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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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१५२ भावप्रकाशनिघण्टुः (१०) मलेरिया आदि विषमज्वरों में इससे लाभ होता है ऐसी धारणा थी । जिन जिन स्थानों में अफीम का सेवन किया जाता है वहां मलेरिया कम होता है ऐसी धारणा थी । कुछ विद्वानों ने इसके नार्कोटीन (Narcotine) नामक क्षाराभ को ३-१३ २० की मात्रा में मलेरिया में सफलता- पूर्वक प्रयोग किया लेकिन कर्नल चोपरा के प्रयोगों के द्वारा यह ज्ञात होता है कि इससे मलेरिया के कोटाणुओं पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं होता । यह बात अवश्य है कि अफीम या नार्कोटीन मस्तिष्क के उन स्थानों का जहां सूक्ष्मतर वेदनाओं का ज्ञान होता है (Algesic areas of brain), अवसाद उत्पन्न करती है जिससे ज्वर में होने वाले शिरःशूल, बेचैनी एवं शरीर में पीड़ा आदि लक्षण कम होकर तथा पसीना आकर ज्वर कम होने से लाभ प्रतीत होता है । मस्तिष्क या उसके आवरण में शोथ होने से यदि ज्वर हो तो इसका प्रयोग न करें । (११) गर्भपात में शामक औषध के रूप में अफीम या मॉर्फीन का पूर्ण मात्रा में उपयोग किया जाता है । अत्यार्तव एवं रक्तप्रदर आदि में नार्कोटीन से व्युत्पन्न अन्य स्टिप्टिसौन (Stypticin) या स्टिप्टोल (Styptol) आदि का उपयोग आन्तरिक एवं स्थानिक पिचु आदि के रूप में व्यवहार किया जाता है । (१२) फुफ्फुसावरण शोथ, आमवात एवं कटिशूल आदि में इसका पोल्टिस लगाया जाता है या १ छ० गरी या तिल के तेल में ३ मा० अफीम मिला कर मालिश की जाती है । मलाशय, श्रोणिगुहा की पीड़ा एवं परिकर्तिका आदि में अफीम की गुदवर्ती या बस्ति का उपयोग किया जाता है । शोथयुक्त अर्श पर माजूफल के साथ अफीम का मरहम लगाया जाता है । कर्णशूल में गिलसरीन के साथ इसके टिंक्चर को कान में डालने से लाभ होता है । अफीम के विष लक्षण-अफीम अधिक मात्रा में लेने से या आत्महत्या के लिये प्रयोग से घातक होती है । प्रथम तन्द्रा मालूम होती है । रोगी को उस समय जगाया जा सकता है लेकिन धीरे २ तन्द्रा बढ़ कर सन्यास का रूप धारण कर लेती है तब रोगी को जगाया नहीं जा सकता । आंखों की पुतलियां बिल्कुल संकुचित हो जाती हैं लेकिन मृत्यु के कुछ मिनट पूर्व पुतलियां विकसित हो जाती हैं । शरीर ठण्डा और पसीने से तर हो जाता है । चेहरा, ओठ एवं अङ्गुलियां नीली पड़ने लगती हैं। नाड़ी अत्यन्त क्षीण तथा मन्द होती है। श्वास मन्द, अनियमित तथा अन्तिम अवस्था में घरघराहट युक्त हो जाता है । प्रत्याक्षिप्त क्रियाएं लुप्त हो जाती हैं। अन्त में श्वासावरोध से मृत्यु हो जाती है । अवसादावस्था प्रायः ४ से ६ घण्टे रहती है और ६ से १२ घण्टे में मृत्यु हो जाती है । विष चिकित्सा- (१) सर्वप्रथम रोगी को रीठे का जल या सरसों या राई जल के साथ या तूतिया १० २० जल के साथ पिलाकर वमन कराना चाहिये । लेकिन प्रायः वमन केन्द्र के अवसादित होने के कारण वमन नहीं होता इसलिये सबसे अच्छा यह है कि स्टमक् पम्प या साइफन् के द्वारा आमाशय प्रक्षालन कराया जाय । सर्वप्रथम रोगी को २-४ २० पोटैशियम् पर- मैग्नेट २ से ६ छ० जल के साथ पिला दें। फिर उसी के हल्के घोल से आमाशय प्रक्षालन तब तक करें जब तक घोल का रंग उसी तरह नहीं रहता । (२) श्वसन केन्द्र को उत्तेजित करने के लिये बार २ गरम कॉफी का काथ पिलाना तथा ॲट्रोपीन, स्ट्रिक्नीन् ग्रेन, कोरामीन एवं लेप्टॅझॉल् आदि का सूचिकाभरण करना, कृत्रिम श्वसन कराना या श्वसन यन्त्रों का उपयोग करना, ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइ ऑक्साइड को सुंघाना आदि उपचार करना चाहिये । अफीम आदि के अवसादक तथा मादक विषैले प्रभाव को दूर करने के लिये उसके ठीक विरोधी कार्य करने वाली एक नई औषध नैलॉर्फीन हाइड्रोक्लोराइड हरीतक्यादिवर्गः १५३ (Nalorphine Hydrochloride) ५-१० मि. ग्रा. की मात्रा में शिरा द्वारा दी जाती है । लेथिड्रोन (Lethidrone, Burr. & Well.) एवं नेलाइन हाइड्रोक्लोराइड (Nalline hydro- chloride, Merck) नाम से यह डाक्टरी दुकानों में मिलती है। बच्चों में ०२५ मि. ग्रा. हर दो मिनट पर कई बार दी जाती है । अन्य औषधों में चन्द्रोदय, कस्तूरी, जुन्दवेदस्तर, हींग, जद्दार या जहरमोहरा पिष्टी आदि को शहद के साथ बार-बार चटाना चाहिये । (३) रोगी को सोने न दें। बार-बार उस पर ठंडा एवं गरम जल छिड़कते रहें । रोगी को पकड़कर चलावें । तीक्ष्ण नस्य, सरसों का लेप, बार-बार हिलाना आदि क्रियाओं से रोगी को जगावें । अफीम के व्यसन के दुष्परिणाम - कुछ दिन लगातार अफीम खाने से उसकी आदत पड़ जाती है तथा उससे लाभ होने के लिये प्रत्येक समय मात्रा भी बढ़ानी पड़ती है। अफीमची २३-१० २० तक बिना किसी तीव्र दुष्परिणाम के अफीम का सेवन कर सकता है। इसके व्यसन से नैतिकपतन, कृशता, पाण्डु, मांसपेशियों की दुर्बलता, मांसपेशियों के कार्य में असमन्वयता, थकावट, नाडी की दुर्बलता, कंप, अग्निमांद्य, पाचन की खराबी, विबंध, निद्रानाश, तन्द्रा, नपुंसकता, अनार्तव एवं आंखों की पुतलियों का संकुचित होना आदि लक्षण होते हैं। लेकिन यदि अफीमची की अफीम बंद कर दी जाय तो भी मानसिक उत्तेजना, बेचैनी, आमाशय में पीड़ा, जलन एवं कभी-कभी वमन, विरेचन, स्वेदाधिक्य, पुरुषों में वीर्यपात और स्त्रियों में प्रहर्ष आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। एकाएक बंद करने से दुर्बल या वृद्ध लोगों में कभी-कभी अत्यन्त दौर्बल्य, अवसाद एवं निपात होकर मृत्यु भी हो सकती है । अफीम छुड़ाने के उपाय - बच्चों में या जो दिन भर में २३ रत्ती से कम अफीम सेवन करते हैं या जो दुर्बल एवं वृद्ध नहीं है तथा किसी तीव्र शारीरिक रोग से पीड़ित नहीं है उनमें एकाएक अफीम बंद की जा सकती है । ३ दिन तक तकलीफ़ रहती है लेकिन बाद में ठीक हो जाती है। यदि हृल्लास, अतिसार एवं मानसिक प्रक्षोभ आदि लक्षण हों तो क्षारीय मिश्रण तथा शामक औषधों का प्रयोग करना चाहिये । निपात आदि के लिये ॲड्रिनॅलीन का सूचिकाभरण तथा चाय, कोको एवं अमोनिया आदि का प्रयोग करें । सबसे सरल उपाय यह है कि धीरे-धीरे अफीम की मात्रा कम की जाय । कुचला, चिरायता एवं मिरिच आदि के साथ अफीम की गोलियां बनाकर उसका उपयोग करें। गोलियों में धीरे-धीरे अफीम कम करें । आहार में लेसिथिन नामक प्रभोजन का उपयोग भी लाभदायक है। यह अंडे तथा सोयाबीन आदि में होता है। अल्प मात्रा में मद्य एवं कुछ शामक औषधों का उपयोग भी किया जा सकता है। मात्रा - अफीम ३-१ २०; टिंक्चर ओपिआइ ५-३० बूंद, एक साल से कम उम्र के बच्चों को ३-१ बूंद से अधिक नहीं । अथ खासखसतिलाः । तेषां नाम गुणाँश्चाह उच्यन्ते खसबीजानि ते खासखसतिला अपि ॥ २३१ ॥ खसबीजानि बल्यानि वृष्याणि सुगुरूणि च । जनयन्ति कफं तानि शमयन्ति समीरणम्॥ खसखस के दाने के नाम तथा गुण - पोस्ता के दाने के ही खसबीज तथा खासखसतिल ये दोनों नाम संस्कृत में होते हैं । खसखस के दाने-बलकारक, वृष्य (वीर्यवर्धक) और अत्यन्त गुरुपाकी होते हैं तथा ये कफ के उत्पन्न करने वाले एवं वायु को शमन करने वाले होते हैं ॥

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