भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सूक्ष्म तथा इन्द्रियातीत हैं, उन्हें क्षेत्रज्ञ, पुरुष, हिरण्यगर्भ, महान्, प्रधान तथा बुद्धि आदि अनेक नामोंसे अभिहित किया जाता है। जो तीनों लोकोंके एकमात्र आधार हैं, वे निर्गुण होकर भी अपनी इच्छासे सगुण हो जाते हैं, सबके साक्षी हैं, स्वतः कोई कर्म नहीं करते और न तो कर्मफलकी प्राप्तिसे संलिप्त रहते हैं। वे परमात्मा सब ओर सिर, नेत्र, हाथ, पैर, नासिका, कान तथा मुखवाले हैं, वे समस्त जगत्को आच्छादित करके अवस्थित हैं तथा सभी प्राणियोंमें स्वच्छन्द होकर आनन्दपूर्वक विचरण करते हैं।
शुभाशुभ कर्मरूप बीजवाला शरीर क्षेत्र कहलाता है। इसे जाननेके कारण परमात्मा क्षेत्रज्ञ कहलाते हैं। वे अव्यक्तपुरुषमें शयन करनेसे पुरुष, बहुत रूप धारण करनेसे विश्वरूप और धारण-पोषण करनेके कारण महापुरुष कहे जाते हैं। ये ही अनेक रूप धारण करते हैं। जिस प्रकार एक ही वायु शरीरमें प्राण-अपान आदि अनेक रूप धारण किये हुए हैं
और जैसे एक ही अग्नि अनेक स्थान-भेदोंके कारण अनेक नामोंसे अभिहित की जाती है, उसी प्रकार परमात्मा भी अनेक भेदोंके कारण बहुत रूप धारण करते हैं। जिस प्रकार एक दीपसे हजारों दीप प्रज्वलित हो जाते हैं, उसी प्रकार एक परमात्मासे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है। जब वह अपनी इच्छासे संसारका संहार करता है, तब फिर एकाकी ही रह जाता है। परमात्माको छोड़कर जगत्में कोई स्थावर या जंगम पदार्थ नित्य नहीं है, क्योंकि वे अक्षय, अप्रमेय और सर्वज्ञ कहे जाते हैं। उनसे बढ़कर कोई अन्य नहीं है, वे ही पिता हैं, वे ही प्रजापति हैं, सभी देवता और असुर आदि उन परमात्मा भास्करदेवकी आराधना करते हैं और वे उन्हें सद्गति प्रदान करते हैं। वे सर्वगत होते हुए भी निर्गुण हैं। उसी आत्मस्वरूप परमेश्वरका मैं ध्यान करता हूँ तथा सूर्यरूप अपने आत्माका ही पूजन करता हूँ। हे याज्ञवल्क्य मुने! भगवान् सूर्यने स्वयं ही ये बातें मुझसे कही थीं।
(अध्याय ६६-६७)
सूर्यनारायणके प्रिय पुष्प, सूर्यमन्दिरमें मार्जन-लेपन आदिका फल, दीपदानका फल तथा सिद्धार्थ-ससमी-व्रतका विधान और फल
ब्रह्माजी बोले—याज्ञवल्क्य! एक बार मैंने भगवान् सूर्यनारायणसे उनके प्रिय पुष्पोंके विषयमें जिज्ञासा की। तब उन्होंने कहा था कि मल्लिका (बेला फूलकी एक जाति)-पुष्प मुझे अत्यन्त प्रिय है। जो मुझे इसे अर्पण करता है, वह उत्तम भोगोंको प्राप्त करता है। मुझे श्वेत कमल अर्पण करनेसे सौभाग्य, सुगन्धित कुटज-पुष्पसे अक्षय ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है तथा मन्दार-पुष्पसे सभी प्रकारके कुष्ठ-रोगोंका नाश होता है और बिल्व-पत्रसे पूजन करनेपर विपुल सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है। मन्दार-पुष्पकी मालासे सम्पूर्ण कामनाओंकी
पूर्ति, वकुल (मौलिसिरी)-पुष्पकी मालासे रूपवती कन्याका लाभ, पलाश-पुष्पसे अरिष्ट-शान्ति, अगस्त्य-पुष्पसे पूजन करनेपर (मेरा) सूर्यनारायणका अनुग्रह तथा करवीर (कनौल)-पुष्प समर्पित करनेसे मेरे अनुचर होनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। बेलाके पुष्पोंसे (मेरी) सूर्यकी पूजा करनेपर मेरे लोककी प्राप्ति होती है। एक हजार कमल-पुष्प चढ़ानेपर मेरे (सूर्य) लोकमें निवास करनेका फल प्राप्त होता है। वकुल-पुष्प अर्पित करनेसे भानुलोक प्राप्त होता है। कस्तूरी, चन्दन, कुंकुम तथा कपूरके योगसे बनाये गये यक्षकर्दम गन्धका लेपन करनेसे
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