन्ध्य पर्वत पर विजया, हिमालय पर चेतकी, सिन्धु देश में पूतना, प्रत्येक स्थानों में रोहिणी, चम्पा देश में अमृता तथा अभया एवं सोरठ देश में जीवन्ती जाति की हरीतकी के उत्पन्न होने से उक्त प्रकार के सात भेद विद्वानों ने कहे हैं ॥ ९ ॥ अथ तेषां पृथग्लक्षणान्याह अलाबुवृत्ता विजया वृत्ता सा रोहिणी स्मृता। पूतनाऽस्थिमती सूक्ष्मा कथिता मांसलाऽमृता॥ पञ्चरेखाऽभया प्रोक्ता जीवन्ती स्वर्णवर्णिनी। त्रिरेखा चेतकी ज्ञेया सप्तानामित्थमाकृतिः॥१०॥ सात प्रकार की हरीतकी के पृथक् २ लक्षण—'विजया' हरीतकी लौकी की भाँति गोल, 'रोहिणी' का आकार गोल, 'पूतना' की गुठली बड़ी तथा आकार सूक्ष्म, 'अमृता' हरीतकी मांसल ( गूदेदार ), 'अभया' पांच रेखाओं से युक्त, 'जीवन्ती' सोने के समान रङ्ग वाली और 'चेतकी' तीन रेखाओं से युक्त होती है । इस प्रकार सातों प्रकार की हरीतकी के ये आकार हैं ॥ ९-१० ॥ अथ हरीतकीप्रयोगानाह विजया सर्वरोगेषु रोहिणी व्रणरोहिणी । प्रलेपे पूतना योज्या शोधनार्थेऽमृता हिता ॥११॥ अक्षिरोगेऽभया शस्ता जीवन्ती सर्वरोगहृत् । चूर्णार्थे चेतकी शस्ता यथायुक्तं प्रयोजयेत् ॥ चेतकी द्विविधा प्रोक्ता श्वेता कृष्णा च वर्णतः। षडङ्गुलायता शुक्ला कृष्णा त्वेकाङ्गुला स्मृता॥ काचिदास्वादमात्रेण काचिद्गन्धेन भेदयेत् । काचित्स्पर्शन दृष्ट्याऽन्या चतुर्द्धा भेदयेच्छिवा ॥ चेतकीपादपच्छायामुपसर्पन्ति ये नराः । भिद्यन्ते तरक्षणादेव पशुपक्षिमृगादयः ॥ १५ ॥ चेतकी तु धृता हस्ते यावत्तिष्ठति देहिनः । तावद्भिद्येत वेगेस्तु प्रभावात्रात्र संशयः ॥ १६ ॥ नृपाणां सुकुमाराणां कृशानां भेषजद्विषाम् । चेतकी परमः शस्ता हिता सुखविरेचनी॥१७॥ सप्तानामपि जातीनां प्रधाना विजया स्मृता । सुखप्रयोगा सुलभा सर्वरोगेषु शस्यते ॥१८॥ हरीतकी के प्रयोग—'विजया' हरीतकी का प्रयोग सभी रोगों में होता है। 'रोहिणी' व्रण पूरण करनेवाली होती है । 'पूतना' का प्रलेप के लिये प्रयोग करना चाहिये । 'अमृता' शोधन कर्म के लिये हितकर है । आंख के रोगों में 'अभया' उत्तम होती है और 'जीवन्ती' सम्पूर्ण रोगों का हरण करने वाली होती है । एवं चूर्ण के लिये 'चेतकी' उत्तम होती है । अतः जिस जातिकी हरीतकी का जहां जिन रोगों में प्रयोग करना कहा हुआ है, उसका वहां पर प्रयोग करना चाहिये । 'चेतकी' श्वेत और कृष्ण दो प्रकार की होती है। उनमें शुक्ल वर्ण वाली ६ अङ्गुल की तथा कृष्ण वर्ण वाली एक अङ्गुल की लम्बी होती है। इनमें कोई हरीतकी खाने मात्र से, कोई सूंघने से, कोई स्पर्श करने से तथा कोई देखने मात्र से ही मल का भेदन करती हैं अर्थात दस्त साफ होता है । इस प्रकार हरी- हरीतक्यादिवर्गः तकी चार प्रकार से दस्त कराती है। जो मनुष्य चेतकी जाति को हरड के पेड़ की छाया के नीचे पहुंच जाते हैं, उनको उसी समय दस्त आने लगता है। यहां तक कि पशु, पक्षी, मृगादि की भी यही दशा हो जाती है और 'चेतकी' हरड को जब तक प्राणी अपने हाथ में धारण किये रहता है, तब तक उसके प्रभाव से उसे वेग से दस्त होता रहता है, इसमें सन्देह नहीं है। जो राजा हैं तथा सुकुमार या कृश हैं किंवा विरेचक औषध खाने से भागनेवाले हैं, उनके लिये 'चेतकी' हरड परम हितकारी एवं उत्तम होती है। क्योंकि वह सुखपूर्वक दस्त लाती है। पूर्वोक्त सात जातियों में 'विजया' जाति की जो हरीतकी होती है, वही औरों की अपेक्षा प्रधान है क्योंकि सुलभ होने से उसका प्रयोग सुखपूर्वक होता है तथा वह सभी रोगों में देने के लिये भी उत्तम होती है ॥ ११-१८ ॥ अथ हरीतकीगुणानाह हरीतकी पञ्चरसाऽलवणा तुवरा परम्। रूक्षोष्णा दीपनी मेध्या स्वादुपाका रसायनी ॥ चक्षुष्या लघुरायुष्या बृंहणी चानुलोमिनी । श्वासकासप्रमेहार्शः कुष्ठशोथोदरकृमीन् ॥२०॥ वैस्वर्यग्रहणीरोगविबन्धविषमज्वरान् । गुल्माध्मानतृषाछर्दिहिक्काकण्डूहृदामयान् ॥ २१ ॥ कामलां शूलमानाहं प्लीहानञ्च यकृतस्तथा । अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रञ्च मूत्राघातञ्च नाशयेत् ॥ हरीतकी के गुण—हरड में लवण रस से भिन्न पांच ( मधुर, अम्ल, कटु, कषाय, तिक्त ) रस रहते हैं किन्तु औरों की अपेक्षा कषाय रस ही अधिक रहता है। हरीतकी रूक्ष, उष्णवीर्य, अग्नि- दीपक, मेधा ( धारणाशक्ति ) के लिये हितकारी, मधुर विपाकवाली, रसायन ( वृद्धावस्था तथा व्याधियों को दूर करनेवाली ), नेत्रों के लिये हितकर, पचने में लघु ( जल्दी पचने वाली ), आयु- वर्धक, बृंहण ( शरीर में मांसादि की वृद्धि करने वाली ) और अनुलोमन ( मलादि को नीचे की ओर प्रेरित करने वाली ) होती है । इसके सेवन से श्वास, कास, प्रमेह, बवासीर, कुष्ठ, शोथ, पेट के कृमि ( अथवा उदर सम्बन्धी रोग और कृमि ), स्वरभेद ( आवाज की खराबी ), ग्रहणी सम्बन्धी रोग तथा विबन्ध ( मलमूत्रादि की विबद्धता अर्थात् रुक जाना ), विषमज्वर, गुल्म, उंदरा- ध्मान, तृषा, वमन, हिचकी, खुजली, हृद्रोग, कामला, शूल, आनाह, प्लीहा, यकृत, अश्मरी ( पथरी ), मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्राघात ये सब रोग दूर होते हैं ॥ १९-२२ ॥ अथ हरीतक्याः प्रभावान्रिबन्धनं दोषहन्तृत्वं न तु रसनिबन्धनमित्याह स्वादुतिक्तकषायत्वात्पित्तहृत्कफहृच्च सा । कटुतिक्तकषायत्वादम्लत्वाद्वातहृच्छिवा ॥ २३ ॥ पित्तकृत्कटुकान्लत्वाद्वातकृच्च कथं शिवा ॥ २४ ॥ प्रभावाद्दोषहन्तृत्वं सिद्धं यत्तत्प्रकाशयते । हेतुभिः शिष्यबोधार्थं नापूर्व क्रियतेऽधुना ॥ २५ ॥ कर्म्मान्यत्त्वं गुणैः साम्यं दृष्टमाश्रयभेदतः । यतस्ततो नेति चिन्त्यं धात्रीलकुचयोर्यथा ॥२६॥ हरीतकी का प्रभाव—हरड़ में मधुर, तिक्त और कषाय रस रहता है, अतएव यह पित्तनाशक और कटु तिक्त तथा कषाय रस होने से कफनाशक है, तथा अम्ल रस होने से वायु का भी शमन करती है । अब यहां पर यह प्रश्न होता है कि जब हरड़ में कटु तथा अम्ल रस है, तब क्यों नहीं यह पित्त तथा वातकारक होती है ? इसका उत्तर यह है कि-यहाँ पर जो हरड़ तीनों दोषों को दूर करती है वह इसके प्रभाव से ही सिद्ध है किन्तु फिर भी जो ऊपर हेतुओं का निर्देश करते हुये 'दोषों का नाश करना' बताया गया वह शिष्यों को समझाने के लिये, क्योंकि यह ( दोषों का नाश करना ) कोई अपूर्व बात नहीं कही गई, बल्कि जो कही गई वह उसके प्रभाव से पहले से ही सिद्ध थी । तात्पर्य यह है कि वस्तुतः हरड़ जो दोषों का नाश करती है वह अपने प्रभाव से ही करती है । फिर जो पूर्व में यह कहा गया है कि—'मधुरादि रस होने से पित्तनाशक,