भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पूजा करनेके लिये इसी विधिको कहा है। चारों पारणाओंमें क्रमशः भगवान् सूर्यदेवके नाम इस प्रकार हैं—सुधांशु, अर्यमा, सविता और त्रिपुरान्तक। सभी पारणाओंमें क्रमशः 'सुधांशुः प्रीयताम्' इत्यादि कहे। गोमूत्र, पञ्चगव्य, घृत, गरम दूध—ये व्रतके क्रमशः प्राशन-पदार्थ हैं।
जो मनुष्य इस विधिसे इस ससमी-व्रतको करता है, वह युद्धमें शत्रुओंसे पराजित नहीं होता। वह शत्रुको जीतकर धर्म, अर्थ तथा काम—इस त्रिवर्गके फलको भी निःसंदेह प्राप्त कर लेता है। त्रिवर्गको प्राप्त करके वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है।
जो मनुष्य इस प्रकार सदा प्रयत्नपूर्वक ससमी-
व्रतको करता है, वह शत्रुको पराजित करके सूर्यलोकको प्राप्त करता है और श्वेत अश्वाँसे युक्त एवं स्वर्णिम ध्वज-पताकासे समन्वित यानके द्वारा भगवान् वरुणदेवके समीपमें जाकर उनका प्रिय हो जाता है।
ब्रह्माजी बोले —शुक्ल पक्षकी ससमी तिथिमें जब सूर्य संक्रमण करते हैं, तब वह ससमी महाजया कहलाती है, जो भगवान् भास्करको अत्यन्त प्रिय है। इस अवसरपर किये गये स्नान, दान, जप, होम और पितृ-देव-पूजन—ये सब कार्य कोटि-गुना फल देते हैं—ऐसा भगवान् भास्करने स्वयं कहा है। (अध्याय १८-१९)
नन्दा-ससमी तथा भद्रा-ससमी-व्रतका विधान
ब्रह्माजी बोले —हे वीर! मार्गशीर्ष मासमें शुक्ल पक्षकी जो ससमी होती है, वह नन्दा कहलाती है। वह सभीको आनन्दित करनेवाली तथा कल्याणकारिणी है। इस व्रतमें पञ्चमी तिथिको एकभुक्त और षष्ठी तिथिमें नक्तव्रत कर मनीषीलोग ससमी तिथिको उपवास बतलाते हैं। इस व्रतमें विद्वानोंने तीन पारणाओंके करनेका उपदेश किया है। इसके पूजनमें मालतीके पुष्प, सुगन्ध, चन्दन, कर्पूर और अगरसे मिश्रित धूपका प्रयोग करना चाहिये। खाँड़के सहित दही-भातका नैवेद्य भगवान् भास्करको प्रिय है। उसी खाँड़मिश्रित दही-भातका भोजन ब्राह्मणोंको करवाना चाहिये। तत्पश्चात् स्वयं भी उसी भोजनको करना चाहिये। भगवान् भास्करको धूप देनेके लिये
प्रथम पारणामें विधि इस प्रकार है—पलाशके पुष्प, पक्षक१ धूप अथवा यथासामर्थ्य जो भी धूप हो सके, उसी धूपसे पूजा करनी चाहिये।
द्वितीय पारणामें प्रबोध२ धूप, शर्कराखण्डसे मिश्रित पुष्पा नैवेद्य सूर्यनारायणको अर्पित करनेका विधान है। खाँड़मिश्रित भोजनसे ब्राह्मणोंको भोजन भी कराना चाहिये। निम्ब-पत्रका प्राशन करनेके पश्चात् स्वयं भी मौन होकर भोजन करना चाहिये।
तृतीय पारणामें भगवान् भास्करको प्रसन्न करनेके लिये नील या श्वेत कमल और गुग्गुलके धूप तथा पायसका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। प्राशनमें तथा विलेपनमें भी चन्दनके उपयोगकी विधि कही गयी है।
१-कर्पूर चन्दन कुष्ठमगरः सिद्धकं तथा ॥
सग्रन्थ वृषणं भीम कुंकुमं गुञ्जनं तथा। हरीतकी तथा भीम एष पक्षक उच्यते ॥
(ब्राह्मपर्व १००।६-७)
कर्पूर, चन्दन, कुष्ठ (कुटकी), अगर, सिद्धक, ग्रन्थिपर्णी, कस्तूरी, कुंकुम, गुञ्जन तथा हरीतकीके मेलसे पक्षक धूप बनता है।
२-कृष्णागुरुः सितं कंजं बालकं वृषणं तथा ॥
चन्दनं तगरो मुस्ता प्रबोधशर्करान्विता। (ब्राह्मपर्व १००।८-९)
कृष्णागुरु, श्वेत कमल, सुगन्धबाला, कस्तूरी, चन्दन, तगर, नागरमोथा और शर्करा मिलाकर प्रबोध धूप बनता है।
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