भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • ब्राह्मपर्व *

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श्रद्धाके साथ आदरपूर्वक ग्रहीताका अर्चन कर दान देनेवाले तथा श्रद्धा एवं आदरपूर्वक दान ग्रहण करनेवाले—दोनों स्वर्ग प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत देना और लेना ये दोनों नरक-प्रासिके कारण बन जाते हैं। उदारता, स्वागत, मैत्री, अनुकम्पा, अमत्सर—इन पाँच प्रकारोंसे दिया गया दान महान् फल देनेवाला होता है।

हे खगश्रेष्ठ! वाराणसी, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, पुष्कर, गङ्गा और समुद्रतट, नैमिषारण्य, महापुण्य, मूलस्थान, मुण्डीरस्वामी (उड़ीसाका कोणार्कक्षेत्र), कालप्रिय (कालपी), क्षीरिकावास—ये स्थान देवताओं और पितरोंसे सेवित कहे गये हैं। सभी सूर्याश्रम, पर्वतोंसे युक्त सभी नदियाँ, गौ, सिद्ध और मुनियोंसे प्रतिष्ठित स्थान पुण्यक्षेत्र कहे गये हैं। सूर्यमन्दिरसे युक्त स्थानोंमें रहनेवालेको दिया गया थोड़ा भी दान क्षेत्रके प्रभावसे अनन्त फलप्रद होता है। सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, उत्तरायण विषुव, व्यतीपात, संक्रान्ति—ये सब पुण्यकाल कहे गये हैं। इनमें दान देनेसे पुण्यकी वृद्धि होती है। भक्तिभाव, परमप्रीति, धर्म, धर्मभावना तथा प्रतिपत्ति—ये पाँच श्रद्धाके पर्याय हैं। श्रद्धापूर्वक विधानके साथ सुपात्रको दिया गया दान उत्तम एवं अनन्त फलप्रद कहा गया है, अतः अक्षय पुण्यकी इच्छासे श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये। इसके विपरीत दिया गया दान भारस्वरूप ही है। आर्त, दीन और गुणवान्को श्रद्धाके साथ थोड़ा भी दिया गया दान सभी कामनाओंका पूरक और सभी श्रेष्ठ लोकोंको प्राप्त करानेवाला होता है। मनीषियोंने श्रद्धाको ही दान माना है। श्रद्धा ही दान, श्रद्धा ही परम तप तथा श्रद्धा ही यज्ञ और श्रद्धा ही परम उपवास है। अहिंसा, क्षमा, सत्य, नम्रता, श्रद्धा, इन्द्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप तथा ध्यान

—ये दस धर्मके साधन हैं।

पर-स्त्री तथा पर-द्रव्यकी अपेक्षा करनेवाला और गुरु, आर्त, अशक्त, विदेशमें गये हुए तथा शत्रुसे पराभूत व्यक्तिको कष्ट देनेवाला पापकर्मा कहा जाता है। ऐसे व्यक्तियोंका परित्याग कर देना चाहिये, किंतु उसकी भार्या तथा उसके मित्र एवं पुत्रका अपमान नहीं करना चाहिये? उनका अवमान करना गुरुनिन्दाके समान पातक माना गया है। ब्राह्मणको मारनेवाला, सुरा-पान करनेवाला, स्वर्ण-चोर, गुरुकी शय्यापर शयन करनेवाला एवं इनके साथ सम्पर्क रखनेवाला—ये पाँच महापातकी कहे गये हैं। जो क्रोध, द्वेष, भय एवं लोभसे ब्राह्मणका अपमान करता है, वह ब्रह्महत्यारा कहा गया है। जो याचना करनेवालेको और ब्राह्मणको बुलाकर 'मेरे पास कुछ नहीं है' ऐसा कहकर बिना कुछ दिये लौटा देता है, वह चाण्डालके समान है। देव, द्विज और गौके लिये पूर्वप्रदत्त भूमिका जो अपहरण करता है, वह ब्रह्मघाती है। जो मूर्ख सौरज्ञानको प्राप्तकर उसका परित्याग कर देता है अर्थात् तदनुकूल आचरण नहीं करता, उसे सुरा-पान करनेवालेके समान जानना चाहिये। अग्निहोत्रके परित्यागी, माता और पिताके परित्यागी, कुकर्मके साक्षी, मित्रके हन्ता, सूर्यभक्तोंके अप्रियको और पञ्चयज्ञोंके न करनेवाले, अभक्ष्य-भक्षण करनेवाले तथा निरपराध प्राणियोंको मारनेवालेको सर्वाधिपत्यकी प्राप्ति नहीं होती। सर्वजगत्पति भानुकी आराधनासे आत्मलोकका आधिपत्य प्राप्त होता है। अतः मोक्षकामीको भोगकी आसक्तिका परित्याग कर देना चाहिये। जो विरक्त हैं, शान्तचित्त हैं, वे सूर्यसम्बन्धी लोकको प्राप्त करते हैं।

(अध्याय १८८-१८९)

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