भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नष्ट हो जाते हैं। सूर्यको दूधसे स्नान करानेवाला मनुष्य सात जन्मोंतक सुखी, रोगरहित और रूपवान् होता है और अन्तमें दिव्यलोकमें निवास करता है। जैसे दूध स्वच्छ होता है और रोगादिसे मुक्ति देनेवाला है, वैसे ही दूधसे स्नान करानेपर अज्ञान हटकर निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है। दूधके स्नानसे

भगवान् सूर्यनारायण प्रसन्न होकर सभी ग्रहोंको अनुकूल करते हैं तथा सभी लोगोंको पुष्टि और प्रीति प्रदान करते हैं। घी और दूधसे तिमिर-विनाशक देवेश सूर्यदेवको स्नान करानेपर उनकी दृष्टिमात्र पड़ते ही मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है। (अध्याय ११३-११४)

कौसल्या और गौतमीके संवादरूपमें भगवान् सूर्यका माहात्म्य-निरूपण तथा भगवान् सूर्यके प्रिय पत्र-पुष्पादिका वर्णन

ब्रह्माजी बोले—जनार्दन! देवलोकमें गौतमी और कौसल्याका सूर्यके विषयमें एक पुरातन संवाद प्रसिद्ध है। एक बार गौतमी ब्राह्मणीने स्वर्गमें अपने पतिके साथ अतिशय रमणीय कौसल्याको देखकर आश्चर्यचकित होकर पूछा—‘कौसल्ये! स्वर्गमें निवास करनेवाले सैकड़ों देवता, अनेक देवाङ्गनाएँ हैं, इसी प्रकार सिद्धगण और उनकी पत्नियाँ आदि भी हैं, किंतु उनमें न ऐसी गन्ध है, न ऐसी कान्ति है, न ऐसा रूप है। धारण किये हुए वस्त्र तथा आभूषण भी ऐसे नहीं सुशोभित हो रहे हैं, जैसे कि आप दोनों स्त्री-पुरुषोंके हो रहे हैं। आप दोनोंने कौन-सा ऐसा तप, दान अथवा होमकर्म किया है, जिसका यह फल है। आप इसका वर्णन करें।’

कौसल्या बोली—गौतमी! हम दोनोंने यज्ञेश्वर भगवान् सूर्यकी श्रद्धापूर्वक आराधना की है। सुगन्धित तीर्थ-जलोंसे तथा घृतसे उन्हें स्नान कराया है। उन्हींकी कृपासे हमने स्वर्ग, निर्मल कान्ति, प्रसन्नता, सौम्यता और सुख प्राप्त किया है। हमलोगोंके पास जो भी आभूषण, वस्त्र, रत्न आदि प्रिय वस्तुएँ हैं, उन्हें भगवान् सूर्यको अर्पण करनेके बाद ही हम धारण करते हैं। स्वर्गप्राप्तिकी अभिलाषासे हम दोनोंने भगवान् सूर्यकी आराधना की थी

और उस आराधनाके फलस्वरूप ही हमलोग स्वर्गका सुख भोग रहे हैं। जो निष्कामभावसे भलीभाँति सूर्यकी उपासना करता है, उसे भगवान् सूर्य मुक्ति प्रदान करते हैं। त्रिलोकके सृष्टिकर्ता सविताकी तृप्तिसे ही सब कुछ प्राप्त होता है।

ब्रह्माजी बोले—विष्णो! मार्तण्ड भगवान् सूर्यकी आराधनासे मैंने भी अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त किया है, जो अनन्तकालतक रहनेवाली हैं। चन्दन, अगुरु, कपूर, कुंकुम तथा उशीरसे जो भगवान् सूर्यको अनुलिप्त करता है, प्रसन्न होकर भगवान् सूर्य उसे लक्ष्मी प्रदान करते हैं। कालेयक (काला चन्दन), तुरुष्क (एक गन्ध-द्रव्य), रक्त चन्दन, गन्ध, विजयधूप तथा और भी जो अपनेको इष्ट पदार्थ हों, उन्हें भगवान् सूर्यको निवेदित करना चाहिये। मालती, मल्लिका, जूही, अतिमुक्तक, पाटला, करवीर, जपा, कुंकुम, तगर, कर्णिका, चम्पक, केतक (केवड़ा), कुन्द, अशोक, तिलक, लोध, कमल, अगस्ति, पलाश आदिके पुष्प भगवान् सूर्यदेवको विशेष प्रिय हैं। बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृङ्गराजपत्र, तमालपत्र आदि भगवान् सूर्यको प्रिय हैं। अतः उन्हें अर्पण करना चाहिये। कृष्णा तुलसी, केतकीके पुष्प और पत्र तथा रक्त चन्दनके अर्पण करनेसे भगवान् सूर्य

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