भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७८ भावप्रकाशनिघण्टुः विष चिकित्सा—वामक द्रव्यों का प्रयोग एवं शीत तथा उष्ण निरूहण बस्ति का क्रम से बारंबार प्रयोग तथा प्रतिक्षोभक, विरेचक एवं उत्तेजक औषधियों का प्रयोग करना चाहिये । कुपीलु सत्व का सूचिकाभरण आवश्यकतानुसार किया जाता है। मद्यसार एवं तैलीय पदार्थों का प्रयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि कपूर उनमें घुल जाता है। जीर्ण विषैला प्रभाव—कुछ युवा स्त्रियों में सौन्दर्य वृद्धि के लिये कपूर खाने की आदत पड़ जाती है जिसको छुड़ाना कठिन होता है। इसके कारण साधारण मानसिक उत्तेजना, तन्द्रा, अत्यधिक दौर्बल्य एवं पाण्डुता आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं । नोट—कपूर का चूर्ण बनाने के लिये खरल में घोटते समय रेक्टिफाइड स्पिरिट से कपूर आर्द्र कर लेने से आसानी से चूर्ण बन जाता है तथा खरल में चिपकता नहीं । मात्रा—१-२ र०; आसव—५-२० बूंद; कर्पूराण्डु—१-२ औं० । अथ कस्तूरी । तस्या नामभेदगुणानाह मृगनाभिर्मृगमदः कथितस्तु सहस्रभित् । कस्तूरिका च कस्तूरी वेधमुख्या च सा स्मृता ॥ कामरूपोद्भवा कृष्णा नैपाली नीलवर्णयुक् । काश्मीरी कपिलच्छाया कस्तूरी त्रिविधा स्मृता ॥ कामरूपोद्भवा श्रेष्ठा नैपाली मध्यमा भवेत् । काश्मीरदेशसम्भूता कस्तूरी ह्यधमा मता ॥ कस्तूरिका कटुस्तिक्ता क्षारोष्णा शुक्रला गुरुः। कफवातविषच्छर्दिशीतदौर्गन्ध्यशोफहृत् ॥ कस्तूरी के नाम, भेद तथा गुण—मृगनाभि, मृगमद, सहस्रभित्, कस्तूरिका, कस्तूरी, और वेधमुख्या ये सब कस्तूरी के संस्कृत नाम हैं। वर्णभेद से कस्तूरी तीन प्रकार की होती है जैसे— १ कामरूप (कामरूदेश) में उत्पन्न होने वाली कस्तूरी कृष्णवर्ण की (काली) होती है। २ नेपाल देश में उत्पन्न होनेवाली नीले रङ्ग की होती है। ३ कश्मीर देश में उत्पन्न होने वाली कपिल वर्ण की होती है। इनमें से कामरूप देश की कस्तूरी उत्तम, नेपाल देश की मध्यम एवम् कश्मीर देश की अधम गुण वाली होती है। कस्तूरी-कटु तथा तिक्त रस युक्त, क्षार गुण विशिष्ट, उष्णवीर्य, वीर्यजनक और गुरु होती है। यह कफ, वायु, विष, वमन, शीत, दुर्गन्ध और शोथ को दूर करने वाली होती है ॥ ५-८ ॥ ३ कस्तूरी । हि०—कस्तूरी, मृगनाभि, मृगनाफा। बं०—मृगनाभि । ते०—कास्तूरी । म०—गु०—क०—ता०— कस्तूरी । फा०—मुष्क । अ०—मिस्क । अं०—Musk (मस्क) । ले०—Moschus (मोस्कस्) । हिरन की कई जातियाँ होती हैं किन्तु सब जाति के हिरनों से कस्तूरी नहीं निकलती। जिस हिरन से कस्तूरी निकलती है उसको संस्कृत में 'कस्तूरीमृग', यूनानी में 'हिरनमुस्की' और लेटिन में मोस्कस् मोस्कीफेरस (Moschus moschiferus; Fam. Cervidae) कहते हैं । यह मृग उत्तरी भारत, नेपाल, आसाम, कश्मीर, मध्य एशिया, तिब्बत, भूतान, चीन एवं रूस आदि स्थानों में ७०००-८००० फीट ऊंची पहाड़ी चोटियों पर सघन जंगलों में पाया जाता है। यह विशेष कर तिब्बत में अधिक होते हैं। यह हिरन की जाति का बहुत सुहावना और सुन्दर मृग होता है किन्तु न इसके सींग होते हैं न दुम । यह मृग करीब २० इंच ऊँचा, लौह के समान गहरे धूसर वर्ण का, अत्यन्त सर्शक स्वभाव का प्राणी होता है। इसके ऊपरी जबड़े में दो लंबे दंष्ट कर्पूरादिवर्गः १७६ होते हैं जो बाहर नीचे की ओर हुक की तरह निकले रहते हैं। इसका मुंह लंबा, पैर पतले तथा सीधे एवं बाल रूखे और लम्बे होते हैं। इसके लिंगेन्द्रिय के मणि को ढांकने वाले चमड़े के प्रवर्धन से बनी हुई एक थैली होती है जिसके सूखे हुये स्राव को 'कस्तूरी' कहते हैं। नर हिरन में ही यह पायी जाती है। यह थैली नाभि के पास, नाभि एवं शिश्नावरण के बीच में स्थित रहती है। यह अंडाकार, १३-३ इश्व लम्बी एवं १-२ इश्व चौड़ी होती है। इसके अग्रभाग में केशयुक्त एक छोटासा छिद्र होता है तथा पिछले भाग में एक सिकुड़न सी होती है जो शिश्नाग्रचर्म के मुख से मिल जाती है। इसके अन्दर के चिकने आवरण की अनियमित तहों के कारण यह कई अपूर्ण विभागों में बंटी होती है। कस्तूरी, युवावस्था के मृगों में उनके मदकाल (Rutting season) में अधिक मात्रा में होती है तथा उसी समय उसकी शक्ति एवं गन्ध अधिक रहती है। यह काल करीब १ महीने का होता है। रा० नि० में भी लिखा है कि—'बाले जरति च हरिणे क्षीणे रोगिणि च मन्दगन्धयुता । कामातुरे च तरुणे कस्तूरी बहलपरिमला भवति ॥' बालक, वृद्ध, क्षीण और रोगी हिरन की कस्तूरी मन्द गन्ध वाली होती है तथा कामातुर और तरुण हिरन की कस्तूरी अत्यन्त सुगन्धित होती है। जब उक्त हिरन की नाभि में कस्तूरी बन जाती है तब उसमें से कस्तूरी की गन्ध आती है और वह मृग किसी दूसरे पदार्थ की गन्ध समझ कर इधर-उधर घूम-घूम कर वृक्षों को सूंघा करता है जिससे बहेलिये आसानी से पहचान कर उसको मार डालते हैं और नाभि को काट लेते हैं। स्वस्थ वयस्क प्राणी में करीब २३ तो० कस्तूरी पाई जाती है। १ साल के बच्चे में कस्तूरी नहीं होती तथा २ साल के बच्चे में करीब ६-७ माशे होती है जो दुधिया रहती है। वृद्ध प्राणि में भी ७ माशे से अधिक नहीं होती। इसमें सुगन्ध ही एक मनोहर गुण है जो बहुत तीव्र स्वतन्त्र प्रकार की और शीघ्र फैलने वाली होती है। इसका स्वाद सुगन्ध युक्त कडुवा होता है। कस्तूरी के प्रकार'-मृग के शिकार के बाद इन नाभी को निकाल कर धूप एवं हवा में सुखाते हैं। फिर इन नाभी को मृग के बालों में लपेट कर चमड़े की थैलियों में बन्द किया जाता है तथा बाद में सीलबन्द डब्बों में या अन्दर से टीन का अस्तर लगे हुये लकड़ी के बक्सों में बन्द कर बाहर भेजा जाता है। व्यापार की कस्तूरी ३ प्रकार की होती है। (१) रूस की कस्तूरी—इसमें गन्ध बहुत कम होती है (२) आसाम की कस्तूरी—यह बहुत अच्छी तथा तीव्र गन्ध युक्त होती है तथा इसका रंग काला होता है। सम्भवतः प्राचीनों ने कामरूप कस्तूरी इसी को कहा है। (३) चीन की कस्तूरी-यह सबसे मंहगी होती हैं क्योंकि अन्य हीन श्रेणी की कस्तूरी में जो कभी कभी अमो- मिया आदि की अप्रिय गन्ध होती है वह इसमें बिलकुल नहीं होती। यह कस्तूरी तिब्बत से ही चीन को जाती है। एक अन्य तीक्ष्ण अप्रिय गन्ध वाली कस्तूरी कंबर्डाइन् नामक होती है जो मंगोलिया एवं मंचूरिया के उत्तरी भाग तथा पूर्वी साइबेरिया से आती है। उत्तम कस्तूरी—रक्ताभश्याम वर्ण की, गोल बड़े दानेवाली, तीक्ष्ण गन्ध वाली, स्वाद में तिक्त, हल्की एवं मुलायम कस्तूरी उत्तम होती है। इसकी गन्ध बहुत स्थायी रहती है तथा ३००० १. कपिला पिङ्गला कृष्णा कस्तूरी त्रिविधा क्रमात् । नेपालेऽपि च काश्मीरे कामरूपे च जायते ॥ साऽन्येका खरिका ततश्च तिलका ज्ञेया कुलित्थाऽपरा, पिण्डाऽन्यापि च नायिकेति च परा या पञ्चभेदाभिधा । सा शुद्धा मृगनाभितः क्रमवशद्देशा क्षितीशोचिता पञ्चख्यादिदिनत्रयेषु जनिता कस्तूरिका स्तूयते ॥ चूर्णाकृतिस्तु खरिका तिलका तिलाभा, कौलत्थबीजसदृशी च कुलित्थिका च । स्थूला ततः कियदिदं किल पिण्डिकारूया तस्याश्च किंचिदधिका यदि नायिका सा ॥ रा. नि. ।