भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कभी भी बुद्धि नहीं लगानी चाहिये। यदि कोई अज्ञानसे पापकर्म हो जाय तो सूर्यभगवान्की आराधना करे, जिससे सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

ब्रह्माजी बोले —यमदूतके ऐसे वचनोंको सुनकर तथा भूखसे व्याकुल, प्याससे सूखे कण्ठवाले, दुःखसे पीड़ित वे नारकीय जीव उससे कहने लगे—‘साधो! हमने ऐसा कौन-सा कर्म किया, जिससे हमें इस दारुण नरकमें वास करना पड़ा।’

यमदूतने कहा —पूर्वजन्ममें यौवनके उन्मादसे उन्मादित तुम अविवेकियोंने घृतके लोभमें भगवान् सूर्यके मन्दिरसे दीप चुराया था। उसी कारण इस

घोर नरकमें तुम सब दुःख भोग रहे हो।

ब्रह्माजी बोले —अच्युत! मैंने सूर्यके मन्दिरमें दीपदान करनेके पुण्य तथा दीप-हरण करनेके दुष्परिणामोंका वर्णन किया। दीपदान करनेका तो सर्वत्र ही उत्तम फल है, परंतु सूर्यनारायणके मन्दिरमें विशेष फल है। जगत्में जो-जो अन्धा, मूक, बधिर, विवेकहीन, निन्द्य व्यक्ति दिखायी पड़ते हैं, उन सबने साधुजनोंद्वारा प्रज्वलित किये हुए दीपोंको सूर्यनारायणके मन्दिरसे हरण किया है।

(अध्याय ११९)

वैवस्वतके लक्षण और सूर्यनारायणकी महिमा

विष्णुभगवान्ने ब्रह्माजीसे पूछा—ब्रह्मन्! संसारमें मनुष्य विष, रोग, ग्रह और अनेक प्रकारके उपद्रवोंसे पीड़ित रहते हैं, यह किन कर्मोंका फल है, कृपाकर आप कोई ऐसा उपाय बतायें, जिससे जीवोंको रोग आदिकी बाधा न हो।

ब्रह्माजीने कहा —जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रत-उपवास आदिके द्वारा भगवान् सूर्यको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य विष, ज्वर, ग्रह, रोग आदिके भागी होते हैं और जो सूर्यनारायणकी आराधना करते हैं, उन्हें आधि-व्याधियाँ नहीं सतातीं। पूर्वजन्ममें भगवान् सूर्यकी आराधनासे इस जन्ममें आरोग्य, परम बुद्धि और जो-जो भी मनमें इच्छा

करता है, निःसंदेह उसे प्राप्त कर लेता है। आधि-व्याधियोंसे पीड़ित नहीं होता है और न विष एवं दुष्ट ग्रहोंके बन्धनमें ही फँसता है तथा कृत्या आदिका भी भय उसे नहीं रहता। सूर्यनारायणके भक्तके लिये दुष्ट भी अनुकूल हो जाते हैं और सब ग्रह सौम्य दृष्टि रखते हैं। जिसपर सूर्यदेव संतुष्ट हो जाते हैं, वह देवताओंका भी पूज्य हो जाता है। परंतु भगवान् सूर्यका अनुग्रह उसी पुरुषपर होता है, जो सब जीवोंको अपने समान ही समझता है और भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करता है। प्रजाओंके स्वामी भगवान् सूर्यके प्रसन्न हो जानेपर मनुष्य पूर्णमनोरथ हो जाता है*।

एवमाकृष्टचित्तानां विषयैः स्वादुत्पणैः। नृणां न जायते बुद्धिः परमार्थविलोकिनी ॥

तथा च विषयासङ्गे करोत्यविरतं मनः। को हि भारो रवेनाग्निं जिह्वायाः परिकीर्तने ॥

वर्तितैलेऽल्पमूल्ये च यद्वर्तिलभ्यते सुधा। अतो वै कतरो लाभः कातश्चिन्ता भवेत् तदा ॥ (ब्राह्मपर्व ११९।१०—१३)

  • व्रतोपवासैर्भीनुर्नान्यजन्मनि तोषितः। ते नरा देवशार्दूल ग्रहरोगादिभागिनः ॥

यैर्न तत्रवर्णं चित्तं सर्वदैव नरैः कृतम्। विषग्रहज्वरानां ते मनुष्याः कृष्ण भागिनः ॥

आरोग्यं परमां बुद्धिं मनसा यद्यदिच्छति। तत्तदाप्रीत्यसदिरग्धं परत्रादित्यतोषणात् ॥

नाधीन् प्राप्नोति न व्याधीन् न विषग्रहबन्धनम्। कृत्यास्पर्शभ्यं वापि तोषिते तिमिरापहे ॥

सर्वं दुष्टाः समास्तस्य सौम्यास्तस्य सदा ग्रहाः। देवानामपि पूज्योऽसी तुष्टो यस्य दिवाकरः ॥

यः समः सर्वभूतेषु यथात्मनि तथा हिते। उपवासदिना येन तोष्यते तिमिरापहः ॥

तोषितेऽस्मिन् प्रजानाथे नराः पूर्णमनोरथाः। अरोगाः सुखिनो नित्यं बहुधर्मसुखान्विताः ॥

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