भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 143 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

२०८ \ भावप्रकाशनिघण्टुः (६) आमवात, कटिशूल एवं संधिपीड़ा में इसका बाह्याभ्यंतर प्रयोग किया जाता है। रास्नादि क्वाथ के साथ योगराज या त्रयोदशांग गुग्गुलु का उपयोग अच्छा होता है। (७) कुष्ठ में इससे साधारण स्वास्थ्य अच्छा होता है तथा इसके प्रयोग से दुर्बलता तथा नाड़ीशूल आदि ठीक होता है। सभी प्रकार के चर्मरोगों में गूगुल लाभदायक माना जाता है। इससे कंडू कम होती है तथा त्वचा का वर्ण सुन्दर हो जाता है। (८) व्रणशोधक, व्रणरोपक एवं प्रतिदूषक होने के कारण इसका बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। १० ड्राम जल में १ ड्राम इसका टिंक्चर (९०% मद्यसार में २०%) मिलाकर मसूड़ों की सूजन, पायरिया, दांतों में गढ़े हो जाना, गले के व्रण, जीर्ण ग्रससिकाशोथ एवं गल- तुण्डिकाशोथ में गंडूष कराया जाता है। पुराने व्रणों के प्रक्षालन के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। फोड़ों की प्रारंभिक अवस्था में इसके गरम लेप से फोड़े बैठ जाते हैं। घी में इसका मलहम बनाकर पुराने व्रणों में प्रयोग किया जाता है। कंठमाला में गूगुल को उष्ण जल में घिस- कर दिन में तीन चार बार मोटा लेप करने से गांठें बैठ जाती हैं। अर्श में इसका लेप एवं धूआं दिया जाता है। आमाशयोर्ध्वप्रदेश में इसे लगाने से हिचकी तुरंत रुकती है। प्राच्यव्रण (Delhi boil) नामक दिल्ली की तरफ होने वाले व्रण में गूगुल, गंधक, सोहागा तथा कत्था इसका मलहम लगाया जाता है। मुखरोगों में गूगुल को मुख में रखकर चूसने से लाभ होता है। मात्रा—२-८ रत्ती । अथ सरलनिर्यासगुग्गुलुः । तस्या नामानि गुणाँश्चाह श्रीवासः सरलस्रावः श्रीवेष्टो वृक्षधूपकः । श्रीवासो मधुरस्तिक्तः स्निग्धोष्णस्तुवरः सरः ॥ पित्तलो वातमूर्द्धाक्षित्वग्रोगकफापहः । रक्षोघ्नः स्वेददौर्गन्ध्ययुकाकण्डूव्रणप्रणुत् ॥ ४७ ॥ सरलनिर्यास अर्थात् चीड़ के गोंद (गन्धाबिरोजा) के नाम तथा गुण—श्रीवास, सरलस्राव, श्रीवेष्ट और वृक्षधूपक ये सब गन्धाबिरोजा के संस्कृत नाम हैं। गन्धाबिरोजा—मधुर तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, उष्णवीर्य, दस्तावर, पित्तजनक एवं वायु, मस्तक, नेत्र तथा स्वरसम्बन्धी रोग, कफ, रक्षोग्रहबाधा, स्वेद, दुर्गन्ध, जूंयें, खुजली और घाव को दूर करता है॥ १६ सरल निर्यास हि०-गन्धाबिरोजा, बिहरोजा, बिरोजा, सरल का गोंद, चीड का गोंद । म०-सरलडीक । गु०-बेरजो । क०-श्रीवेष्टक । ता०-पिनेमारू । लिपचा०-गिन्स्ट । मो०-टोडाँग । नेपा०-धूप । पहाड़ी-विरजेलासा, लीसा । फा०-झारजद, बरजद । अ०-किन्न । अं०-Oleo-resin of Pine (ओलिओ रेजिन् ऑफ् पाइन् ) । ले०-Oleo-resina of Pinus longifolia and other species (ओलिओ रेजिना ऑफ़ पाइनस लांगिफोलिया अण्ड अदर स्पिसीज ) । Fam. Pina- ceae (पिनेंसी ) । धूपसरल वृक्ष (चीड़) के निर्यास को गन्धाबिरोजा कहा जाता है। इसके वृक्ष तथा स्वरूपादि का वर्णन पहले सरल वृक्ष (पृष्ठ १९८) के अन्तर्गत किया जा चुका है। रासायनिक संगठन—इसमें करीब २०% तारपीन का तेल (Tarpeatine oil) होता है जो ऊर्ध्वपातन यंत्र द्वारा निकाला जाता है। लगभग ८०% भाग अवशेष रहता है। इसे डॉक्टरी में रेझिन (रजन) या कोलोफोनि (Resin, colophony) कहते हैं। रेझिन (रजन) पारभासक कर्पूरादिवर्गः २०६ हलके अम्बर के वर्ण का, चमकीला एवं आसानी से टूटने वाला घन पदार्थ होता है। यह तोड़ने पर अन्दर से चमकीला दिखाई देता है। इसम तारपीन सदृश स्वाद एवं गन्ध होती है। यह जलमें अविलेय किन्तु मद्यसार तथा ईथर आदि में आसानी से घुल जाता है। तारपीन का तेल—यह सरल वृक्ष के निर्यास (गन्धाबिरोजा) से वाष्प के साथ ऊर्ध्व नलिका यन्त्र से निकाला हुआ तैल है। औषध की अपेक्षा अन्य उद्योगों में इसकी बहुत खपत होती है। सुगन्धि द्रव्य, कृत्रिम कर्पूर, तैलीय रंग एवं वार्निश बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। इस तेल की संसार भर की आवश्यकता का ६७% भाग अमेरिका एवं २२% भाग फ्रांस पूर्ति करता है इतने अधिक वहां इसके वृक्ष पाये जाते हैं। भारतवर्ष में भी यद्यपि इसके वृक्ष बहुत पाये जाते हैं तथापि जंगली प्रदेशों में यातायात की कठिनाइयों के कारण अभी बहुत कम वृक्षों के निर्यास से तैल निकाला जाता है। भवाली, जालो तथा बरेली के पास चित्तरबकगंज आदि स्थानों में इसके निकालने के कारखाने हैं। यह तैल रंगहीन एवं स्वच्छ होता है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार की गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कटु एवं कुछ तिक्त होता है। कुछ दिन के बाद तथा इसे खुला रखने पर इसके स्वाद तथा गन्ध दोनों बढ़ जाते हैं जो अधिक अप्रिय हो जाते हैं। इसका विशिष्ट गुरुत्व ०.८६०-०.८७० है। यह सातगुने मद्यसार (९०%) में तथा ईथर, क्लोरोफॉर्म, कार्बन डाइसल्फाइड, विजलीकृत (Dehydrated) मद्यसार एवं ग्लेशियल ॲसिटिक् एसिङ् में चाहे जिस मात्रा में घुल जाता है। भारतीय व्यापारी तैल में ३७.५% अॅल्फा-कॅरेन् (a-carene) एवं ॲल्फा-डी-टर्पेन्स् (a-d- terpenes), १०% अॅल्फा-एल्-टर्पेन् (a-l-terpene), २४.८% एल्-पिनेन् (l-pinene), ९.७% नोपिनेन् (Nopinene), या बीटा-पिनेन् (B-pinene), २०.३% लॉगिफोलीन् (Longifoline) एवं अल्प मात्रा में सिल्वेस्ट्रीन (Sylvestrene) एवं डाइबेंप्टीन (Dipe- ntene) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। अमेरिका और फ्रांस के तैल में प्रधानतया पिनेन् अधिक होते हैं। भारतीय तारपीन के तैल में उपयुक्त पिनेन् की अपर्याप्त मात्रा होने के कारण कृत्रिम कर्पूर निर्माण के यह अयोग्य होता है। भारतीय तैल आसानी से जारित (Oxidized) होने के कारण तथा सूखने पर अधिक राल निकलने के कारण विदेशी तैल की अपेक्षा हीन श्रेणी का समझा जाता है लेकिन अन्य उद्योगों में इसका उपयोग किया जा सकता है। इस तैल को प्रकाशहीन, ठंडी जगह में बंद बोतलों में रखना चाहिये। गुण और प्रयोग—गन्धाबिरोजा एवं तारपीन के तेल के गुण लगभग समान ही होने के कारण दोनों का एक साथ ही वर्णन किया गया है। यह वातानुलोमक, श्लेष्मनिःसारक, कफघ्न, स्वेदजनन, मूत्रजनन, रक्तस्तम्भक, उत्तेजक, कृमिघ्न, शोथघ्न, वातहर, व्रणरोपक, दुर्गन्धिनाशक एवं अल्प प्रतिदूषक (Antiseptic) है। इसको चर्म पर मर्दन करने से प्रारम्भ में त्वचा लाल हो जाती है तथा प्रक्षोभ उत्पन्न होता है, पश्चात् नाड्यंगों के अवसाद से शून्यता उत्पन्न होती है। इससे सूक्ष्म रक्तवाहिनियों का संकोच होकर बाह्य (स्थानिक) रक्तस्राव रुक जाता है। अधिक मर्दन से त्वचा में स्फोट आदि भी उत्पन्न होते हैं। इसका प्रश्वषण महास्रोत, श्वसनसंस्थान एवं त्वचा द्वारा होता है तथा उत्सर्ग मूत्र एवं श्वसनसंस्थान से होता है। उत्सर्ग के समय श्वास में इसकी गन्ध तृण मूत्र में बनफ्शाह् (Vio let-हायोलेट) की गन्ध आती है। 14 १४ भा० नि०