भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

१३८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। जो मनुष्य पवित्र होकर व्रत करके सूर्यनारायणकी आराधना करता है, वह भगवान् वनमाली सूर्यदेवके परम दिव्यलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ११०-१११)

सूर्यपूजामें भाव-शुद्धिकी आवश्यकता एवं त्रिप्राप्ति-ससमी-व्रत

ब्रह्माजी बोले—गरुडध्वज! भक्तिपूर्वक शुद्ध हृदयसे मात्र जलार्पणद्वारा भी सूर्यभगवान्की पूजा करनेपर दुर्लभ फलकी प्राप्ति हो जाती है। राग-द्वेषादिसे रहित हृदय, असत्य आदिसे अदूषित वाणी और हिंसावर्जित कर्म—ये भगवान् भास्करकी आराधनाके श्रेष्ठ तीन प्रकार हैं। रागादि दोषोंसे दूषित हृदयमें तिमिरविनाशक सूर्यनारायणकी रश्मियोंका स्पन्दन भी नहीं होता, फिर उनके निवासकी बात कौन कहे? यहाँतक कि वह तो भगवान् सूर्यके द्वारा संसारपङ्कमें निमग्न कर दिया जाता है।

जिस प्रकार चन्द्रमाकी कला अन्धकारको दूर करनेमें सर्वथा सफल नहीं होती, उसी प्रकार हिंसादिसे दूषित कर्मके द्वारा सूर्यनारायणकी पूजामें कैसे सफलता प्राप्त हो सकती है? चित्तकी अप्रसन्नताके कारण भी मनुष्य सूर्यदेवको प्राप्त नहीं कर सकता है। इसलिये सत्य-स्वभाव, सत्य-वाक्य और अहिंसक कर्मसे ही स्वभावतः भगवान् आदित्य प्रसन्न होते हैं। यदि मनुष्य कलुषित-हृदयसे भगवान् देवशको सब कुछ दे दे, तो तब भी उन देवदेवेश्वर भगवान् दिवाकरकी आराधना नहीं होती। अतः आप अपने हृदयको रागादि द्वेषोंसे रहित बनाकर भगवान् भास्करके लिये अर्पित करें। ऐसा करनेपर दुष्प्राप्य भगवान् भास्करको आप अनायास ही प्राप्त कर लेंगे।

विष्णुने कहा—आपने बताया कि भास्कर

हमारे लिये पूजनीय हैं, अतः उनकी सम्पूर्ण आराधना-विधि आप मुझे बतायें। ब्रह्मन्! श्रेष्ठ कुलमें जन्म, आरोग्य और दुर्लभ धनकी अभिवृद्धि—ये तीनों जिसके द्वारा प्राप्त होते हैं, उस त्रिप्राप्ति-व्रतको भी हमें बतायें।

ब्रह्माजी बोले—माघ मासमें कृष्ण पक्षकी ससमीके दिन हस्त नक्षत्रका योग रहनेपर व्रतीको चाहिये कि वह जगत्स्रष्टा सूर्यदेवकी सुगन्ध, धूप, नैवेद्य एवं उपहार आदि पूजन-सामग्रियोंके द्वारा पूजा करे। गृहस्थ पुरुष पुष्पोंके द्वारा दानादि-युक्त पूजा वर्षपर्यन्त सम्पन्न करे और वस्त्र (बाजरा), तिल, व्रीहि, यव, सुवर्ण, यव, अन्न, जल, ओला (ओलेका पानी), उपानह, छत्र और गुड़से बने पदार्थ, (क्रमसे प्रतिमास) मुनियों, ब्राह्मणोंको दान देना चाहिये। इस व्रतमें आत्मशुद्धिके लिये सूर्यनारायणकी पूजा करके प्रतिमास क्रमशः शाक, गोमूत्र, जल, घृत, दूर्वा, दधि, धान्य, तिल, यव, सूर्यकिरणोंसे तपा हुआ जल, कमलगढ़ा और दूधका प्राशन करना चाहिये। इस विधिसे इस ससमी-व्रतको करनेवाला मनुष्य धन-धान्यसे परिपूर्ण, लक्ष्मीयुक्त तथा समस्त दुःखोंसे रहित होता है और श्रेष्ठ कुलमें जन्म लेकर जितेन्द्रिय, नीरोग, बुद्धिमान् और सुखी रहता है। अतः आप भी बिना प्रमाद किये ही इन प्रभासम्पन्न स्वामी भगवान् दिवाकरकी आराधना कर कामनाओंके सम्पूर्ण फलको प्राप्त करें। (अध्याय ११२)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth