भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
देखकर नामकरण-संस्कार करना चाहिये। शास्त्रानुसार छठे मासमें अन्नप्राशन करना चाहिये। सभी द्विजाति बालकोंका चूड़ाकरण-संस्कार एक वर्ष अथवा तीसरे वर्षमें करना चाहिये। ब्राह्मण-बालकका आठवें वर्षमें, क्षत्रियका ग्यारहवें और वैश्यका बारहवें वर्षमें यज्ञोपवीत-संस्कार करना उत्तम होता है। गुरुसे गायत्रीकी दीक्षा ग्रहण कर वेदाध्ययन करना चाहिये। विद्याध्ययनके पश्चात् गुरुकी आज्ञा प्राप्तकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहिये और गुरुको यथेष्ट सुवर्णादि देकर प्रसन्न करना चाहिये। गृहस्थाश्रममें प्रवेश कर अपने समान वर्णवाली उत्तम गुणोंसे युक्त कन्यासे विवाह करना चाहिये। जो कन्या माता-पिताके कुलसे सात पीढ़ीतककी न हो और समान गोत्रकी न हो ऐसी अपने वर्णकी कन्यासे विवाह
करना चाहिये।
विवाह आठ प्रकारके होते हैं—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच। वर और कन्याके गुण-दोषको भलीभाँति परखनेके बाद ही विवाह करना चाहिये। कन्याएँ अवस्था-भेदसे चार प्रकारकी होती हैं। जिनके नाम इस प्रकार हैं—गौरी, नग्निका, देवकन्या तथा रोहिणी। सात वर्षकी कन्या गौरी, दस वर्षकी नग्निका, बारह वर्षकी देवकन्या तथा इससे अधिक आयुकी कन्या रोहिणी (रजस्वला) कहलाती है। निन्दित कन्याओंसे विवाह नहीं करना चाहिये। द्विजातियोंको अग्निके साक्ष्यमें विवाह करना चाहिये। स्त्री-पुरुषके परस्पर मधुर एवं दृढ़ सम्बन्धोंसे धर्म, अर्थ और कामकी उत्पत्ति होती है और वही मोक्षका कारण भी है। (अध्याय १८१-१८२)
श्राद्धके विविध भेद तथा वैश्वदेव-कर्मकी महिमा
भगवान् सूर्यने अनूठ (अरुण)-से कहा—अरुण! द्विजमात्रको विधिपूर्वक पञ्चमहायज्ञ—भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, दैवयज्ञ और मनुष्ययज्ञ करना चाहिये। बलिवैश्वदेव करना भूतयज्ञ, तर्पण करना पितृयज्ञ, वेदका अध्ययन और अध्यापन करना ब्रह्मयज्ञ, हवन करना देवयज्ञ तथा घरपर आये हुए अतिथिको सत्कारपूर्वक भोजन आदिसे संतुष्ट करना मनुष्ययज्ञ कहा जाता है।
श्राद्ध बारह प्रकारके होते हैं—नित्य-श्राद्ध, नैमित्तिक-श्राद्ध, काम्य-श्राद्ध, वृद्धि-श्राद्ध, सपिण्डन-श्राद्ध, पार्वण-श्राद्ध, गोष्ठ-श्राद्ध, शुद्धि-श्राद्ध, कर्माङ्ग-श्राद्ध, दैविक श्राद्ध, औपचारिक श्राद्ध तथा सांवत्सरिक श्राद्ध। तिल, व्रीहि (धान्य), जल, दूध, फल, मूल, शाक आदिसे पितरोंकी संतुष्टिके लिये प्रतिदिन श्राद्ध करना चाहिये। जो श्राद्ध प्रतिदिन किया जाता है, वह नित्य-श्राद्ध है। एकोद्वि श्राद्धको नैमित्तिक-
श्राद्ध कहते हैं। इस श्राद्धको विधिपूर्वक सम्पन्न कर अयुग्म (विषम संख्या) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। जो श्राद्ध कामनापरक किया जाता है, वह काम्य-श्राद्ध है। इसे पार्वण-श्राद्धकी विधिसे करना चाहिये। वृद्धिके लिये जो श्राद्ध किया जाता है, उसे वृद्धि-श्राद्ध कहते हैं। ये सभी श्राद्धकर्म पूर्वाह्न-कालमें उपवीती होकर करने चाहिये। सपिण्डन-श्राद्धमें चार पात्र बनाने चाहिये। उनमें गन्ध, जल और तिल छोड़ना चाहिये। प्रेत-पात्रका जल पितृ-पात्रमें छोड़े। इसके लिये 'ये समानाः०' (यजु० १९।४५-४६) मन्त्रोंका पाठ करना चाहिये। स्त्रीका भी एकोद्वि-श्राद्ध करना चाहिये। अमावास्या तथा किसी पर्वपर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे पार्वण-श्राद्ध कहते हैं। गौओंके लिये किया जानेवाला श्राद्ध-कर्म गोष्ठ-श्राद्ध कहा जाता है। पितरोंकी तृसिके लिये, सम्पत्ति और सुखकी प्राप्ति-हेतु तथा
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