भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मन्त्र और धर्मसे समन्वित अपने सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ यह सूर्यरथ-व्रत समस्त कामनाओं तथा अर्थकी सिद्धि करनेवाला है। सभी व्रतोंके पुण्य और सभी यज्ञोंके फल इसी व्रतके करनेसे प्राप्त हो
जाते हैं। जो भगवान् सूर्यके निमित्त एक सवत्सा गौ दान करता है, वह सप्तद्वीपवती वसुन्धराके दानका फल प्राप्त करता है।
(अध्याय १६१-१७०)
सौर-धर्ममें सदाचरणका वर्णन
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अब मैं सौरधर्मसे सम्बद्ध सदाचारोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। सूर्य-उपासकको भूखे-प्यासे, दीन-दुःखी, थके हुए, मलिन तथा रोगी व्यक्तिका अपनी शक्तिके अनुसार पालन और रक्षण करना चाहिये, इससे सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। पतित, नीच तथा चाण्डाल और पक्षी आदि सभी प्राणियोंको अपनी शक्तिके अनुसार दी गयी थोड़ी भी वस्तु करुणाके कारण दिये जानेसे अक्षय-फल प्रदान करती है, अतः सभी प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। जो मधुर वाणी बोलता है, उसे इस लोक तथा परलोकमें सभी सुख प्राप्त होते हैं। अमृत प्रवाहित करनेवाली प्रिय वाणी चन्दनके स्पर्शके समान शीतल होती है। धर्मसे युक्त वाणी बोलनेवालेको अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है। प्रिय वाणी स्वर्गका अचल सोपान है, इसकी तुलनामें दान, पूजन, अध्यापन आदि सब व्यर्थ हैं। अतिथिके आनेपर सादर उससे कुशल-प्रश्न करना चाहिये और यात्राके समय 'आपका मार्ग मङ्गलमय हो, आपको सभी कार्यके साधक सुख नित्य प्राप्त हों'—ऐसा कहना चाहिये। सभी समय ऐसे आशीर्वादात्मक वचन बोलने चाहिये। नमस्कारात्मक वाक्यमें 'स्वस्ति', मङ्गल-वचन
तथा सभी कर्मोंमें 'आपका नित्य कल्याण हो', ऐसा कहना चाहिये। इस प्रकारके आचरणोंका अनुष्ठान करके व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। मनुष्योंको जैसी भक्ति भगवान् सूर्यमें हो वैसी ही भक्ति सूर्यभक्तोंके प्रति भी रखनी चाहिये। किसीके द्वारा आक्रोश करने या ताड़ित होनेपर जो न आक्रोश करता है, न ताड़न करता है, वाणीमें अधिकार होनेके कारण ऐसा क्षमाशील एवं शान्त व्यक्ति सदा दुःखसे रहित होता है। सभी तीर्थोंमें क्षमा सबसे श्रेष्ठ है, इसलिये सभी क्रियाओंमें क्षमा धारण करना चाहिये। ज्ञान, योग, तप एवं यज्ञ-दानादि सत्क्रियाएँ क्रोधी व्यक्तिके लिये व्यर्थ हो जाती हैं, इसलिये क्रोधका परित्याग कर देना चाहिये। अप्रिय वाणी मर्म, अस्थि, प्राण तथा हृदयको जलानेवाली होती है, इसलिये अप्रिय वाणीका कभी प्रयोग नहीं करना चाहिये। क्षमा, दान, तेजस्विता, सत्य, शम, अहिंसा—ये सब भगवान् सूर्यकी कृपासे ही प्राप्त होते हैं।
सुमन्तु मुनि पुनः बोले—महाराज! अब आप आदित्यसम्मत सौर-धर्मको पुनः सुनें। यह सौर-धर्म पापनाशक, भगवान् सूर्यको प्रिय तथा परम पवित्र है। यदि मार्गमें कहीं रविकी पूजा-अर्चा
१-न हीदृक् स्वर्ग्यानाय यथा लोके प्रियं वचः । इहामुत्र सुखं तेषां वाग्येषां मधुरा भवेत् ॥
अमृतस्वन्दिनीं वाचं चन्दनस्पर्शशीतलाम् । धर्माविरोधिनीमुक्त्वा सुखमक्षय्यमायुयात् ॥ (ब्राह्मपर्व १७१ । ३८-३९)
२-सर्वेषामेव तीर्थानां क्षान्तिः परमपूजिता । तस्मात्पूर्वं प्रयनेन क्षान्तिः कार्या क्रियासु वै ॥
ज्ञानयोगतपो यस्य यज्ञदानानि सत्क्रिया । क्रोधनस्य वृथा यस्मात् तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत् ॥ (ब्राह्मपर्व १७१ । ४७-४८)
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