भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० * संक्षिप्त भविष्यपुराण * भगवान् सूर्यनारायणके सौम्य रूपकी कथा, उनकी स्तुति और परिवार तथा देवताओंका वर्णन राजा शतानीकने कहा—मुने! भगवान् सूर्यकी | वायुरिन्द्रश्च सोमश्च विवस्वान् वरुणस्तथा॥ कथा सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती, अतः आप | त्वं कालः सृष्टिकर्ता च हर्ता त्राता प्रभुस्तथा। पुनः उन्हींके गुणों और चरित्रोंका वर्णन करें। | सरितः सागराः शैला विद्युदिन्द्रधनूंषि च। सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने | प्रलयः प्रभवश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः॥ भगवान् सूर्यकी जो पवित्र कथा ऋषियोंको सुनायी | ईश्वरात्परतो विद्या विद्यायाः परतः शिवः। थी, उसे मैं आपको सुनाता हूँ। वह कथा पापोंको | शिवात्परतरो देवस्त्वमेव परमेश्वर॥ नष्ट करनेवाली है— | सर्वतः पाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः। एक समय भगवान् सूर्यके प्रचण्ड तेजसे संतप्त | सहस्त्रांशुस्त्वं तु देव सहस्रकिरणस्तथा॥ हो ऋषियोंने ब्रह्माजीसे पूछा—'ब्रह्मन्! आकाशमें | भूरादिर्भूर्भुवःस्वश्च महर्जनस्तपस्तथा। स्थित यह अग्निके तुल्य दाह करनेवाला तेजःपुञ्ज | प्रदीप्तं दीप्तिमन्नित्यं सर्वलोकप्रकाशकम्। कौन है?' | दुर्निरीक्ष्यं सुरेन्द्राणां यद्रूपं तस्य ते नमः॥ ब्रह्माजी बोले—मुनीश्वरो! प्रलयके समय जब | सुरसिद्धगणैर्जुष्टं भृग्वत्रिपुल्हादिभिः। सारा स्थावर-जङ्गम जगत् नष्ट हो गया, उस | शुभं परममव्यग्रं यद्रूपं तस्य ते नमः॥ समय सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार व्याप्त था। | पञ्चातीतस्थितं तद्वै दशैकादश एव च। उस समय सर्वप्रथम बुद्धि उत्पन्न हुई, बुद्धिसे | अर्धमासमतिक्रम्य स्थितं तत्सूर्यमण्डले। अहंकार तथा अहंकारसे आकाशादि पञ्चमहाभूतोंकी | तस्मै रूपाय ते देव प्रणताः सर्वदेवताः॥ उत्पत्ति हुई और उनसे एक अण्ड उत्पन्न हुआ, | विश्वकृद्विश्वभूतं च विश्वानरसुरार्चितम्। जिसमें सात लोक और सात समुद्रोंसहित पृथ्वी | विश्वस्थितमचिन्त्यं च यद्रूपं तस्य ते नमः॥ स्थित है। उसी अण्डमें स्वयं ब्रह्मा तथा विष्णु | परं यज्ञात्परं देवात्परं लोकात्परं दिवः। और शिव भी स्थित थे। अन्धकारसे सभी व्याकुल | दुरतिक्रमेति यः ख्यातस्तस्मादपि परम्परात्। थे। अनन्तर सब परमेश्वरका ध्यान करने लगे। | परमात्मेति विख्यातं यद्रूपं तस्य ते नमः॥ ध्यान करनेसे अन्धकारको हरण करनेवाला एक | अविज्ञेयमचिन्त्यं च अध्यात्मगतमव्ययम्। तेजःपुञ्ज प्रकट हुआ। उसे देखकर हम सभी | अनादिनिधनं देवं यद्रूपं तस्य ते नमः॥ उसकी इस प्रकार दिव्य स्तुति करने लगे— | नमो नमः कारणकारणाय नमो नमः पापविनाशनाय। आदिदेवोऽसि देवानामीश्वराणां त्वमीश्वरः। | नमो नमो वन्दितवन्दनाय नमो नमो रोगविनाशनाय॥ आदिकर्तासि भूतानां देवदेव सनातन॥ | नमो नमः सर्ववरप्रदाय नमो नमः सर्वबलप्रदाय। जीवनं सर्वसत्त्वानां देवगन्धर्वरक्षसाम्। | नमो नमो ज्ञाननिधे सदैव नमो नमः पञ्चदशात्मकाय * ॥ मुनिकिन्नरसिद्धानां तथैवोरगपक्षिणाम्॥ | (ब्राह्मपर्व १२३। ११-२४) त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः। | इस प्रकार हमारी स्तुतिसे प्रसन्न हो वे तैजस-
- स्तुतिका भाव इस प्रकार है— हे सनातन देवदेव! आप ही समस्त चराचर प्राणियोंके आदि स्रष्टा एवं ईश्वरोंके ईश्वर तथा आदिदेव हैं। देवता, गन्धर्व, राक्षस, मुनि, In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth