भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
२६६ भावप्रकाशनिघण्टुः 'पर्पटी' जो कि 'पद्मावती' नाम से उत्तरदेश में प्रसिद्ध सुगन्धित द्रव्य है उसके नाम तथा गुण - पर्पटी, रञ्जना, कृष्णा, जनुका, जननी, जनी, जतूकृष्णा, अग्निसंस्पर्शा, जतुकृत् और चक्र- वर्त्तिनी ये सब संस्कृत नाम 'पर्पटी' के हैं। पर्पटी-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, शीतवीर्य, शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली और लघु होती है। यह विष, व्रण, खुजली, कफ, पित्तक और कुष्ठ को दूर करने वाली है ॥ १२७-१२८ ॥ ५३ पर्पटी सुगन्धि पानडी के स्वरूप के बारे में भी पर्याप्त मत भिन्नता है। डा. देसाई ने गु०-सुगन्धी पानडी नाम से एक क्षुप का वर्णन किया है जिसका नीचे वर्णन दिया गया है। सं०-पाची। हि०-पाचोली। बं०-पाटचोली, पाचपट । गु०-सुगन्धीपानडी। म०-पाँच। कोंक-मांली। ले०-Pogostemon patchouli Hook. f. (पोगोस्टेमॉन् पाचौली हुक.)। Fam. Labiatae (लेबिएटौ)। इसका स्वावलम्बी, अनेक शाखायुक्त क्षुप कोंकण में प्रसिद्ध है। यह जंगलों में होता है तथा इसकी उपज भी की जाती है। उपज से इसकी आकृति में परिवर्तन हो जाता है। पत्ते-अंडाकृति, दन्तुर तथा लंबे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-बहुत छोटे तथा तुलसी की तरह गुच्छों में आते हैं। यह क्षुप बहुत सुगन्धित होता है। इसके पत्तों का उपयोग औषध में किया जाता है। रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों में कीड़े न लगें इसलिये उनमें इसके पत्ते रखते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक अत्यन्त सुगन्धि उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह रक्तस्तम्भक, मूत्रजनन तथा वातानुलोमक है। रक्तमूत्र में १ माशा भांग के साथ २ तोला पत्तों का रस देते हैं। मात्रा - ½-१ चम्मच । अथ नलिका। उत्तरापथे प्रसिद्धा सुगन्धा प्रवालाकृतिः 'यवारी' इति च क्वचित्प्रसिद्धा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह नलिका विद्रुमलता कपोतचरणा नटी। धमन्यञ्जनकंशी च निर्मन्थ्या¹ सुषिरा नली ॥१२९॥ नलिका शीतला लघ्वी चक्षुष्या कफपित्तहृत्। कृच्छ्राश्मवाततृष्णाऽस्रकुष्ठकण्डूज्वरापहा ॥ 'नलिका' जो कि उत्तरदेश में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य देखने में मूंगे के समान होती है और जो कि कहीं-कहीं 'यवारी' नाम से भी प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण- नलिका, विद्रुमलता, कपोत- चरणा, नटी, धमनी, अञ्जनकंशी, निर्मन्थ्या, सुषिरा और नली ये सब संस्कृत नाम नलिका के हैं। नलिका-शीतवीर्य, लघु तथा नेत्र के लिये हितकर होती है। यह कफ, पित्त, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, वात, तृषा, रक्तदोष, कुष्ठ, खुजली तथा ज्वर को दूर करती है ॥ १२९-१३० ॥ ५४ नलिका नलिका नामक गन्धद्रव्य भी सन्दिग्ध है। कुछ लोग इसे रतनजोत मानते हैं। रतनजोत भी कुछ हदतक सन्दिग्ध ही है। नालुका नाम से एक सुगन्धित गोल मुड़ी हुई छाल के टुकड़े १. निर्मथ्या इति पाठ० ।
कर्पूरादिवर्गः २६७ या चूर्ण बाजार में बिकता है। यह तज की ही एक जाति है। इसे नलिका कहा जा सकता है कि नहीं, यह कहना कठिन है। नालुका का विशेष उपयोग शोथहर लेप के रूप में बहुत किया जाता है। अथ प्रपौण्डरीकम् । सुगन्धि द्रव्यम् [पुण्डेरी ] इति लोके प्रसिद्धम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह प्रपौण्डरीकं पौण्डर्यं चक्षुष्यं पौण्डरीयकम् । पौण्डर्यं मधुरं तिक्तं कषायं शुक्लं हिमम् । चक्षुष्यं मधुरं पाके वर्ण्यं पित्तकफप्रणुत् ॥ १३१ ॥ 'पुण्डेरी' इस नाम से लोक में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य के नाम तथा गुण- प्रपौण्डरीक, पौण्डर्य, चक्षुष्य और पौण्डरीयक ये सब संस्कृत नाम 'पुण्डेरी' के हैं। पुण्डेरी-मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शुक्रजनक, शीतवीर्य, नेत्र के लिये हितकर, पाक में मधुर और शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला तथा पित्तकफ का नाशक है ॥ १३१ ॥ ५५ पुण्डेरी प्रपौण्डरीक भी एक संदिग्ध द्रव्य है। कुछ लोगों ने पुण्डरीक तथा प्रपौण्डरीक में नाम तथा गुण सादृश्य होने से दोनों को एक मान लिया है लेकिन यह उचित नहीं है। पुण्डरीक श्वेत कमल का नाम है। पुण्डरीक नाम से सुश्रुत (क. अ. २) में कन्दविष का उल्लेख है। 'पुण्डरी- केण रक्तवमक्ष्णोर्वृद्धिस्तथोदरे।' प्रपौण्डरीक का एक नाम 'चक्षुष्य' होने से 'चाकसू' नामक वनस्पति को प्रपौण्डरीक के स्थान पर लिया जा सकता है। डा. देसाई ने चाकसू को 'वन्यकुलत्थ' लिखा है। वन्यकुलत्थ-रक्तपित्तकृत्, शीतल, कफवातहर एवं कषाय रसयुक्त होती है। कुछ लोग यूनानी द्रव्य ममीरा मानते हैं क्योंकि उसका नेत्र रोगों में बहुत व्यवहार होता है। निम्न वर्णन चाकसू का है। सं०-चक्षुष्या, अरण्यकुलत्थिका। हि०-चाक्षुस्, चाकसू। पं०-चक्सू । गु०-चीमेड। काठि०-चमेड। म०-चिनोल, कानकुटी, चिम्न । ता०-करुकानम् । ते०-चनुपाल विट्टलु । कं०-क्रीड, निन्द्रताळ । अ०-जश्मीजज, हब्बुरसूदान । फा०-चश्मीजञ्ज, चशुम । ले०-Cassia absus Linn. (कॅसिआ ऍब्सस् लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह प्रायः सर्वत्र प्राप्त होता है। इसके एक वर्षीय क्षुप ८-१८ इञ्च ऊँचे होते हैं। पत्रनाल बड़ा और पत्रदण्ड पर प्रत्येक पत्रकद्वय के बीच एक रेखाकार ग्रन्थि होती है। पत्रक संख्या में ४, आयताकार, .६-.९ इञ्च लंबे, करीब २ कुण्ठिताग्र और मध्यशिरा के दोनों ओर के उनके दोनों भाग आधार पर असमान होते हैं। पुष्प संयुक्त पीले या लाल जिसमें केवल ४ पुंकेशर होते हैं और जो अग्रय मंजरी में रहते हैं। फली-चिपटी, रोमश तथा १-१½ इञ्च लंबी होती है। बीज-संख्या में पांच, चमकीले, काले भूरे, चिकने, चिपटे, अंडाकृति किन्तु एक सिरा पतला और लंबाई तथा चौड़ाई में १/६ इञ्च होते हैं। बीज का कवच निकाल देने से पीले रंग की तथा कडवी मज्जा निकलती है।
२६८ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके बीजों में २३% राख होती है। उसमें मैंगेनीझ का अंश रहता है । गुण और प्रयोग—यह संग्राहक एवं नेत्राभिष्यंदप्रशमन है। पूययुक्त नेत्राभिष्यंद में भुने हुए बीजों की मज्जा का ३ र० चूर्ण पलकों के अन्दर रखते हैं। बीजों को पानी में साने हुए गेहूँ के आटे में रख, गरम राख में गरम कर, छिलका निकाल कर नेत्ररोगों में प्रयोग किया जाता है। चाकसू के २१ बीज तथा सफेद चंदन ५ माशे रात में जल में भिगो कर सुबह उस जल को छानकर पिलाने से रक्त मूत्र ठीक होता है । इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे तृतीयः कर्पूरादिवर्गः समाप्तः ॥ ३ ॥