भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
तथा वहाँ शाश्वती शान्तिको प्राप्त करता है। वहाँसे पुनः पृथ्वीपर जन्म लेकर उन गोपति सूर्यभगवान्की ही कृपासे प्रतापी राजा होता है।
इसी प्रकार उत्तरायणके सूर्यमें शुक्ल पक्षमें भग,
अर्यमा, सूर्य आदिके नक्षत्रोंके पड़नेपर दान-मानसे भगवान् सूर्यकी पूजा कर उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। इससे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इसे पापनाशिनी सप्तमी कहा जाता है। (अध्याय १०५-१०६)
सूर्यपदद्वय-व्रत, सर्वासि-सप्तमी एवं मार्तण्ड-सप्तमीकी विधि
ब्रह्माजी बोले— धर्मज्ञ! अब मैं जगद्गता देवदेवेश्वर भगवान् सूर्यनारायणके पदद्वय-माहात्म्यका वर्णन करता हूँ, इसे आप सुनें।
अंशुमाली सूर्यदेवने संसारके कल्याणकी कामनासे अपने दोनों पादोंको एक पादपीठपर रखा है। उनके वामपादको उत्तरायण और दक्षिणपादको दक्षिणायनके रूपमें जानना चाहिये। सभी इन्द्र आदि देवगण इनके चरणोंकी वन्दना करते रहते हैं। हम और आप सूर्यदेवके दक्षिणपादकी अर्चना करते हैं। विष्णु तथा शङ्कर श्रद्धापूर्वक उनके वामपादकी पूजा करते हैं। जो मानव प्रत्येक सप्तमीको भगवान् सूर्यदेवकी विधिवत् आराधना करता है, उसपर वे सदा संतुष्ट रहते हैं।
भगवान् विष्णुने पूछा— गोलोकस्वामी सूर्य-नारायणकी आराधना किस प्रकार की जाती है? उसका आप वर्णन करें।
ब्रह्माजी बोले— उत्तरायण प्रारम्भ होनेके दिन स्नान करके संयमित मनसे घृत-दुग्ध आदि पदार्थोंके द्वारा भगवान् सूर्यको स्नान कराना चाहिये। सुन्दर वस्त्रोपहार, पुष्प-धूप तथा अनुलेपनादिसे उनकी विधिवत् पूजा कर ब्राह्मणोंको भोजन और दक्षिणादिसे संतुष्ट करना चाहिये। उसके बाद सूर्यभक्ति-परायण व्यक्तिको उनके पदद्वय-व्रतका विधान ग्रहण करना चाहिये। तदनन्तर स्नान करके 'चित्रभानु' दिवाकरकी वन्दना करनी चाहिये। खाते-चलते, सोते-जागते, प्रणाम करते, हवन और पूजन करते समय भगवान् चित्रभानुका ही
जप करते हुए प्रतिदिन उनके नाम-कीर्तनका ही तबतक जप करना चाहिये, जबतक दक्षिणायनका समय न आ जाय। उनकी प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिये—
परमात्ममयं ब्रह्म चित्रभानुमयं परम्। यमन्ते संस्मरिष्यामि स मे भानुः परा गतिः॥
(ब्राह्मपर्व १०७।१७)
'चित्रभानु परमात्ममय परम ब्रह्म हैं, जिनका अन्तकालमें मैं भलीभाँति स्मरण करूँगा, क्योंकि वे ही सूर्यनारायण मेरी परम गति हैं।'
इस प्रकार स्तुति करके षण्मासिक भगवान् सूर्यके व्रतको तबतक करना चाहिये, जबतक दक्षिणायन पूर्णरूपसे न आ जाय। उसके पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर भगवान् मार्तण्डके सामने पुण्य-कथा और आख्यानका पाठ करना चाहिये। भक्तिपूर्वक यथाशक्ति वाचक और लेखकका पूजन भी करना चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य यह व्रत करता है, उसको इसी जन्ममें सभी पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। यदि इस छः मासके बीचमें ही व्रतीकी मृत्यु हो जाती है तो उसे पूर्ण उपवासका फल प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त उसे भगवान् सूर्यनारायणके चरणद्वय-पूजनका फल भी मिलता है।
ब्रह्माजी पुनः बोले— माघ मासके कृष्ण पक्षकी सप्तमीको सर्वासि-सप्तमी कहते हैं। इस व्रतसे सभी अभीप्सित कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस व्रतमें पाखण्डी आदि दुराचारियोंसे वार्तालाप
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