भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४२ भावप्रकाशनिघण्टुः ( ६ ) पीडितार्तव में इसके सेवन से पीड़ा कम होती है तथा आर्तव स्राव ठीक होने लगता है । स्त्रियों में रजोनिवृत्ति के काल में कुछ विशिष्ट मानसिक तथा शारीरिक अवसाद के लक्षण उत्पन्न होते हैं ऐसी अवस्थाओं में जटामांसी बहुत उपयोगी होती है । मात्रा—५-१० रत्ती । अथ शैलेयम् ( भूरिछरीला ) । तस्य नामानि गुणांश्चाह शैलेयन्तु शिलापुष्पं वृद्धं कालानुसार्यकम् ॥ ९० ॥ शैलेयं शीतलं हृद्यं कफपित्तहरं लघु । कण्डूकुष्ठाइमरीदाहविष हृद् गुदरुक्हृत् ॥ ९१ ॥ शैलेय ( भूरिछरीला ) के नाम तथा गुण-शैलेय, शिलापुष्प, वृद्ध और कालानुसार्यक ये सब संस्कृत नाम भूरिछरीला के हैं। भूरिछरीला-शीतवीर्य, हृद्य ( हृदय को हितकर ), कफ तथा पित्तनाशक, लघु, एवम् खुजली, कुष्ठ, पथरी, दाह, विष तथा गुदा से रक्त गिरना इन सब को दूर करने वाला है । ३५ छरीला हि०-छरीला, भूरिछरीला, पत्थरफूल । बं-शैलज । म०-दगडफूल । गु०-पत्थरफूल, छडीलो । क०-कल्लुडूवु । ते०-शैलेय मनेद्रव्यमु, रतिपंचे । ता०-कलपसी । फा०-उशनह, गुलेसंग । अ०-उस्नः । अं०-Stone flowers ( स्टोन फ्लावर्स ); Yellow Lichen ( यलो लाइचेन ) । लै०-Parmelia perlata Ach. ( पार्मीलिया परलॅटा आक० ) ; Fam. Parmeliaceae ( पार्मेलीयेंसी ) । छरीला-यह क्षुद्र वनस्पति पहाड़ी जमीन के पत्थरों पर उत्पन्न होती है और जान पड़ता है मानो यह पत्थर से ही अपना आहार लेती है। यह हिमालय और नीलगिरि के पहाड़ों पर पाई जाती है। यह वृक्षों और दीवारों पर भी पाई जाती है। यह हरी पेडींसी सन्निभ होकर जब सूख कर उतरती है तब इसके ऊपर का पृष्ठ काला और नीचे का सफेद होता है। जो अधिक सफेद होती है वही अच्छी समझी जाती है। इसकी कई जातियां पाई जाती हैं। इसका स्वाद फीका तिक्त-कषाय होता है। औषध के लिये हमेशा नया तथा सुगन्धयुक्त छरीला काम में लेना चाहिये । रासायनिक संगठन—इसमें पीत रवेदार पदार्थ, गोंद, लाइचेनिन एवं क्राइसोफेनिक एसिड, ये पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग—छरीला शीतल, सुगन्धि, हृद्य, सौम्य मूत्रल, दीपन, वेदनास्थापन, ग्राही एवं शोथहर है । यह कफ, पित्त, दाह, तृषा, वमन, श्वास, व्रण, कण्डू, अश्मरी, विष, हृद्रोग, गुदरक्तस्राव एवं रक्तविकार दूर करने वाला है। पेशाब रुकने पर १ तो० छरीला के फांट में मिश्री एवं जीरा मिलाकर पिलाते हैं तथा इसे गरम जल में भिगोकर कमर पर बांधते हैं। इसे ठण्डे जल में पीस कर सर पर लेप करने से शिरःशूल दूर होता है। व्रण पर इसे लगाने से लाभ होता है। यकृत् शूल निवारण के लिये इसका उपयोग करते हैं । अञ्जन के योगों में भी इसका प्रयोग किया जाता है । मात्रा-२-४ माशा । १. विषहृल्लासरुग्जित इति पाठान्तरम् । कर्पूरादिवर्गः २४३ अथ मुस्तकं-नागरमुस्तकञ्च । (मोथा-नागरमोथा) । तयोर्नामानि गुणांश्चाह मुस्तकं न स्त्रियां मुस्तं त्रिषु वारिदनामकम् । कुरुविन्दश्च संख्यातोऽपरः क्रोडकसेरुकः ॥९२॥ भद्रमुस्तञ्च गुन्द्रा च तथा नागरमुस्तकः । मुस्तं कटु हिमं ग्राहि तिक्तं दीपनपाचनम् ॥९३॥ कषायं कफपित्तास्रतृड्ज्वरारुचिजन्तुहृत् । अनूपदेशे यज्जातं मुस्तकं तत्प्रशस्यते । तत्रापि मुनिभिः प्रोक्तं वरं नागरमुस्तकम् ॥ ९४ ॥ मोथा तथा नागरमोथा के नाम और गुण- मुस्तक ( इसका स्त्रीलिङ्ग को छोड़ कर शेष लिङ्गों में प्रयोग होता है, मुस्त ( यह तीनों लिङ्गों में होता है ), वारिदनामक ( मेघवाची सभी शब्द ) और कुरुविन्द ये सब संस्कृत नाम मोथा के हैं। दूसरे प्रकार का जो मोथा है जिसे नागरमोथा कहते हैं, उसके संस्कृत नाम-- क्रोडकसेरुक, भद्रमुस्त, गुन्द्रा तथा नागरमुस्तक ये सब हैं । मोथा-कडुतिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतवीर्य, ग्राही, अग्निदीपक तथा पाचक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तकोप, तृषा, ज्वर, अरुचि और कृमि का नाशक होता है। जो 'मोथा' अनूप देश में उत्पन्न होता है बड़ी श्रेष्ठ होता है। उसमें भी मुनियों ने 'नागरमोथा' को ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है । ३६ मोथा हि०-मोथा । बं-मुता, मुथा । म०-मोथा, बिम्बल, भद्रमुष्टि । गु०-मोथ । क०-कोरनारि । तै०-तुंगमुस्ते । ता०-कोरइ किलंगु । फा०-मुष्के जमीं । अ०-सोभ (अ) द् कूर्फी । अं०-Nut- grass ( नट्ग्रास ) । लै०-Cyperus rotundus Linn. ( साइपेरस् रोटन्डस् लिन. ) । Fam. Cyperaceae ( साइपेरेंसी ) । मोथा इस देश के सब प्रान्तों में बहुलता से होता है। यह तृणजातीय वनस्पति बारहौ मास पायी जाती है किन्तु बरसात में सर्वत्र देखने में आती है। इसमें मूलीय पत्रगुच्छ होता है जो एक कठोर कन्द सदृश भौमिककाण्ड से निकलता है । नीचे सूत्रकार अन्तर्भूमिकायी कांद भी प्रायः होते हैं जिनने पौन से एक इञ्च के घेरे में अंडाकार कंद निकले रहते हैं जो कसेरू के समान ऊपर से काले रंग के और भीतर से लालीयुक्त सफेद होते हैं और इनमें सुगन्ध आती है। डंडी-पतली, ६ से २४ इञ्च तक ऊँची, त्रिकोणकार तथा पत्तों के बीच से निकली रहती है। पत्ते-लम्बे और पतले होते हैं । डंडी के अग्रपर समस्थमूर्धजक्रम में पुष्पवाहक शाखायें निकलती हैं जो छोटे-छोटे अवृन्त काण्डजव्यूहों का संयुक्तव्यूह होती हैं । पुष्पव्यूह का आधार भाग तीन पत्रसदृश कोणपुष्पकों से घिरा रहता है । इसके काले-काले कंदों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । नोट-भावप्रकाशकार ने मोथा एवं नागरमोथा ये दो भेद यहां लिखे हैं तथा मुस्ता का एक अन्य कैवर्तमुस्ता ( जलजमुस्ता, केवटीमोथा ) भेद आगे लिखा है । नागरमोथा का ही दूसरा नाम भद्रमुस्ता लिखा है। अन्य निघण्टुओं में भद्रमुस्ता अलग लिखा है। सब मोथे के गुण करीब-करीब समान ही हैं तथा एक दूसरे के स्थान पर इनका उपयोग किया जा सकता है। अनूप देश में होने वाला नागरमोथा अधिक प्रशस्त माना गया है। यह हमेशा ताजा तथा सुगन्धयुक्त खरीदना चाहिये । रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धित उड़नशील तैल, वसा, शर्करा, गोंद, कार्बोहाइड्रेट, अॅल्ब्युमिन सदृश पदार्थ, तन्तु तथा राख एवं अत्यल्प मात्रा में क्षाराम आदि पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-मोथा ग्राही, दीपक, पाचक, स्वेदजनक, मूत्रजनक, स्तन्यवर्धक, आर्तव- जनक, किञ्चित् गर्भाशयोत्तेजक, केशवर्धक, व्रणरोपक एवं कृमिघ्न है ।