भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

सदैव अक्षय रहती है। उसमें साक्षात् सूर्यका निवास रहता है। इस प्रकार तिथियोंका क्षय और वृद्धि स्वयं सूर्यनारायण ही करते हैं। अतः वे सबके स्वामी माने जाते हैं। ध्यानमात्रसे ही सूर्यदेव अक्षय गति प्रदान करते हैं। दूसरे देवता भी जिस प्रकार उपासकोंकी अभीष्ट कामना पूर्ण करते हैं, उसे मैं संक्षेपमें बताता हूँ, आप सुनें—

प्रतिपदा तिथिमें अग्निदेवकी पूजा करके अमृतरूपी घृतका हवन करे तो उस हविसे समस्त धान्य और अपरिमित धनकी प्राप्ति होती है। द्वितीयाको ब्रह्माकी पूजा करके ब्रह्मचारी ब्राह्मणको भोजन करानेसे मनुष्य सभी विद्याओंमें पारङ्गत हो जाता है। तृतीया तिथिमें धनके स्वामी कुबेरका पूजन करनेसे मनुष्य निश्चित ही विपुल धनवान् बन जाता है तथा क्रय-विक्रयादि व्यापारिक व्यवहारमें उसे अत्यधिक लाभ होता है। चतुर्थी तिथिमें भगवान् गणेशका पूजन करना चाहिये। इससे सभी विघ्नोंका नाश हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। पञ्चमी तिथिमें नागोंकी पूजा करनेसे विषका भय नहीं रहता, स्त्री और पुत्र प्राप्त होते हैं और श्रेष्ठ लक्ष्मी भी प्राप्त होती है। षष्ठी तिथिमें कार्तिकेयकी पूजा करनेसे मनुष्य श्रेष्ठ मेधावी, रूपसम्पन्न, दीर्घायु और कीर्तिको बढ़ानेवाला हो जाता है। सप्तमी तिथिको चित्रभानु नामवाले भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करना चाहिये, ये सबके स्वामी एवं रक्षक हैं। अष्टमी तिथिको वृषभसे सुशोभित भगवान् सदाशिवकी पूजा करनी चाहिये, वे प्रचुर ज्ञान तथा अत्यधिक कान्ति प्रदान करते हैं। भगवान् शङ्कर मृत्युहरण करनेवाले, ज्ञान देनेवाले और बन्धनमुक्त करनेवाले हैं। नवमी तिथिमें दुर्गाकी पूजा करके मनुष्य इच्छापूर्वक संसार-सागरको पार कर लेता है तथा संग्राम और लोकव्यवहारमें वह सदा विजय प्राप्त

करता है। दशमी तिथिको यमकी पूजा करनी चाहिये, वे निश्चित ही सभी रोगोंको नष्ट करनेवाले और नरक तथा मृत्युसे मानवका उद्धार करनेवाले हैं। एकादशी तिथिको विश्वेदेवोंकी भली प्रकारसे पूजा करनी चाहिये। वे भक्तको संतान, धन-धान्य और पृथ्वी प्रदान करते हैं। द्वादशी तिथिको भगवान् विष्णुकी पूजा करके मनुष्य सदा विजयी होकर समस्त लोकमें वैसे ही पूज्य हो जाता है, जैसे किरणमाली भगवान् सूर्य पूज्य हैं। त्रयोदशीमें कामदेवकी पूजा करनेसे मनुष्य उत्तम रूपवान् हो जाता है और मनोवाञ्छित रूपवती भार्या प्राप्त करता है तथा उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। चतुर्दशी तिथिमें भगवान् देवदेवेश्वर सदाशिवकी पूजा करके मनुष्य समस्त ऐश्वर्यसे समन्वित हो जाता है तथा बहुत-से पुत्रों एवं प्रभूत धनसे सम्पन्न हो जाता है। पौर्णमासी तिथिमें जो भक्तिमान् मनुष्य चन्द्रमाकी पूजा करता है, उसका सम्पूर्ण संसारपर अपना आधिपत्य हो जाता है और वह कभी नष्ट नहीं होता। दिण्डिन् ! अपने दिनमें अर्थात् अमावास्यामें पितृगण पूजित होनेपर सदैव प्रसन्न होकर प्रजावृद्धि, धन-रक्षा, आयु तथा बल-शक्ति प्रदान करते हैं। उपवासके बिना भी ये पितृगण उक्त फलको देनेवाले होते हैं। अतः मानवको चाहिये कि पितरोंको भक्तिपूर्वक पूजाके द्वारा सदा प्रसन्न रखे। मूलमन्त्र, नाम-संकीर्तन और अंश मन्त्रोंसे कमलके मध्यमें स्थित तिथियोंके स्वामी देवताओंकी विविध उपचारोंसे भक्तिपूर्वक यथाविधि पूजा करनी चाहिये तथा जप-होमादि कार्य सम्पन्न करने चाहिये। इसके प्रभावसे मानव इस लोकमें और परलोकमें सदा सुखी रहता है। उन-उन देवोंके लोकोंको प्राप्त करता है और मनुष्य उस देवताके अनुरूप हो जाता है। उसके सारे अरिष्ट

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