भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६८ भावप्रकाशनिघण्टुः शोधन-बाजारू सोरे में ४०-६४% शुद्ध सोरा होता है और बाकी नमक रहता है। कलमी- शोरा काफी शुद्ध होता है। शोरे को साफ करने के लिये एक तांबे के पात्र में शोरे के बराबर उबलते जल में उसे घोलते हैं तथा मोटे कपड़े से लकड़ी की थालियों में छानते हैं। जब घोल ठंडा होने लगता है तब उसे लकड़ी से हिलाते जाते हैं जिससे इसका दानेदार चूर्ण प्राप्त होता है। औषध-प्रयोग में लाने से पूर्व इलायची के क्वाथ से इसमें ३ बार भावना देनी चाहिये। अशुद्ध सोरे के प्रयोग से दाह, मूर्च्छा, रक्तपित्त, श्रम, अग्निमान्द्य एवं विड्ग्रह आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। अशुद्ध के सेवन से उत्पन्न विकारों की शान्ति के लिए ३ माशा कालीमरिच का चूर्ण घृत के साथ ७ दिन तक प्रातःकाल में सेवन करना चाहिये। शुद्ध सोरा रंगहीन दानेदार चूर्ण रूप में या षट्फलक स्फटिक रूप में होता है। इसका स्वाद शीतल एवं कुछ नमकीन होता है। अंगारे पर डालने से एकदम जलने लगता है। इसमें का आक्सीजन अलग होने में समर्थ होने के कारण किसी गंधक आदि ज्वलनशील पदार्थ के साथ इसे मिलाकर गरम करने से एकाएक बहुत तीव्र उष्णता उत्पन्न होती है जिसमें चांदी का सिक्का तक गल जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें पोटैशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate, KNO₃) रहता है। अल्प मात्रा में सोरे में कुछ नाइट्राइट्स (Nitrites) भी पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह कटु, तीक्ष्ण, मूत्रविरेचनीय, स्वेदजनन, श्लेष्महर एवं शोथहर है। इसका गाढ़ा घोल आमाशय एवं आंत्र में तीव्र प्रक्षोभ उत्पन्न करता है जिससे रक्तवमन, रक्तातिसार तथा हृदयातिपात होकर मृत्यु भी हो सकती है। हृदय के लिए यह अवसादक होने के कारण हृदय की गति कम होती है तथा उसका बल भी कम हो जाता है। यह रक्त कणों के आक्सीजन ग्रहण करने की शक्ति को घटाता है एवं इससे रक्त जमने की क्रिया भी घट जाती है। इसका मूत्रल प्रभाव वृक्क द्वारा अधिक मूत्र के छनने (Filtration) से होता है तथा अधिकांश मात्रा में यह मूत्र द्वारा उत्सर्गित हो जाता है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, ज्वर, शोथ, प्लीहावृद्धि, पाण्डु, कामला, प्रमेह एवं अग्नि मांद्य आदि में किया जाता है। (१) मूत्रकृच्छ्र एवं अश्मरी में इसको गोखरू के काढ़े के साथ पिलाते हैं तथा बड़ के पत्तों को पीस कर तथा उसमें सोरा मिला कर पेडू पर लेप करते हैं। (२) पुराने सोजाक में सोरा ५, दालचीनी ४, हर्र ३, पाषाणभेद ३, इलायची ५ एवं चीनी २० भाग, इसका अवलेह ४ माशा की मात्रा में उपयोगी हैं। सोरा ५ रत्ती को मात्रा में भिंडी के क्वाथ के साथ देने से भी सोजाक में लाभ होता है। (३) श्वेत प्रदर (ल्यूकोरिया) में ५ र० सोरा तथा तथा २॥ र० फिटकिरी का चूर्ण दिन में ३ बार दिया जाता है। (४) तमक श्वास के आवेग को रोकने के लिये इसके २०% घोल में सुखाए हुए सोख्ते के कागज को जलाकर उसका धुआँ नाक से सूंघने से आवेग रुक जाता है। (५) ज्वर में मद्य, शर्करा एवं उष्ण जल के साथ १० र० सोरा देने से पसीना हो कर ज्वर कम हो जाता है। (६) वातरक्त (गाउट) एवं मदात्ययजन्य शिरःशूल के निवारण के लिये सोरा १० र० एवं पोटैशियम् बाइकार्बोनेट १५ र० एक बोतल सोडावाटर के साथ पिलाने से आवेग रुक जाता है। आमवात में अर्कमूल के चूर्ण के साथ या मांड के साथ इसको दिया जाता है।
हरीतक्यादिवर्गः १६६ (७) उरस्तोय (प्लूरिसी), सद्रव हृदयावरणशोथ (पेरीकार्डीइटिस) एवं जलोदर आदि में पुनर्नवा, काली कुटकी, सोंठ आदि के क्वाथ के साथ इसका प्रयोग करते हैं। (८) ५ साल से बड़े बच्चों की खांसी में सोरा ५, हीराक्सीस ४, नौसादर ४ एवं गन्धक ४ भाग इनका चूर्ण ३ र० की मात्रा में देते हैं। (९) शिरःशूल, शोथ, आमवातज सन्धिपीडा, मोच एवं चोट आदि पर नवसादर एवं सोरा जल में घोल कर उसमें कपड़ा भिगो कर उसकी पट्टी रखी जाती है। (१०) औषध के अतिरिक्त सोरे का उपयोग बन्दूक की बारूद, तेजाब, रंगने का काम, मांस-मछली-संरक्षण, खाद, कांच के निर्माण में द्रावण के रूप में एवं आतिशबाजी आदि में किया जाता है। अधिक मात्रा से-हृदय को दुर्बलता, आमाशय एवं आंत्र में प्रक्षोभ, वृक्कशोथ एवं वस्ति- शोथ होता है। इन व्याधियों से पीड़ित व्यक्तियों में इसका उपयोग भी नहीं करना चाहिये। हानिनिवारक-कतीरा एवं मधु। मात्रा-२-१० र०
अथ टङ्कणक्षारः (सुहागाखार) तस्य नामगुणानाह सौभाग्यो टङ्कणं क्षारं धातुद्रावकमुच्यते। टङ्कणं वह्निकृद्रूक्षं कफहृद्वातपित्तकृत् ॥ २५६ ॥ सुहागा के नाम तथा गुण-सौभाग्य, टङ्कण, क्षार तथा धातुद्रावक ये नाम संस्कृत में सुहागा के हैं। सुहागा-अग्निकारक, रूक्ष, कफनाक्षक एवं वातपित्तकारक होता है ॥ २५६ ॥ ९६ सुहागा हि०-सुहागा, सोहागा, टिंकाल । बं०-सोहागा । तिब्बत-चूतरले (साधारण ), तरूलेमेटांग (अच्छा), चूसल । म०-टांकणखार । मा०-सोगो । काश्मी०-बवूत । गु०-खडियाखार,टंकणखार । क०-बिलिगार । पं०-सुहागा । ता०-वेंगा(का)रं । ते०-एलिंगारम्, वेल्लिगारं । फा०-त(ति)न्कार । अ०-बोरक । अं०-Borax (बोरेक्स ); Sodium Borate ( सोडियम् बोरेट ); Biborate of Soda (बाइबोरेट ऑफ सोडा) । ले०-Sodii Biboras ( सोडिआई बाइबोरास )। सुहागा एक प्रसिद्ध खनिज द्रव्य है। भारतवर्ष में इसकी जानकारी बहुत प्राचीन काल से रही है कि लेकिन युरोप वालों को १७ वीं शताब्दी के अन्त तक इसकी अधिक जानकारी नहीं थी। सर्वप्रथम दक्षिण भारत से युरोप में इसका प्रचार हुआ । यह स्वाभाविक एवं कृत्रिम ( रासायनिक विधि द्वारा बनाया ) दो प्रकार का होता है। चूना, गोदन्ती एवं नमक आदि पदार्थों के साथ तथा स्वतन्त्र रूप में यह प्राप्त होता है। हिमालय की पर्वतश्रेणियां, काश्मीर, लद्दाख एवं विशेष रूप से तिब्बत इसके उत्पत्ति-स्थान हैं । तिब्बत से आने वाले चौकोर स्फटिक होते हैं। इन्हें चौकिया सोहागा कहा जाता है जिसका औषधि के लिये व्यवहार करते हैं। इसी को संभवतः आयुर्वेद- प्रकाश में 'नीलकण्ठ' कहा गया है जिसमें नीली आभा रहती है। इन पर मिट्टी लगी रहती है। अंगुली से रगड़कर मिट्टी हटाने पर तेलिया स्पर्श मालूम होता है। खुली हवा में टंकण का जलीयांश निकल जाता है जिससे उसके ऊपर सफेद बुरादा जम जाता है। इसलिये इस पर घी या चर्बी लगा देते हैं। शुद्ध टङ्कण स्फटिक सदृश, वर्णरहित, पारभासक, चमकीला, गन्धहीन, स्वाद में कुछ नमकीन एवं कसैला तथा अल्पक्षारीय होता है। इससे गरम करने पर इसका जलीयांश निकल जाता है