भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१४ भावप्रकाशनिघण्टुः कफ की दुर्गन्ध दूर होती है तथा कफ कम होकर खांसी कम होती है। इसका धूम्रपान भी कराते हैं। (२) सोजाक में इसको ५ २० की मात्रा में बदाम आदि के साथ या गोली के रूप में खिलाते हैं। (३) कुन्दुरू, खसखस का तेल एवं सफेद मोम इनको मन्द आंच पर पिघला कर कपड़े से छान कर इस मलहम का प्रयोग ग्रन्थि, शोथ तथा व्रणों पर किया जाता है। बच्चों के फोड़े फुन्सी जल्दी फूट कर अच्छे हो जाते हैं। पाषाणगर्भम पर लगाने से सूजन दूर हो जाती है। कार्वंकल पर इसका मलहम विशेष उपयोगी है। (४) इसको बाष्प पर जल के साथ गरम करने से एक चिकट गोंद बनाता है। इसमें अफीम, धतूरा, खुरासानी अजवायन या बेलाडोना आदि मिलाकर, मोटे कपड़े पर लगाकर इसकी पट्टी को पीड़ायुक्त अङ्गों पर लगाने से वहां की रक्तवाहिनियों का संकोच होने से तथा उस अंग की गति कम होने से पीड़ा शान्त होती है। मात्रा-१०-३० रत्ती। १८ (ब) लोहबान हिं०-लोहवान, लोवान। म०-ऊद। गु०-लोवान। अं०-Benzoin (बेन्झोइन)। ले०- Benzoinum (बेन्झोइनम्)। वृक्षनाम - Styrax benzoin Dryand (स्टाइरैक्स बेंझोइन ड्रायेंड)। यह एक प्रकार का रालयुक्त गोंद है जिसके वृक्ष भारत में नहीं पाये जाते। इसके दो प्रकार मिलते हैं। उपर्युक्त नाम के वृक्ष से प्राप्त द्रव्य सुमात्रा बेंझोइन कहलाता है एवं दूसरे वृक्ष Styrax tonkinensis (Pierre) Craib ex Hartwich (स्टाइरैक्स टॉन्किनेन्सिस) से प्राप्त द्रव्य को स्याम बेंझोइन कहते हैं। इनके अतिरिक्त इसी जाति के अन्य वृक्षों से भी यह द्रव्य प्राप्त होता है। इसमें पर्याप्त मिलावट भी की जाती है। सुमात्रा बेंझोइन में कुछ अपारदर्शक, श्वेताभ या रक्ताभ बादाम या कौड़ी के आकार के टुकड़े, रालदार रक्ताभ भूरे या धूसर भूरे द्रव्य के साथ मिले हुए रहते हैं। इसका स्वाद कुछ तीता तथा गंध हलकी किन्तु अप्रिय नहीं होती। स्याम बेंझोइन के टुकड़े विभिन्न नाप के या चौपहल तथा कुछ चिपटे होते हैं। यह बाहर से पीताभ भूरे या रक्ताभ भूरे किन्तु अन्दर से दुधिया श्वेत और अपारदर्शक होते हैं। चौपहल टुकड़ों में चमकीले रक्ताभ भूरे रंग के लंब गोल टुकड़े राल के साथ मिले हुये रहते हैं। इसमें वैनिला की तरह गंध तथा बाल्सम् का विशिष्ट स्वाद होता है। लोहबान को हलके हलके गरम करने से श्वेत वर्ण का धूँआ निकलता है जो ठंडी जगह पर रवेदार पदार्थ के रूप में जम जाता है। पोटैशियम परमननेट के घोल के साथ इसके चूर्ण को गरम करने से सुमात्रा बेंझोइन हो तो बेन्झेल्डिहाइड की हलकी गंध आती है। ५ सी. सी. लोबान का ईथरीय सत्व लेकर उसमें २, ३ बूंद गंधक का तेजाब मिलावे तो सुमात्रा बेंझोइन होने पर रक्ताभ भूरा एवं स्याम बेंझोइन में गहरा गुलाबी लाल रंग हो जाता है। ९० प्र० श० मद्यसार में पहले प्रकार का ७५% एवं दूसरे प्रकार का ९०% घुल जाता है। गुण और प्रयोग-लोबान कफ निःसारक एवं प्रतिदूषक है। पुरानी खांसी में बदाम तथा गोंद के साथ इसको देने से कफ बाहर निकलने में मदद होती है। बस्तिशोथ आदि में भी इसको देते हैं। विभिन्न प्रकार के चर्म रोग तथा व्रण आदि में इसका बाह्य प्रयोग लाभदायक है। कर्पूरादिवर्गः २१५ अथ शिलारसः । तस्य नामानि गुणांश्चाह सिह्लकस्तु तुरुष्कः स्यात्ततो यवनदेशजः । कपितैलश्च संख्यातस्तथा च कपि नामकः ॥५२॥ सिह्लकःकटुकःस्वादुःस्निग्धोष्णः शुक्रकान्तिकृत् । वृष्यःकण्ठयःस्वेदकुष्ठज्वरदाहग्रहापहः ॥५३॥ शिलारस के नाम तथा गुण-यवनों (मुसलमानों) के देश में उत्पन्न होने से शिलारस को संस्कृत में तुरुष्क कहते हैं। सिह्लक, कपितैल, कपिनाम्रक (अर्थात् कपि के पर्यायवाची सभी शब्द शिलारस के नामान्तर हैं) ये सब शिलारस के संस्कृत नाम हैं। शिलारस-कट्टररस युक्त, स्वादु, स्निग्ध, उष्णवीर्य, शुक्रजनकं, कान्तिकारक, वृष्य तथा कण्ठ के लिये हितकारी होता है। यह स्वेद, कुष्ठ, ज्वर, दाह तथा ग्रहबाधा को दूर करने वाला होता है॥ १९ शिलारस हिं०, म०, बं०, क०-शिलारस । सिलारस । गु०-शेलारस । ता०-नेरिशरिशिप्पाल । मल०-रसमाल । ते०-शिलारसम् । मा०-शिलारस । फा०-अम्बर माइश, अस्ले लवनी । अ०-मीअः साइला, लग्नी, वृक्षनाम-जिर्व, उस्तुरक । अं०-Liquid Storax (लिक्विड स्टोरॅक्स)। ले०-(वृक्ष नाम) Liquidamber orientalis Miller (लिक्विडम्बर ओरीयण्टे- लिस् मिलर) । Fam. Hamamelidaceae (हैमॅमेलिडेसी) । शिलारस अरब देश से आता है। यह गोंद के समान एक सुगन्ध द्रव्य है। इसके वृक्ष एशिया माइनर में होते हैं। इसी वर्ग का अन्य वृक्ष ले. अल्टिञ्जिया एक्सेलसा नोरोन्हा (Alti- ngia excelsa Noronha) आसाम, भूटान, बर्मा, पूर्वी बंगाल, पेगू, चीन, मलाया और जावा आदि देशों में होता है जिससे निकले हुए शिलारस को विदेशी शिलारस का अच्छा प्रतिनिधि मानते हैं। इसका वृक्ष मध्यमाकार का अनेक शाखायुक्त; पत्ते-करतलाकार ५ खण्डयुक्त; पुष्प-पीत वर्ण के गोल गुच्छों में आते हैं। ३ या ४ वर्ष पुराने वृक्ष की छाल को चोट पहुँचाने से भीतरी छाल में स्राव जमा होता है। फिर बाहरी छाल को हटाकर भीतरी छाल को जल में उबालने से उसके साथ लगा हुआ शिलारस जल पर तैरने लगता है जिसे अलग कर लेते हैं। शिलारस का आयात प्रधानतः फ्रांस से होता है। यह मधु के समान गाढा, वजन में जल से भारी, पिलाई लिए लाल या भूरे रंग का, मुलायम, चिपचिपा तथा तैलीय राल सदृश पदार्थ है। नये शिलारस में मिट्टी के तेल जैसी गन्ध होती है लेकिन पुराना होने पर अच्छी गन्ध आने लगती है। इसका स्वाद तीता होता है। इसकी अन्य जाति के वृक्षों से भी यह प्राप्त किया जाता है। शोधन-पाश्चात्य चिकित्सा में इसको शुद्ध करके व्यवहार करते हैं। मद्यसार में इसे घोल एवं छान कर उस द्रव को उड़ जाने देते हैं तथा जो बचा रहता है उसे व्यवहार करते हैं। यह पीताभ भूरा, चिपचिपा, कुछ पारदर्शक एवं विशिष्ट सुगंध एवं स्वादयुक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक तैलीय द्रव के साथ मिली हुई एक राल रहती है। राल में सिनेमिक एसिड (Cinnamic acid) के साथ संयुक्त स्टोरैसिनॉल् (Storesinol) नामक द्रव्य रहता है। तैलीय द्रव पदार्थ में स्टाइरॉल् (Styrol), एथिल सिनॅमेट (Ethyl cinnamate) एवं स्टाइरॅसिन (Styracin) ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-शिलारस कफघ्न, मूत्रल, प्रतिदूषक, कृमिघ्न, कण्डूघ्न, व्रणरोपक एवं व्रण- शोधक है। इसका कफघ्न धर्म सौम्य है। इसकी क्रिया लोहबान, बाल्सम् पेरू तथा बाल्सम् टोलू