भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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चुका है इसलिये तत्सम्बन्धी भाग में केवल मूल श्लोकों का अनुवाद मात्र ही दिया गया है, उसकी व्याख्या नहीं की गई है । व्याख्या में प्रधानता औद्भिद द्रव्यों को ही दी गई है । परिशिष्ट १ में उन सभी प्रमुख द्रव्यों का संक्षेप में वर्णन किया गया है जिनका उल्लेख मूल में या टीका के संदर्भ में नहीं है । परिशिष्ट २ में केवल मूल में आये संस्कृत के सभी पर्यायवाची नामों को अकारादिक्रम से उपस्थित किया गया है जिससे इस बात का ज्ञान हो सके कि अमुक द्रव्य का भावप्रकाश- निघण्टु में उल्लेख हुआ है या नहीं । इसमें प्रत्येक पर्याय के आगे उस द्रव्य का प्रमुख-नाम भी साथ में दिया गया है । इसके पश्चात् सभी द्रव्यों के भारतीय नामों की अकारादिक्रम से सूची दी गई है । इसी में अन्य संस्कृत नामों का भी समावेश है जिनका मूल श्लोकों में उल्लेख न होने से प्रथम संस्कृत सूची में अन्तर्भाव नहीं किया जा सकता था । अन्त में लेटिन एवं अंग्रेजी नामों की भी वर्णानुसार सूची दी गई है ।

इस व्याख्या का सम्पूर्ण श्रेय मेरे गुरुवर्य, परमपूज्य आदरणीय डॉ० गंगासहाय पाण्डेय जी को है जिन्होंने न केवल इस व्याख्या को तैयार करने में निदेशक का कार्य किया अपितु लेखक को इस योग्य बनाने में भी उनका वरदहस्त रहा है ।

आयुर्वेदीय वनस्पतियों के प्रकाण्ड विद्वान्, महान् वैज्ञानिक, आयुर्वेद शिरोमणि, श्री डा० बलवन्तसिंह जी, एम० एस० सी०, भूतपूर्व प्राध्यापक, आयुर्वेदिक कालेज, का० हि० वि० त्रि०, जिन्होंने अपना सारा जीवन ही आयुर्वेदीय वनस्पतियों के अन्वेषण में लगाया एवं जिनके शिष्यत्व का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ उनको यह कृति समर्पण करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है । हमारी यही कामना है कि इसी तरह उनका मार्गदर्शन हमें आजीवन मिलता रहे ।

यह व्याख्या वास्तविक रूप में संदर्भ-ग्रन्थ सूची में उल्लिखित कृतियों का संकलन मात्र ही है इसलिये मैं उन सभी महान् विद्वानों का अत्यन्त आभारी हूँ । चौखम्बा परिवार के सभी सदस्यों को धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता जिनकी सहायता के बिना यह कार्य पाठकों के सम्मुख उपस्थित हो ही नहीं सकता था ।

आशा है, यह व्याख्या न केवल विद्यार्थियों को अपितु अध्यापकों तथा वनस्पति अनुसन्धानकर्ताओं को भी उपादेय होगी । संभव है, इसमें कुछ त्रुटियाँ भी रह गई हों जिनके लिये विद्वान् क्षमा करेंगे तथा अपने सुझाव देंगे जिससे अगले संस्करण में इनका परिमार्जन किया जा सके ।

विनीत कृष्णचन्द्र चुनेकर दिनांक २६ मई १९६६


संदर्भग्रन्थ

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