भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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१६ | भावप्रकाश निघण्टुः फिल्फिल् दराज़, पीपल दराज़ । अ०-दारफिल्फिल्, डाल फिल्फिल् । अं०-Long pepper (लॉग पीपर ); Dried catkins (ड्राइड कॅटक़िन्स) । ले०-Piper longum Linn. (पाइपर लाँगस) । Chavica roxburghii (चविका रॉक्सवर्घाई) । Fam. Piperaceae (पाइपरेसी) । पीपल - इस देश से गरम प्रान्तों में पूर्व नेपाल से आसाम, खासिया के पहाड़ों पर, बंगाल में, पश्चिम की ओर बम्बई तक तथा दक्षिण की ओर त्रावनकोर तक पायी जाती है। सीलोन, मलाका तथा फिलीपाइन द्वीपों में भी यह पाई जाती है। पीपल लता जाति की वनौषधि का फल है। इसकी बेल-अन्य लताओं की भाँति अधिक विस्तार में नहीं बढ़ती किन्तु थोड़ी ही दूरी में फैलती है। जड़-कुछ मोटी और खड़ी सी होती है। उससे शाखायें निकल कर भूमि पर फैलती हैं। पत्ते-२॥-३॥ इञ्च के घेरे में, गोलाकार, पान के पत्तों के आकार वाले कोमल होते हैं। ऊपर के पत्ते विनाल होते हैं। फलगुच्छ-१-१॥ इञ्च लम्बे और कृष्णाभ होते हैं जिनमें अत्यन्त छोटे-छोटे फल लगे रहते हैं। एक दूसरी जाति की पीपल को पहाड़ी पीपल कहते हैं। इसका लेटिन नाम Piper sylvati- cum Roxb. (पीपर सिलवेटिकम्) है। यह आसाम और बंगाल में अधिक उत्पन्न होती है। इसकी लता कई फीट तक बढ़ जाती है और सूखने पर आपस में लिपटी हुई मालूम होती है। पत्ते-पान के आकार वाले, उक्त पीपल के पत्तों से किञ्चित् बड़े होते हैं। फलगुच्छ-पौन से १॥ इञ्च लम्बे गोल होते हैं। इसको बङ्गाल के कविराज अधिक व्यवहार में लाते हैं। पीपल छोटी और बड़ी-इन भेदों से दो प्रकार की होती है। इनमें छोटी अधिक गुणकारी समझी जाती है। रासायनिक संगठन-इसमें १% उड़न शील तैल रहता है जिसमें से करीब ५-६४% पाइप- रीन, पाइपरीडीन एवं एक कडु राल (चविसीन), स्टार्च और स्नेह आदि द्रव्य रहते हैं। गुण और प्रयोग-पीपल रसायन, सुगन्धि, दीपक, पाचक, उष्ण, वातहर और कफघ्न है। इसका उपयोग आनाह, अपचन, अग्निमान्द्य, उदरशूल, कास, श्वास, जीर्णज्वर, प्रसूतिज्वर, आमवात, गृध्रसी, कटिशूल, वातरक्त, अङ्गघात आदि रोगों में किया जाता है। (१) मधु के साथ इसका चूर्ण नये या पुराने कास, श्वास, स्वरभङ्ग तथा हिचकी में उपयोगी है। (२) प्रसूतिज्वर में गर्भाशय शुद्धि के लिए इसका मधु के साथ अच्छा उपयोग होता है। (३) वर्धमान पिप्पली का उपयोग रसायन के लिए एवं अधोशाखाघात, पुरानी खांसी, दमा, यक्ष्मा, प्लीहावृद्धि, उदर, अर्श आदि रोगों में बहुत लाभदायी है। इसके लिए प्रथम दिन ३ पीपल का फांट मधु अथवा शर्करा के साथ दिया जाता है फिर नित्य ३ पीपल बढ़ाई जाती है। इस प्रकार दसवें दिन ३० पीपल का फांट दिया जाता है। फिर इसी प्रकार ३ पीपल नित्य कम की जाती है। कुछ लोग आधा दूध और आधा जल में उबालकर दूध शेष रहने पर उसी पीपल को खिलाकर ऊपर से वही दूध पिलाते हैं। इसके अतिरिक्त इसके चूर्ण को घृत और मधु के साथ उपयोग किया जा सकता है। (४) पीपल चौसठ प्रहर घोट कर उपयोग करने से जीर्ण ज्वर में विशेष लाभदायी होती है। (५) सोंठ एवं पीपल से सिद्ध तैल की मालिश गृध्रसी, कटिशूल तथा अधोशाखाघात में उपयोगी है। (६) त्रिकटु और सहिजन के बीज को अगस्तिमूल के रस से घोटकर उसका नस्य देने से बेहोशी, मूर्च्छा आदि दूर होती है। मात्रा-चूर्ण २-४ र० । दर्पनाशक-जहेशक, बबूल का गोंद और इसबगोल ।
हरीतक्यादिवर्गः । १७ अथ मरीचस्य नामानि गुणाँश्चाह मरिचं वेल्लजं कृष्णमूषणं धर्मपत्तनम् ॥ ५९ ॥ मरिचं कटुकं तीक्ष्णं दीपनं कफवातजित् । उष्णं पित्तकरं रुच्यं श्वासशूलकृमीन्हरेत् ॥६०॥ तदार्द्रं मधुरं पाके नात्युष्णं कटुकं गुरु । किञ्चित्तीक्ष्णगुणं श्लेष्मप्रसेकि स्यादपित्तलम् ॥६१॥ मरिच के नाम तथा गुण-मरिच, वेल्लज, कृष्ण, ऊषण और धर्मपत्तन ये मरिच के संस्कृत नाम हैं। मरिच-कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, कफ तथा वायु को दूर करने वाला, उष्णवीर्य, पित्तकारक और रूक्ष है एवं श्वास, शूल तथा कृमिरोग को नष्ट करने वाला होता है। यदि यही गीला (कच्चा) हो तो-पाक में मधुर रस युक्त, थोड़ा उष्णवीर्य, कटुरस युक्त, पाक में गुरु, थोड़ा तीक्ष्ण गुण से युक्त, कफ को गिराने वाला और थोड़ा पित्तकारक होता है ॥ ५९-६१ ॥ ७ मरिच हि०-मरिच, मिरच, गोल मरिच, काली मरिच, दक्षिणी मरिच, गोल मिर्च, चोखा मिरच । बं०-मरिच, गोल मरिच, गोल मिरच, मुरिच, मोरिच । म०-मिरे, काली मिरीं । क०-ओळे- मेणसु । गु०-मरि, मरि तीखा, मरी, कालामरी। ते०-मरिचमु, शव्यमु, मरियल्लु । ता०-मोलहु शेव्वियम् । पं०-काली मरिच, गोल मिरिच । मा०-काली मरिच । मोटिया०-स्पोट । काश्मी०-मर्ज। सिन्धी०-गुलमिरियूँ । मला० - ल्हु, कुरु मुलक, कुरु मिलगु । अफ०-दारगर्म । फा०-पिलपिले असवद, फिल्फिल असवद, स्याह गिर्द, हलपिला गिर्द, फिल्फिल् स्याह् । अ०-फ़िल्फ़िले अवीद, फिल्फिल् गिर्द, फिल् फिल्स्तोदाय, पिल्पिले गिर्द । अं० - Black pepper (ब्लॅक पेपर) । ले०-Piper nigrum, Linn. (पाइपर नाइग्रम् लिन.) । Fam. Piperaceae (पाइपरेसी) । दक्षिण कोंकण, आसाम, मलाबार तथा मलाया और स्याम इसका उत्पत्ति स्थान है। दक्षिण भारत के उष्ण और आर्द्र भागों में त्रिवांकूर, मलाबार आदि खादर तथा गीली जमीन में यह अधिकता से उत्पन्न होती है। कच्छार, सिलहूट, दार्जिलिंग, सहारनपुर और देहरादून के पास भी इसकी खेती की जाती है। वर्षा ऋतु में इसकी लता को पान के बेल के समान छोटे छोटे टुकड़े कर बड़े बड़े वृक्षों की जड़ में गाड़ देते हैं। ये लता रूप से बढ़ कर वृक्षों का सहारा पाने से उनके ऊपर चढ़ जाती हैं। पत्ते ५-७ इञ्च लम्बे तथा २-५ इञ्च चौड़े, गोलाकार, नुकीले तथा पान के पत्तों के आकार के होते हैं। फल-गुच्छों में लगते हैं। कच्ची अवस्था में फल हरे रङ्ग के होते हैं। उस अवस्था में चरपराहट कम होती है। जब पकने पर आते हैं तब उनका रङ्ग नारंग लाल हो जाता है। उसी समय तोड़ कर सुखा लेते हैं। सूखने पर काले रङ्ग के हो जाते हैं। पूरे पक जाने पर तोड़ने से चरपराहट कम हो जाती है। पूर्वी मरीच की अपेक्षा दक्षिणी मरिच अधिक गुणदायक है। दक्षिणी मरिच ऊपर से भूरी तथा भीतर से हरियाली युक्त सफेद होती है। यह अधिक तीक्ष्ण होती है। पूर्वी मरिच ऊपर से अधिक काली और भीतर सफेद होती हैं। अधिक पके फलों को जब वे पीले हो जाते हैं तब तोड़कर पानी में फुला कर छिलके दूर करके सुखा लेते हैं। उसी को सफेद मरिच कहते हैं। मरिच के ऊपरी छिलके में कटु द्रव्य अधिक रहता है इसलिये सफेद मरिच कम कटु रहती है। इस सफेद मरिच को-बं० में 'सादा मरिच', म०-में 'पांढरेमिरे, गु०-में 'धोला मरी', क०-में 'विलेय मेणसु' और ता०-में 'मिलाओ' कहते हैं। २ रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील, जल में न घुलनेवाला, पाइपरीन नामक एक २ भा० नि०