भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१० ] भावप्रकाशनिघण्टुः मंजरियां आती हैं। ये मैले खाकी या फीके हरे रंग के होते हैं। फल—एक इञ्च लम्बा, गोल और अण्डाकार होता है। पतझड़ में जब इसके पुराने पत्ते गिर जाते हैं और नवीन पत्ते आते रहते हैं, प्रायः उसी समय फूल भी आते हैं। शीतकाल के प्रारम्भ में उस पर फल लग जाते हैं और अगहन-पूस तक पक जाते हैं। वृक्ष से बबूल के गोंद के समान एक प्रकार का गोंद निकलता है। फलों की मींगी से तेल निकाला जाता है। किसी किसी वाटिकामें बहेड़ेका वृक्ष देखने में आता है। वर्षा के प्रारम्भ में छिलके रहित गुठलियों को भूमि पर फेंक देने से ही वे अङ्कुरित हो पौधे के रूप में परिणत होती हैं। इसकी परिचर्या हरीतकी के पौधों के समान करनी चाहिये। रासायनिक संगठन—इसके फल में १७% टैनिन द्रव्य रहता है तथा इसकी मींगी में २५% तक हल्के पीले रंग का तैल रहता है। इसके अतिरिक्त राल, सैपोनिन आदि द्रव्य रहते हैं। गुण और प्रयोग—बहेड़े का विशेष उपयोग त्रिफले के रूप में होता है। इसका अर्ध पक फल विरेचक और पूरा पका हुआ या सूखा फल संकोचक माना जाता है। इसका उपयोग खांसी, गले के रोग, स्वरभंग, ज्वर, उदर, प्लीहावृद्धि, अर्श, अतिसार, कुष्ठ आदि रोगों में होता है। यह मस्तिष्क के लिये बल्य है। नेत्र पर इसका लेप लाभकारी है। इसकी मज्जा वेदनास्थापक, शोथघ्न और कुछ मदकारी है। मज्जा का तेल बालों के लिये अत्यन्त पौष्टिक, रंजक एवं कण्डूघ्न और दाहशामक है। मज्जा अथवा छिलके को भून कर मुख में रखने से खांसी में बहुत लाभ होता है। मात्रा—चूर्ण ३-९ माशा। अथामलक्या नामानि गुणांश्च वयस्यामलकी वृष्या जातिफलरसं शिवम् । धात्रीफलं श्रीफलं च तथामृतफलं स्मृतम् ॥ त्रिष्वामलकमाख्यातं धात्री तिष्यफलामृता ॥ ३८ ॥ हरीतकीसमं धात्रीफलं किन्तु विशेषतः । रक्तपित्तप्रमेहघ्नं परं वृष्यं रसायनम् ॥ ३९ ॥ हन्ति वातं तदम्लत्वारिपत्तं माधुर्यशैत्यतः । कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित् ॥४०॥ यस्य यस्य फलस्येह वीर्यं भवति यादृशम् । तस्य तस्यैव वीर्येण मज्जानमपि निर्दिशेत् ॥४१॥ आंवले के नाम तथा गुण—वयस्या, आमलकी, वृष्या, जातीफलरसा, शिव, धात्रीफल, श्रीफल और अमृत फल ये सब आंवले के नाम हैं। आमलक (यह शब्द तीनों लिङ्गों में होता है), धात्री, तिष्यफला, अमृता ये भी आंवले के संस्कृत नाम हैं। हरड़ के जो २ गुण हैं, वे ही आंवले के भी हैं। किन्तु विशेष यह है कि—यह रक्तपित्त तथा प्रमेह का नाशक है और अत्यन्त वृष्य (वीर्य के लिये हितकर) एवं रसायन है। आमला—अम्ल रस युक्त होने से वायु को तथा मधुर रस युक्त और शीतल होने से पित्त को दूर करता है और रूक्ष तथा कषाय रस युक्त होने से कफ को दूर करता है। अतएव यह त्रिदोषनाशक है। यहाँ सर्वत्र यह समझना चाहिये कि जिन २ फलों का गुण जैसा उष्ण या शीतवीर्य हो उन २ फलों की मींगी का भी गुण वैसा ही उष्ण या शीतवीर्य होता है ३८-४१ ॥ ३ आमला हि०-आमला, आंवला, आंवडा, आंवरा, औड़ा, औरा। ब०-आमला, आमरों, अमला, आमलकी। म०-आवले, आवली, आवळकाठी। प०-आमला, अम्बुल, अम्बलो। मा०-आंवला। गु०-आंवला,
हरीतक्यादिवर्गः [ ११ आमला, आमली । क०-नेल्हि, नेलिकायि । ने०-उसरिकाय, उसरिक । उ०-अण्डा। आसा०- अमला, आमलकी। गारो०-अम्बरी। ता०-नेल्लिमर्, नेल्लिकाय । ब्रह्मा०-शब्जु, जिफियूसी । फ़ा०-आमलज, आमलज आमलय, आमलह, आमलाह, आम्लज। अ०-आमलज । अं०-Emb- lic Myrobalan (एम्ब्लिक माय्रोबेलन्); Ildian gooseberry (इन्डियन गूसबेरी) । लै०-Phyllanthus emblica Linn. (फाइलेन्थस एम्बिल्का); Emblica officinalis Gaertn. (एम्बिल्का ऑफिसिनेलिस) । Fam. Euphorbiaceae (यूफरबियेसी) । आमला भारतवर्षके प्रायः सब उष्ण प्रदेशों में बागी और जंगली दोनों प्रकार का पाया जाता है। विशेष कर उत्तर भारत, अवध, बिहार और पूर्वी देशों में इसकी उपज अधिक है। हिमालय पहाड़ के नीचे जम्मू से पूर्व की ओर तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक उत्पन्न होता है। तथा चीन एवं मलयद्वीप में भी मिलता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का सुहावना होता है, किन्तु जंगली वृक्ष ऊंचे कद का बड़ा होता है। छाल-चौथाई इञ्च मोटी हल्के खाकी रङ्गकी एवं छिलकेदार होती है। लकड़ी-लाल रङ्गकी और मज- बूत होती है। इसमें सार भाग नहीं होता है। पत्ते-छोटे २ इमली के पत्तों के समान और फूल-लाई के दानों के समान हरापन युक्त पीले रङ्ग के गुच्छों में शाखाओं से सटे रहते हैं। वसन्त ऋतु में जब इसके पुराने पत्ते झड़ जाते हैं तब वृक्ष पत्रशून्य दिखाई पड़ता है। उसी समय यह फूलता है और नवीन पत्ते निकलते हैं। फूलों में नींबू के फूल के समान मन्द सुगन्ध आती है। फल-डालियों में सटे हुये दिखाई देते हैं। वे गोल चमकदार और छ रेखाओं से युक्त होते हैं। कच्ची अवस्था में हरे, पकने पर हरापन युक्त किञ्चित पीले या सुर्खे और सूखने पर काले रङ्ग के होकर फांके पृथक् २ हो जाती हैं और साथ ही गुठली भी फट जाती है। उनसे त्रिकोणाकार छोटे २ बीज निकलते हैं। बीजों से तेल निकलता है। बीज से ही इसके पौधे उत्पन्न होते हैं और थोड़े ही यत्न से साधारण वृक्षों की भांति प्रायः दुमट मिट्टी में इसके वृक्ष सतेज होते हैं। प्रायः वाटिकाओं में कलमी आमले के वृक्ष रोपित किये जाते हैं। जङ्गली के फल एक तोले तक और बागी कलमी आंवले के पांच तोले से अधिक भी देखने में आते हैं। बनारसी आंवले सर्वोत्तम समझे जाते हैं। किन्तु जितने आंवलों की यहां खपत होती है उतने उत्पन्न नहीं होते। खटिक लोग दूसरी जगह से मँगाकर बेचते हैं। पके फल बहुत कम मिलते हैं। प्रायः कच्ची अवस्था में ही तोड़कर बेंच लेते हैं। रासायनिक संगठन-रासायनिक दृष्टि से इसके टैनिन में गैलिक एसिड, एलाहगिक एसिड और ग्लूकोज होता है। इसमें विटामिन 'सी' तथा पेक्टिन बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है। 'विटामिन सी' की मात्रा १०० ग्रा० में ६००-९२१ मि० आ० तक पाई जाती है। आंवला के सूखे चूर्ण में भी 'विटामिन सी' पर्याप्त मात्रा में होती है क्योंकि इसके अन्दर का टैनिन 'सी' को नष्ट नहीं होने देता। गुण और प्रयोग-आंवला एक अत्यंत महत्त्व की औषधि है। इसका बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है। इसका ताज़ा फल रसायन, वृष्य, रक्तपित्त को दूर करने वाला, शीतल, मृदु विरेचक, मूत्रल एवं यकृत की क्रिया ठीक करने वाला है। इसका सूखा फल ग्राही, शीतल, दीपन, एवं रक्तस्रावरोधक है। रसायन के लिये एक विशिष्ट प्रकार की विधि से सेवन करने का विधान चरक में किया गया है। ताजे सूखे आंवले के चूर्ण को लेकर उसको ताजे आंवले के रस की भावना देकर सुखाना चाहिए। यह जितनी अधिक बार दी जायेगी उतना ही गुणकारक होगा। कम से कम २१ भावना