भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 136
  • ब्राह्मपर्व *

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होनेपर सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। क्योंकि हे देवसेनापते! सबसे पहले संसारके द्वारा पूज्य जो मेरा मुख था, उसी मुखसे संसारका कल्याण करनेके निमित्त सभी इतिहास-पुराणादि ग्रन्थ प्रकट हुए। महामते! मुझे पुराण वेदोंसे भी अधिक प्रिय हैं। जो ब्रह्मभावसे नित्य इन्हें सुनते हैं और वाचकको वृत्ति प्रदान करते हैं, वे परमपदं प्राप्त करते हैं। सुव्रत! धर्म-अर्थ-काम तथा मोक्ष—पुरुषार्थचतुष्टयकी उत्तम व्याख्याके लिये मैंने ये इतिहास-पुराण बनाये हैं। वेदोंका अर्थ अत्यन्त दुर्लभ है। अतएव महामते! इनको जाननेके लिये ही मैंने इतिहास-पुराणोंकी रचना की है। जो मनुष्य प्रतिदिन पुराण-श्रवणका उत्तम कार्य करवाता है, वह सूर्यदेवसे ज्ञान प्राप्तकर परमपदको प्राप्त करता है। वाचकको जो दक्षिणा देता है, वह सूर्यदेवके लोकको प्राप्त करता है। हे सुरश्रेष्ठ! इसमें आश्चर्य क्या है? जैसे देवताओंमें इन्द्र श्रेष्ठ हैं, शस्त्रोंमें वज्र श्रेष्ठ है और जैसे तेजस्वियोंमें अग्नि, नदियोंमें सागर श्रेष्ठ माना गया है, वैसे ही सभी ब्राह्मणोंमें इतिहास-पुराण-वाचक ब्राह्मण श्रेष्ठ है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पुराण-

वाचकका पूजन करता है, उसके उस पुण्यकर्मद्वारा सम्पूर्ण जगत् पूजित हो जाता है।

ब्रह्माजीने पुनः कहा—दिण्डिन्! देवदेवेश्वर भगवान् सूर्यके मन्दिरमें जो मनुष्य धर्मका श्रवण करता है या कराता है, उसके पुण्यसे वह परम गतिको प्राप्त करता है।

जो पुरुष भगवान् सूर्यकी तीन बार प्रदक्षिणा करके भूमिपर मस्तक झुकाकर सूर्यनारायणको प्रणाम करता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है। जो मनुष्य जूता पहनकर मन्दिरमें प्रवेश करता है, वह तामिस्त्र नामक भयंकर नरकमें जाता है। जो सूर्यदेवके स्नानार्थ घृत, दूध, मधु, इक्षुरस अथवा गङ्गादि पवित्र नदियोंका उत्तम जल देते हैं, वे सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्तकर सूर्यमण्डलको प्राप्त करते हैं। अभिषेकके समय जो उनका भक्तिपूर्वक दर्शन करते हैं, उन्हें अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है और अन्तमें वे शिवलोकको जाते हैं। सूर्यभगवान्को ऐसे स्थानपर स्नान कराना चाहिये, जहाँ स्नानका जल आदि किसीसे लाँधा न जा सके। जलका लङ्घन हो जानेपर अशुभ होता है।

(अध्याय १४-१५)

जया-ससमी-व्रतका वर्णन

दिण्डीने कहा—ब्रह्मन्! आपने मुझसे जो सात ससमियोंका वर्णन किया है, उसमें जो पहली ससमी है, उसके विषयमें तो आपने विस्तारपूर्वक वर्णन किया, किंतु शेष छः ससमियोंके विषयमें कुछ नहीं कहा। अतः अन्य सभी ससमियोंका भी आप वर्णन करें, जिनमें उपवास करके मैं सूर्यलोकको प्राप्त कर सकूँ।

ब्रह्माजी बोले—दिण्डिन्! शुक्ल पक्षकी जिस ससमीको हस्त नक्षत्र हो, उसे 'जया' ससमी कहते हैं। उस दिन किया गया दान, हवन, जप,

तर्पण तथा देव-पूजन एवं सूर्यदेवका पूजन सौगुना लाभप्रद होता है। यह ससमी भगवान् भास्करको अत्यन्त प्रिय है। यह पापनाशिनी, श्रेष्ठ यश देनेवाली, पुत्र प्राप्त करानेवाली, अभीष्ट इच्छाओंको पूर्ण करनेवाली और लक्ष्मीको प्राप्त करानेवाली है। प्राचीन कालमें इसी तिथिको भगवान् सूर्यने हस्त नक्षत्रपर संक्रमण किया था, इसलिये इसे शुक्ला ससमी भी कहते हैं। अपने दोनों हाथोंमें कमल धारण किये हुए भगवान् सूर्यकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक

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