भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 143 में से

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१४६ भावप्रकाशनिघण्टुः ( १६ वीं शताब्दी ) में इसका प्रयोग किया गया है। अफीम की जानकारी के पूर्व लोग पोस्ते की डोडी का उपयोग उत्तेजक एवं मादक पेय के रूप में करते थे। अफीम की खोज सम्भवतः सर्व- प्रथम ग्रीस में हुई तथा पहली शताब्दी में 'एशिया माइनर' इसके व्यापार का केन्द्र रहा। अरबों ने इसका प्रचार चीन एवं भारतवर्ष में किया। मुगलों के समय भारत में इसकी व्यापक रूप में खेती की जाती थी जिससे लोग इसकी डोडी का उपयोग 'कुकनार' नामक मादक पेय के रूप में करते थे। यहां से चीन एवं पूर्वीय देशों को काफी मात्रा में अफीम जाती थी। पंजाब में 'पोस्त' नाम से कुकनार की तरह पेय का प्रयोग किया जाना था। अंग्रेजों के समय इसकी खेती पर व्यापक नियन्त्रण के कारण धीरे धीरे इसकी खेती कम होती गई तथा पोस्ते की डोडी का भी उपयोग कम हो गया। अंग्रेजों के समय इसकी उपज के ३ केन्द्र थे। बिहार एवं बंगाल की अफीम 'पटना या बंगाली' अफीम, उत्तर प्रदेश की अफीम 'बनारसी' एवं राजपुताना के ग्वालियर, भोपाल तथा बड़ोदा आदि स्थानों की अफीम 'मालवा' अफीम कहलाती थी। पंजाब के कुछ भागों में धार्मिक आधार पर इसके खेती को छूट है अन्यथा इसकी खेती के लिये अनुमति पत्र लेना पड़ता है तथा पूरी उपज सरकार निश्चित मूल्य पर खरीद लेती है। आजकल इसकी खेती उत्तरप्रदेश, पूर्वी पंजाब, राजपुताना एवं मध्यभारत में की जाती है। एशिया, यूरोप एवं उत्तरी अफ्रीका के साधारण उष्ण प्रदेशों में भी इसकी खेती की जाती है। अक्तूबर, नवम्बर महीने में इसके बीजों को बोते हैं। दिसम्बर में सरकारी अफसर खेत की जांच करते हैं। जनवरी से मार्च तक अफीम का संग्रह करके अप्रिल से जून तक बिकने के लिये भेजी जाती है। काले, लाल और सफेद फूलों के भेद से पोस्त तीन प्रकार के होते हैं। इनमें सफेद फूल वाला पोस्त सबते अधिक प्रायः सम्पूर्ण भारतवर्ष में होता है। संयुक्तप्रान्त, बिहार और बङ्गाल की ओर सफेद ही होता है। इसका एक वर्षाणु क्षुप-२-४ फुट तक ऊंचा होता है। कांड-चिकना चमकीला हरित क्वचित अल्प रोमश एवं अल्प शाखा युक्त होता है। पत्र-आयताकार, विषम दन्तुर, अल्पशः तरंगी या खण्डित एवं उनका हृदयाकृति फलकमूल कांड को घेरे रहता है। फूल- कटोरीनुमे बहुत सुहावने दिखाई पड़ते हैं। फूल खिलने के एक महीने बाद पुष्पदल के बीच डोडी ( फल ) लगती है। डोडी ( Capsule ) -अण्डाकार या करीब-करीब वर्तुलकार, २-३ इञ्च के घेरे में एवं कभी-कभी आधार एवं शीर्ष पर दबी हुई होती है। इसका शीर्ष टोप की तरह कंगूरे- दार, १२-१५ कंगूरों से युक्त एक बड़े कुक्षि (Stigma = रिटग्मा) से बना होता है। इसका आधार संकुचित होकर एक ग्रीवा बनाता है जो पुष्प दण्ड की तरफ फैली हुई रहती है। इसका रंग हल्का पीताभ या भूरा एवं इस पर कुछ काले रंग के धब्बे रहते हैं। इसकी महीन एवं सिदुर फल भित्ति से अन्दर की तरफ १२-१५ महीन अन्तर्भित्तियां निकली रहती हैं जो बीच में आपस में मिलती नहीं। इसमें शीर्ष पर अक्षि के ठीक नीचे चारों तरफ कई छिद्र बन जाते हैं जिनसे बीज बाहर निकल कर बीज स्फुटन ( Dehiscence ) होता है। इसी डोडी से अफीम निकाली जाती है। सफेद फूल वाले पोस्ते से मॉर्फीन (Morphine ) सबसे कम निकलती है। बाजार में मिलने वाली डोडी टूटी-फूटी तथा उन पर लम्बाई में या आडबल में चीरे लगे होते हैं। डोडी के खानों के भीतर छोटे-छोटे करीब-करीब सफेद रंग के वृक्काकृति अनेक बीज होते हैं। इनकी सतह जाली- दार एवं किनारे सीधे होते हैं। ये गन्धहीन एवं इनका स्वाद मधुर एवं कुछ कड़वा होता है। काले या नीले फूल तथा काले डण्ठल वाला पोस्ता राजपुताना एवं मध्यभारत में बहुत पाया जाता है। इसका पौधा बहुत छोटा और डोडे भी बहुत छोटे-छोटे होते हैं। इसमें मॉर्फीन ( Mor- phine ) श्वेत जाति की अपेक्षा तिगुनी निकलती है।

हरीतक्यादिवर्गः १४७ लाल फूल वाला पोस्ता हिमालय पहाड़ में पाया जाता है। काश्मीर और उत्तरीय भारत के मैदानों में २-३ प्रकार का लाल फूल का पोस्ता स्वयं उत्पन्न होता है। उसके फूलों को 'गुललाला' कहते हैं। इसके डोडे से गहरे रंग के पोस्तदाने निकलते हैं। लाल फूल वाले पोस्ते से मॉर्फीन मध्यम मात्रा में निकलती है। रासायनिक संगठन-पोस्ते की डोडी में ०.१-०.३% मॉर्फीन ( Morphine ) एवं अत्यल्प मात्रा में कोडीन ( Codeine ), पॅपेहेराइन ( Papaverine ) एवं नार्कोटीन ( Narcotine ) आदि क्षाराम एवं मेकोनिक एसिड ( Meconic acid ) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-पोस्ते की डोडी में अल्प मात्रा में अफीम के क्षाराम होने के कारण यह निद्राकर, मादक, वेदनाहर, ग्राही एवं रक्तस्तम्भक होती है। ( १ ) वेदनाहर एवं निद्राजनक होने के कारण इसके फांट या क्वाथ को शिरःशूल, अर्धावभेदक, पार्श्वशूल, कटिशूल, गृध्रसी, उन्माद एवं अनिद्रा आदि में पिलाते हैं तथा इसका स्थानीय लेप किया जाता है। गले के दर्द में इससे गण्डूष कराते हैं। ( २ ) ग्राह्य औषधियों के साथ अतिसार एवं संग्रहणी में इसका चूर्ण बहुत लाभदायक है। रक्तातिसार में देने से रक्त गिरना भी बन्द हो जाता है। बच्चों के दन्तोद्भेद के समय होने वाले अतिसार में इसका प्रयोग किया जाता है। ( ३ ) मोच, सूजन एवं चमड़े के छिल जाने आदि में इसके फांट या क्वाथ से सेंका जाता है। ( ४ ) शुष्क कास में अन्य औषधों के साथ इसके चूर्ण का उपयोग लाभदायक है। ( ५ ) पीडायुक्त नेत्राभिष्यन्द में इसका लेप नैत्र के चारों तरफ लगाते हैं। ( ६ ) कर्णपीडा में इसके क्वाथ से सेंका जाता है। ( ७ ) कोकनार नामक मादक पेय के रूप में इसका बहुत प्रयोग किया जाता था एवं अफीम की जानकारी के पूर्व भी मादक एवं उत्तेजक पेय तथा शामक औषध के रूप में इसका व्यवहार किया जाता था। मात्रा-१-२ माशा। अथाहिफेनकम् ( अफीम ) । तस्य नामगुणानाह उक्तं खसफलक्षीरमाफूकमहिफेनकम् । आफूकं शोषणं ग्राहि श्लेष्मघ्नं वातपित्तलम् । तथा खसफलोद्भूतवल्कवत्प्रायमित्यपि ॥ २३८ ॥ अफीम की उत्पत्ति, नाम तथा गुण-पोस्ता के फल के दूध से अफीम बनती है। अतः इसे खस- फलक्षीर भी कहते हैं। खसफलक्षीर, आफूक और अहिफेनक ये नाम अफीम के हैं। अफीम- रक्तादि धातुओं की शोषक, ग्राही, कफनाशक एवं वातरक्तकारक होती है तथा पोस्ता के फल के छिल्के के जितने गुण हैं वे भी इसमें रहते हैं ॥ २३८ ॥ ८४ अफीम । हि०-अफीम, अफयून । बं०-आफिम । म०-अफ़ू । मला०-आलन । मा०-अफीम, अमल । गु०-अफीण । ते०-अभिनि । क०-अफिनि । ता०-अविनी । अ०-अफ्यून, लबुनूल् खशखाश । अं०-Opium ( ओपियम् ) ।